Delhi: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पुराने वाहनों को जब्त करने और उन्हें ईंधन न देने के हालिया फैसले ने एक ओर जहां लाखों वाहन चालकों को संकट में डाल दिया है, वहीं सरकार द्वारा वायु प्रदूषण रोकने के इन उपायों की आलोचना भी तेज हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम एकतरफा है और प्रदूषण के जटिल कारणों को नजरअंदाज करता है।
केवल वाहन जिम्मेदार नहीं
जानकारों का मानना है कि दिल्ली की हवा खराब करने में केवल वाहनों का योगदान नहीं है, बल्कि कई अन्य कारक भी शामिल हैं जिन पर सरकार का ध्यान नहीं जाता। ट्रैफिक जाम, सड़कों पर अतिक्रमण और सार्वजनिक परिवहन की कमजोरी जैसी समस्याएं निजी वाहनों के अत्यधिक प्रयोग के पीछे बड़े कारण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर दिल्ली की पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्यवस्था बेहतर हो जाए, तो स्वाभाविक रूप से निजी वाहन घटेंगे और सड़कों पर भीड़ भी कम होगी।
क्या कहता है डेटा
केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की सफर इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में प्रदूषण के स्रोत न केवल पुराने हैं, बल्कि लगातार नए कारक भी जुड़ते जा रहे हैं। वर्ष 2010 से 2020 के बीच कई परंपरागत स्रोतों जैसे उद्योग, निर्माण और आवासीय उत्सर्जन में बदलाव आया है, साथ ही 26 नए स्रोत सामने आए हैं — जिनमें ईंट भट्ठे, होटल-ढाबे, रेहड़ी-खोमचे, डीजल जनरेटर, स्पीड ब्रेकर, और शॉपिंग मॉल तक शामिल हैं।
विशेषज्ञों ने दी सलाह
सीएसई की कार्यकारी निदेशक अनुमिता राय चौधरी का मानना है कि वाहन की उम्र नहीं, बल्कि उससे निकलने वाले प्रदूषण की वास्तविक मात्रा को आधार बनाकर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं IIT कानपुर के प्रो. एसएन त्रिपाठी ने सुझाव दिया कि सिर्फ वाहनों पर ध्यान देने के बजाय सरकार को ट्रैफिक जाम, बॉटलनेक और अतिक्रमण जैसी बुनियादी समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस प्रयास करने चाहिए।
ऑटो एक्सपर्ट टुटू धवन ने तो साफ कहा कि BS3 और BS4 वाहनों पर प्रतिबंध सरकार की नीतिगत विफलता का संकेत है। उनके अनुसार, प्रदूषण इन वाहनों के पुराने होने से नहीं, बल्कि शहर में यातायात की धीमी गति और जाम में फंसने से होता है।
दिल्ली को चाहिए बहुस्तरीय समाधान
दिल्ली जैसे मेगासिटी में एक ही उपाय से प्रदूषण खत्म नहीं किया जा सकता। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल वाहनों के उत्सर्जन पर कार्रवाई से हल नहीं निकलेगा, जब तक कि अपशिष्ट जलना, सड़क की धूल, घरों और ढाबों में जलने वाले कोयले-लकड़ी, और ट्रैफिक जंक्शनों की कार्यकुशलता जैसे पहलुओं पर समान रूप से काम नहीं किया जाता।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडीज के निदेशक डॉ. गुरफान बेग का कहना है कि किसी भी स्थान को प्रदूषण हॉटस्पॉट बनने से रोकने के लिए वहां के ईंधन स्रोत, जनसंख्या घनत्व, वाहनों की संख्या और गति जैसी चीजों का वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी है
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