Kalpeshwar Temple: सावन का महीना शुरू हो चुका है और हर तरफ बोल-बम के नारे गूंजने लगे हैं। रंग-बिरंगी कांवड़ लेकर कांवड़िए हर तरफ नजर आने लगे हैं। सावन के महीने में शिव भक्त शिवाला-शिवाला जाकर भगवान भोले भंडारी का आशीर्वाद लेते हैं। हर तरफ शिव मंदिरों में इन दिनों भोले के भक्तों का रेला है। आप भी अपने शहर में भोले भंडारी को खुश करने के लिए एक लोटा जल लेकर पहुंच रहे होंगे। इस सावन आप अपने शहर के शिवालों में भगवान को जल अर्पित करें, हम आपको ले चलते हैं भोले भंडारी के कुछ बहुत ही मशहूर मंदिरों की सैर पर। आज सैर उस मंदिर की जहां पर भोले बाबा की जटाओं की पूजा होती है। जी हां, आपने बिल्कुल सही समझा... तो चलिए कल्पेश्वर मंदिर के दर्शनों के लिए जो पंच केदारों में से एक है।
हर-हर महादेव के उद्घोष के साथ अपनी इस यात्रा की शुरुआत करें। यात्रा की शुरुआत में ही बता दें कि पंच केदारों में से सिर्फ कल्पेश्वर ही ऐसे हैं, जिनके कपाट बारहों महीने खुले रहते हैं। लेकिन सावन में भोले के दर्शनों का अपना अलग ही महत्व है।
कहां है भगवान भोले का कल्पेश्वर मंदिर?
इस यात्रा पर जाने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि कल्पेश्वर मंदिर कहां पर है? कल्पेश्वर मंदिर में भगवान शिव की पूजा कल्पनाथ के नाम से होती है। यह मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल अंचल में समुद्र तल से 7217 फीट की ऊंचाई पर है। यहां की उर्गम घाटी (Urgam Valley) में उर्गम गांव के पास कल्पगंगा (Kalpganga River) के किनारे यह मंदिर मौजूद है।

शिव की जटाओं की पूजा होती है यहां
इस जगह को और ज्यादा समझने के लिए सबसे पहले जाएंगे जोशीमठ। यहां से हेलंग (Helang) से कल्पेश्वर की यात्रा विधिवत शुरू करेंगे। यहां रास्ते में आपको अलकनंदा (Alaknanda River) नदी और कल्पगंगा नदी का संगम दिखेगा। कल्पगंगा नदी, उर्गम घाटी में घने जंगलों के बीच से बहती है। यहां आपको सेब के कई बगीचे भी नजर आएंगे। बता दें कि यहां पर सब्जियों का राजा कहे जाने वाले आलू की भी खेती प्रचुर मात्रा में होती है।
कैसे होगी कल्पेश्वर मंदिर की यात्रा?
दिल्ली और देश के अन्य शहरों से चमोली स्थित जोशीमठ के लिए आपको बस और टैक्सी मिल जाएगी। जोशीमठ से हेलंग गांव की दूरी मात्रा 22 किमी है, जिसमें सड़क मार्ग से यात्रा करने पर आपको 45 मिनट से 1 घंटे तक का समय लग जाएगा। हेलंग से सागर गांव तक 58 किमी की दूरी भी आपको सड़क मार्ग से तय करनी होगी। जीप के जरिए आप यहां से सड़क मार्ग से ही उर्गम गांव तक पहुंच सकते हैं। उर्गम गांव से छोटा सा ट्रैक करके आपके कल्पेश्वर मंदिर पहुंच जाएंगे।
मखमली बुग्यालों में ठिठक जाते हैं कदम
कल्पेश्वर की यात्रा पर आगे बढ़ते हुए आपको बहुत ही खूबसूरत नजारे दिखेंगे। यहां घने पहाड़ी जंगल तो हैं ही, साथ ही दूर-दूर तक फैले पहाड़ी मैदान भी हैं। इन पहाड़ी मैदानों को बुग्याल कहा जाता है, जिनकी मखमली खास आपको कुछ पल वहां रुकने को मजबूर कर देगी। बुग्यालों की मखमली घास में आपके कदम अपने आप ही ठिठक जाएंगे। फिर छोटे-छोटे पहाड़ी गांव और उन गांवों के छोटे-छोटे घरों से उठता धुआं आपको शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी से दशकों पीछे ले जाएगा।

कभी बंद नहीं होते कल्पेश्वर मंदिर के कपाट
कल्पेश्वर मंदिर पहुत ही साधारण लेकिन अद्भुत है। यहां पर भगवान शिव की उन्हीं जटाओं की पूजा होती है, जिन्होंने स्वर्ग से उतरती गंगा को जगह दी थी। यहां पहुंचकर जब आप भोले भंडारी के स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन करेंगे तो अपने अंदर एक अद्भुत ऊर्जा को महसूस कर पाएंगे। यहां का शांत माहौल आपको उस आलौकिक शक्ति में ध्यान केंद्रित करने और भोले का आशीर्वाद लेने में मदद करेगा।
कल्पेश्वर मंदिर में दर्शन कब होते हैं?
कल्पेश्वर मंदिर के कपाट रोज सुबह 6 बजे खुल जाते हैं और उसी समय सुबह की आरती भी होती है। शाम की आरती के बाद 7 बजे मंदिर के कपाट रातभर के लिए बंद हो जाते हैं। भले ही कल्पेश्वर मंदिर के कपाट बारहों महीने खुले रहते हैं, लेकिन यहां जाने का सबसे अच्छा समय मई से अक्टूबर के बीच ही है। अभी सावन के महीने में यहां दर्शन करने का अनुभव भी अद्भुत होगा और आप आसानी से भोले बाबा का आशीर्वाद भी ले पाएंगे। मानसून और बरसात के मौसम के बाद यहां का साफ आसमान व मन मोह लेने वाली हरियाली आपकी ऊर्जा को कई गुना बढ़ा देगी। सर्दियों में यहां जाने से बचें, क्योंकि यहां पर काफी ज्यादा बर्फबारी होती है।
