हाल के दिनों में दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे और बैरियर-लेस टोल प्लाजा काफी चर्चा में रहे हैं। गंगा एक्सप्रेसवे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को पूर्वी यूपी से जोड़ता है, जबकि दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे ने दोनों शहरों की दूरी को मात्र ढाई घंटे में समेट दिया है। 14 अप्रैल को शुरू हुए दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर मैंने स्वयं दो बार सफर किया है। इस एक्सप्रेसवे पर मेन कैरिजवे अभी तैयार हो चुका है और आम जनता के लिए खुल भी चुका है। लेकिन इसके अलावा यहां कई दिक्कतें हैं। इन दिक्कतों के बारे में मैंने अपने एक्सपीरियंस का एक आर्टिकल लिखकर बताया है। उस आर्टिकल को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। बैरियर-लेस टोल प्लाजा केंद्रीय सड़क परिहवन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी का ड्रीम प्रोजेक्ट है। दिल्ली में भी एक बैरियर-लेस टोल प्लाजा लगाया गया है। लेकिन यहां चर्चा और चिंता सिस्टम को धोखा देने और टोल चोरी की है। चलिए जानते हैं इस बारे में विस्तार से -
नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने हाल ही में दिल्ली के UER-II के मुंडका-बक्करवाला सेक्शन पर देश का दूसरा और राजधानी का पहला बैरियर-लेस टोल प्लाजा शुरू किया। इस आधुनिक टोल सिस्टम का मकसद गाड़ियों को बिना रुके टोल भुगतान की सुविधा देना है। ताकि ट्रैफिक जाम कम हो और यात्रा का समय भी घटे। लेकिन, दिल्ली के धुरंधरों ने इस अत्याधुनिक टोलिंग सिस्टम को धोखा देने का रास्ता खोज लिया। इसके शुरू होते ही सिस्टम में कुछ खामियां और टोल चोरी के मामले सामने आने लगे हैं।
कैसे काम करता है बैरियर-लेस टोल सिस्टम?
बता दें यह बैरियर-लेस टोल सिस्टम Multi-Lane Free Flow (MLFF) तकनीक पर आधारित है। इसमें हाई-परफॉर्मेंस RFID रीडर्स और AI आधारित Automatic Number Plate Recognition (ANPR) कैमरे लगाए गए हैं। ये कैमरे गाड़ी की नंबर प्लेट को पढ़ते हैं और FASTag सिस्टम से जुड़े खाते से ऑटोमैटिक टोल राशि काट ली जाती है। इस तकनीक से गाड़ियों को टोल चुकाने के लिए रुकना नहीं पड़ता और ट्रैफिक फ्लो स्मूद रहता है।
टोल भुगतान से बचने का ये तरीका खोज निकाला
यह सिस्टम आधुनिक तकनीक पर आधारित है, लेकिन कुछ वाहन चालक इसका गलत फायदा भी उठा रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ लोग High Security Registration Plates (HSRP) से छेड़छाड़ कर रहे हैं, जिससे ANPR के लिए नंबर प्लेट की पहचान मुश्किल हो जाती है। यही नहीं, कुछ गाड़ियों के मालिक FASTag को विंडस्क्रीन पर नहीं लगाते, जिससे सिस्टम उन्हें ट्रैक नहीं कर पाता। हालांकि, NHAI के मुताबिक ऐसे मामलों की संख्या 1 फीसद से भी कम है, फिर भी यह चिंता का विषय बना हुआ है।

UER-2 पर मुंडका-बकरवाला टोल पर धोखा दे रहे वाहन चालक
ये तरीके भी अपना रहे टोल चोरी करने वाले
यह भी पता चला है कि कई वाहन चालक नंबर प्लेट को फ्लिप करने वाले मैकेनिज्म का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे कैमरे कार की सही पहचान नहीं कर पा रहे हैं। वहीं कुछ लोग नंबर और अक्षरों के फॉर्मेट में हल्का बदलाव कर सिस्टम को भ्रमित करते हैं। इसके अलावा, कुछ गाड़ियों के मालिक रिफ्लेक्टिव कोटिंग या फिल्म का इस्तेमाल करते हैं, जिससे कैमरों से ली गई तस्वीरें धुंधली या गलत कैप्चर होती हैं। यह सभी तरीके ANPR सिस्टम की सटीकता को प्रभावित करते हैं।
सख्ती बढ़ाने पर विचार कर रही NHAI
NHAI का कहना है कि यह सिस्टम भविष्य की ओर एक बड़ा कदम है, लेकिन इसके सफल संचालन के लिए सख्त निगरानी और नियमों के पालन की जरूरत है। एजेंसी अब तकनीकी सुधार और सख्ती बढ़ाने पर विचार कर रही है, ताकि टोल चोरी पर पूरी तरह से लगाम लगाई जा सके।
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