Agra: आज, 10 अप्रैल को सिंध समाज के भगवान झूलेलाल की जयंती है। इसे मनाने की तैयारी जोरों से चल रही है। बता दें कि मूल रूप से इस त्योहार को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मनाया जाता है। भारत-पाक विभाजन के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होकर आगरा में शरण लेने वाले सिंधी समाज के लोगों हर साल यहां भगवान झूलेलाल की शोभायात्रा निकालते हैं। ये शोभायात्रा टूटे बिखरे समाज को एक बार फिर खड़ा करने में और उसे एक सूत्र में बांधने का माध्यम बनी है। बता दें कि आगरा में भगवान झूलेलाल की पहली शोभायात्रा वर्ष 1947 में निकाली गई थी। नियमित तौर पर इस यात्रा का आयोजन वर्ष 1956 के बाद हुआ।
विस्थापन के बाद एक मात्र सहारा
भारत-पाक विभाजन के दौरान पूरा देश अस्त-व्यस्त हो गया था। भारत से लोग पाकिस्तान विस्थापित हो रहे थे तो वहीं पाकिस्तान से लोग भारत आ रहे थे। इस दौरान करीब 15 हजार से अधिक सिंधी समाज के लोग विस्थापित होकर आगरा आए थे। उन्होंने आगरा के काला महल, शाहगंज के आस-पास शरण ली थी। उसके बाद आगरा के काला महल से 1947 में भगवान झूलेलाल की पहली शोभायात्रा निकाली गई।
विस्थापन के बाद काला महल में भगवान झूलेलाल मंदिर की स्थापना पुरोहित गिरधरलाल शर्मा के सहयोग से की गई। इतना ही नहीं, आगरा से भगवान झूलेलाल की पहली यात्रा काला महल में पाकिस्तान से यहां आए, हकीम दास आर्य, भोजामल, देवेंद्रराम, हीरालाल, द्वारिकादास, होलाराम, लक्ष्मणदास पंजवानी की प्रेरणा से निकाली गई थी। बता दें कि इस शोभायात्रा में संत, महापुरुष के स्वरूपों की सवारी निकाली गई थी। लेकिन, संसाधनों और पैसौं की कमी के कारण इस त्योहार को केवल सांकेतिक रूप से मनाया गया। नियमित तौर शोभायात्रा की शुरुआत 1956 में सिंधी सेंट्रल पंचायत के गठन के बाद हुई। उसके बाद से हर साल भगवान झूलेलाल की जयंती पर शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है।
सिंधी सेंट्रल पंचायत के गठन में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
वर्ष 1956 में सिंधी सेंट्रल पंचायत के गठन में लिए कई लोगों ने अहम भूमिका निभाई है। इसमें स्व. हकीम अर्जुनदास आर्य, स्व. तीरथदास बसंतानी, स्वं फिरन्दमल गगनानी और स्वं लाल चंद सोनी के ही प्रयास ने पूरे सिंधी समाज को एकजुट करते हुए एक सूत्र में पिरोकर फिर खड़ा किया। आइए आज आपको इन लोगों के बारे में बताएं....
स्व. हकीम अर्जुनदास आर्य
भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद 1947 में स्व. हकीम अर्जुनदास आर्य पाकिस्तान के सख्खर से विस्थापित होकर आगरा के काला महल आए थे। पाकिस्तान में वह कपड़ों के कारोबारी थे। विभाजन के दौरान उन्हें अपना सब कुछ छोड़ना पड़ा। लेकिन हिम्मत हारे बिना उन्होंने घर-घर जाकर समाज को एकजुट करना शुरू किया। अपने जीवन यापन के लिए जहां सभी लोग काम-धंधे की तलाश में लगे हुए थे, वहीं उन्होंने समाज को एकजुट करने में अहम योगदान देते हुए सिंधी सेंट्रल पंचायत का गठन किया।
स्व. तीरथदास बसंतानी
स्व. हकीम अर्जुनदास आर्य की तरह ही 1947 में पाकिस्तान के सख्खर से विस्थापित होकर स्व. तीरथदास बसंतानी आगरा आए थे। वह पाकिस्तान में एक बड़े किसान थे। लेकिन विभाजन के दौरान रातों-रात उनका जीवन बदल गया। अपनी संपत्ती, घरबार सब छोड़कर वह भारत आए थे। यहां उन्होंने धीरे-धीरे अपना कारोबार जमाया और सिंधी सेंट्रल पंचायत में योगदान दिया।
स्वं फिरन्दमल गगनानी
विभाजन के दौरान भारत आए स्वं फिरन्दमल गगनानी ने एलआईसी में नौकरी की। अपने समाज के जरूरतमंदों की सहायता करने के लिए इस संस्थान में योगदान दिया। उन्हें इस संस्थान का महामंत्री बनाया गया था। स्वं फिरन्दमल गगनानी ने सिंधी भाषा के उत्थान व अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से सिंधी समाज को एकजुट करने का कार्य किया।
स्वं लाल चंद सोनी
विभाजन के दौरान अपना कारोबार और घर छोड़ स्वं लाल चंद सोनी पाकिस्तान के शाहजादपुर से विस्थापित होकर भारत आए थे। यहां उन्होंने आगरा के कश्मीरी बाजार को अपना ठिकाना बनाया और अपने पारंपरिक कारोबार को आगे बढ़ाया। समय के साथ स्थिति सुधरने पर उन्होंने आगरा और मथुरा में अपने कई प्रतिष्ठान खोले। वर्ष 1981 से 2012 तक सेंट्रल पंचायत की जिम्मेदारी संभाली।
