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Delhi: कागजों में सिमटी बच्चों की सुरक्षा योजनाएं, CAG रिपोर्ट ने खोली सिस्टम की पोल

दिल्ली में CAG की रिपोर्ट में बाल सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी खामियां सामने आईं। बच्चों की पहचान के लिए सर्वे नहीं हुआ और स्टाफ की भारी कमी रही। फंड खर्च न होने और निगरानी कमजोर होने से योजनाएं प्रभावित रहीं।

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सांकेतिक फोटो

Photo : iStock

Delhi News: दिल्ली में बच्चों की सुरक्षा और देखभाल को लेकर एक हैरान करने वाली तस्वीर सामने आई है। CAG की ताजा रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि 2018 से 2021 के बीच जरूरतमंद और असहाय बच्चों के लिए बनाई गई योजनाएं अधिकतर कागजों तक ही सीमित रहीं। सीएम रेखा गुप्ता ने इस रिपोर्ट को विधानसभा में पेश किया, जिसमें बच्चों की पहचान से लेकर उनकी देखभाल, शिक्षा और पुनर्वास तक कई स्तरों पर गंभीर लापरवाही देखने को मिली।

रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे बड़ी कमी यह रही कि सरकार ने जरूरतमंद बच्चों की पहचान के लिए कोई ठोस सर्वे ही नहीं कराया। जिसकी वजह से सही से डाटा तैयार नहीं हो सका और योजनाओं को भी सही तरीके से लागू नहीं किया जा सका। योजनाओं को अनुमान के आधार पर बनाया गया, जिससे संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया और कई जरूरतमंद बच्चे सिस्टम से बाहर रह गए।

एकीकृत बाल संरक्षण योजना (Integrated Child Protection Scheme) के तहत बनने वाली संस्थाओं की हालत भी चिंताजनक पाई गई। कई जगहों पर ये संस्थाएं या तो समय पर बनी ही नहीं और जहां पर बनीं भी, वहां ठीक से काम नहीं कर रही थीं। जिला बाल संरक्षण इकाइयों की स्थापना में देरी हुई, चाइल्ड वेलफेयर कमेटी और एडॉप्शन एजेंसियां प्रभावी ढ़ग से काम नहीं कर पाईं। राज्य बाल संरक्षण सोसायटी की तीन साल में केवल एक बैठक होना प्रशासनिक उदासीनता को दिखाता है।

स्टाफ की कमी और बजट की बर्बादी उजागर

स्टाफ की भारी कमी ने स्थिति और खराब कर दी। रिपोर्ट के अनुसार, जिला इकाइयों में 16% से 63% तक पद खाली रहे। वहीं चाइल्ड केयर संस्थानों में 76% तक स्टाफ की कमी दर्ज हुई। कई जगहों पर एक ही अधिकारी को कई संस्थानों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी, जिसका सीधा प्रभाव बच्चों की देखभाल और सुरक्षा पर पड़ा।

वित्तीय प्रबंधन भी कमजोर पाया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि 22% से 38% तक बजट खर्च ही नहीं हुआ, जिससे 8.39 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ। केंद्र सरकार से मिलने वाली अतिरिक्त मदद का भी पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया। बाल गृहों की हालत भी बेहद चिंताजनक पाई गई। कई संस्थान बिना वैध रजिस्ट्रेशन के चल रहे थे और बुनियादी सुविधाओं जैसे भोजन, कपड़े और बिस्तर में भी कमी थी। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति खराब रही, सिर्फ 54% बच्चों को ही औपचारिक शिक्षा मिल पाई।

बाल गृहों की बदहाल स्थिति आई सामने

रिपोर्ट में कहा गया कि Juvenile Justice Act, 2015 के प्रावधानों का भी सही तरीके से पालन नहीं हुआ। निगरानी तंत्र कमजोर रहा, नियमित निरीक्षण नहीं हुए और खामियों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। कुल मिलाकर, CAG की यह रिपोर्ट दिल्ली में बच्चों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। योजनाएं और बजट होने के बावजूद, सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही ने बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है।

bhawana gupta
भावना किशोरauthor

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर मूल की भावना ने देश के प्रतिष्ठित संस्थान IIMC से 2014 में पत्रकारिता की पढ़ाई की. 12 सालों से मीडिया में काम कर रही हैं. न्यूज़ नेशन, इंडिया न्यूज़, टीवी 9 भारतवर्ष और ज़ी न्यूज़, न्यूज 18 में काम करने का अनुभव. अभी Times Now में Special correspondent हैं.दिल्ली सरकार, स्वास्थ्य ,रेल, कल्चरल, शिक्षा मंत्रालयों के साथ दिल्ली क्राइम ,पॉलिटिक्स और राजधानी की हर छोटी बड़ी खबरों पर खास तौर से नजर रखती हैं. लोगों से जुड़ी खबरों पर काम करने और लोगों तक सही और सटीक खबरें पहुंचाने को अपना मकसद मानती हैं।

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