जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी (Jawaharlal Nehru University) में एक बार फिर छात्र राजनीति गरमा गई है। जेएनयू छात्रसंघ (JNUSU) के प्रदर्शनकारी यूजीसी के नए नियमों को लागू करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि इन नियमों पर माननीय Supreme Court of India ने फिलहाल रोक (स्टे) लगा रखी है, ऐसे में इन्हें लागू करना कोर्ट के आदेश का उल्लंघन होगा।
प्रशासन का साफ कहना है कि कुलपति (VC) या रजिस्ट्रार के पास यूजीसी नियमों को बदलने या लागू करने का अधिकार नहीं है। उनका कहना है कि यह मामला नीति स्तर का है, जिस पर अंतिम फैसला संबंधित उच्च स्तर पर ही लिया जा सकता है।
जांच के बाद संबंधित छात्रों को जिम्मेदार ठहराते हुए कार्रवाई
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार जिन छात्रों को रस्टिकेट (निष्कासित) किया गया है, वह कार्रवाई कैंपस में हुई कथित तोड़फोड़ और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाओं के बाद की गई। प्रशासन का दावा है कि इस मामले में प्रॉक्टोरियल जांच कराई गई थी और जांच के बाद संबंधित छात्रों को जिम्मेदार ठहराते हुए कार्रवाई की गई।
प्रशासन का यह भी कहना है कि जेएनयू छात्रसंघ अब तक अपने निष्कासन के मूल मुद्दे-यानी कैंपस में हिंसा और तोड़फोड़-पर बात करने से बच रहा है और मुद्दे को यूजीसी नियमों की ओर मोड़ने की कोशिश कर रहा है।
कुलपति पर आरोपों को लेकर भी विवाद
प्रशासन ने यह भी कहा कि जेएनयू की महिला ओबीसी कुलपति पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उनका कहना है कि यह सब कैंपस में हुई हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश है।
सार्वजनिक विश्वविद्यालय होने का सवाल
प्रशासन ने याद दिलाया कि जेएनयू एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय है, जो सरकार, संसद और देश के करदाताओं के प्रति जवाबदेह है। ऐसे में कैंपस में कानून व्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना विश्वविद्यालय की जिम्मेदारी है।
