भारत-तिब्बत बॉर्डर के पास चितकुल हिमाचल प्रदेश का अंतिम आबाद गांव है। बास्पा नदी के किनारे मौजूद यह गांव सर्दियों में बर्फ से ढक जाता है। लकड़ी के घर, जमी हुई जल धाराएं और बर्फीले मैदान यहां का दृश्य मनमोहक बनाते हैं। सड़कें बंद होने से पहले यहां पहुंचना रोमांच से भरा अनुभव होता है।
किन्नौर जिले में स्थित चितकुल गांव सर्दियों में प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत उदाहरण बन जाता है। कई बार भारी हिमपात के कारण यहां का संपर्क बाकी देश से कट जाता है। शांत घाटी, सफेद पहाड़ और बास्पा नदी पर्यटकों को डिजिटल दुनिया से दूर सुकून का एहसास कराते हैं। यह गांव हिमालय की असली झलक पेश करता है।
उत्तराखंड में स्थित माणा गांव को भारत-तिब्बत बॉर्डर से पहले देश का अंतिम गांव माना जाता है। बदरीनाथ धाम के आगे स्थित यह गांव सर्दियों में बर्फ की सफेद चादर से ढका रहता है। यहां पत्थर के घर और आंशिक रूप से जमी सरस्वती नदी इसकी सुंदरता बढ़ाते हैं। महाभारत से जुड़े पौराणिक संदर्भ इसे खास आध्यात्मिक महत्व भी देते हैं।
गढ़वाल हिमालय में बसा माणा गांव सर्दियों के मौसम में लगभग शांत और वीरान हो जाता है। भारी बर्फबारी के कारण ज्यादातर ग्रामीण निचले इलाकों की ओर पलायन कर जाते हैं। सफेद बर्फ से ढकी गलियां और शांत वातावरण यहां आने वाले पर्यटकों को अनोखा अनुभव देते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य और रहस्यमयी सन्नाटा इस गांव को खास बनाते हैं।
धनुषकोडी देश के दक्षिण-पूर्वी छोर पर स्थित एक वीरान कस्बा है। 1960 के दशक में आए एक भीषण चक्रवात ने इस गांव को तबाह कर दिया था। आज यहां टूटे चर्च, खाली घर और रेत में दबी रेल पटरियां उस त्रासदी की कहानी बयान करते हैं। बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर का संगम यहां का खास आकर्षण है।
रामेश्वरम के पास बसा धनुषकोडी गांव अब एक छोड़े गए शहर के रूप में जाना जाता है। समुद्री तूफान के बाद उजड़े इस इलाके में सन्नाटा और खंडहर पर्यटकों को अतीत की झलक दिखाते हैं। दो समुद्रों के मिलन बिंदु का दृश्य इसे और भी अनोखा बनाता है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहां रोमांच प्रेमी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
तुर्तुक नुब्रा घाटी में नियंत्रण रेखा (LOC) के पास बसा भारत के सबसे उत्तर में बसे गांवों में से एक है। यह बाल्टी संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है। कभी पाकिस्तान का हिस्सा रहा यह गांव आज अपनी अनोखी विरासत और मध्य एशियाई प्रभाव के लिए पहचाना जाता है। यहां की मेहमाननवाजी और खुबानी के बागान आकर्षण बढ़ाते हैं।
लद्दाख की कठोर भौगोलिक परिस्थितियों के बीच बसा तुर्तुक सांस्कृतिक विविधता का भी प्रतीक है। पत्थर के घर, बहती धाराएं और शांत वातावरण इसे खास बनाते हैं। सीमावर्ती इतिहास और स्थानीय लोगों की मौखिक परंपराएं यहां की पहचान हैं। पर्यटक यहां प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ सीमाई राजनीति की झलक भी देखते हैं।