Yamuna River History: वर्ष 1799 के उस नक्शे ने यमुना नदी के अतीत को समझने का एक नया जरिया दिया है, जिसमें यमुना ज्यादा चौड़ी और मुक्त दिखाई देती है। अपने तरह के ऐसे पहले अध्ययन में, शोधकर्ताओं को यह पता लगाने में मदद मिली है कि दिल्ली में 200 से ज्यादा वर्षों में समय, मानव दखल और शहरीकरण की वजह से नदी पर क्या असर पड़ा है।
यह शोध दिल्ली विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विभाग और भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान , भोपाल के वैज्ञानिकों ने किया। उन्होंने अपजॉन द्वारा 1799 में तैयार किए गए और राष्ट्रीय अभिलेखागार में सरंक्षित एक पुराने नक्शे, अन्य ऐतिहासिक नक्शों और आधुनिक उपग्रह तस्वीरों की मदद से यमुना के पुराने स्वरूप का अध्ययन किया।
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अध्ययनकर्ताओं में शामिल प्रोफेसर विमल सिंह ने कहा, 'लोगों ने दिल्ली वाले हिस्से में यमुना नदी में हुए बदलावों के बारे में तो बात की है, लेकिन इस समय-सीमा के दौरान इसके बहाव में हुए बदलावों के बारे में किसी ने बात नहीं की है।'अध्ययनकर्ताओं के अनुसार, 1799 का नक्शा उस समय का है जब यमुना पर कोई बैराज नहीं बना था, इसलिए इससे नदी की प्राकृतिक स्थिति को समझने में मदद मिली।उन्होंने पाया कि 1799 में यमुना की औसत चौड़ाई करीब 658 मीटर थी, जो 2024 में घटकर लगभग 210 मीटर रह गई है। इसी आधार पर अनुमान लगाया गया कि नदी में बहने वाले पानी की मात्रा 1799 में लगभग 30,000 घन मीटर प्रति सेकंड थी, जो 2024 में घटकर करीब 3,900 घन मीटर प्रति सेकंड रह गई।
नदी पर कई बैराज, नहरें और तटबंध बनाए गए
अध्ययन में कहा गया है कि ये बदलाव उस दौरान हुए जब दिल्ली की आबादी 19वीं सदी की शुरुआत में लगभग 2.5 लाख से बढ़कर 2024 में लगभग 2.15 करोड़ हो गई। इसी दौरान नदी पर कई बैराज, नहरें और तटबंध बनाए गए, जिनसे नदी के पानी का प्रवाह बदल गया।अध्ययन के अनुसार, पहला बड़ा बदलाव 1873 में अंग्रेजों द्वारा बनाए गए ताजेवाला बैराज के साथ आया, जिसके बाद 1874 में ओखला बैराज, 1959 में वजीराबाद बैराज और 1966-67 में आईटीओ बैराज बनाए गए।इसमें कहा गया है कि इन बैराज के कारण नदी का काफी पानी ऊपर ही रोक लिया गया, जिससे दिल्ली में यमुना का प्राकृतिक बहाव काफी बदल गया।
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प्राकृतिक रेतीले टापुओं का क्षेत्रफल भी तेजी से घटा
अध्ययन में यह भी पाया गया कि 1912 से 2024 के बीच दिल्ली के लगभग 45 वर्ग किलोमीटर डूब क्षेत्र नदी से अलग हो गए। ऐसा शहर को बाढ़ से बचाने के लिए बनाए गए तटबंधों के कारण हुआ। बाद में इन इलाकों का उपयोग खेती और शहरी विकास के लिए किया जाने लगा।शोध में एक और अहम बात सामने आई कि नदी के बीच बनने वाले प्राकृतिक रेतीले टापुओं का क्षेत्रफल भी तेजी से घटा है। यह 1985 में करीब 20 वर्ग किलोमीटर था, जो 2020 तक घटकर केवल चार वर्ग किलोमीटर रह गया। इनमें से कई क्षेत्रों को खेती की जमीन में बदल दिया गया।
यमुना में आए बदलावों को समझने के लिए, अध्ययनकर्ताओं ने 1799 के नक्शे की तुलना वर्ष 1893, 1924 और 1955 के नक्शों से की। साथ ही, उन्होंने 1986 के बाद की लैंडसैट उपग्रह तस्वीर और ’सेंटिनल-1 रडार इमेज’ का भी विश्लेषण किया।
