Agra News: आगरावासियों के लिए एक खुशखबरी है। जानकारी के मुताबिक, उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (यूपीएमआरसी) ने बिजलीघर चौराहे पर स्थित मनकामेश्वर स्टेशन से आईएसबीटी स्टेशन तक डाउन लाइन पर मेट्रो के ट्रायल की तैयारी पूरी कर ली है। 20 अप्रैल से इस रूट पर मेट्रो को 5 से 20 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलाकर परीक्षण किया जाएगा। वहीं, अप लाइन पर मेट्रो का ट्रायल पहले से जारी है।
जानकारी के मुताबिक, बिजलीघर चौराहे से आईएसबीटी स्टेशन तक का यह खंड पहले कॉरिडोर का हिस्सा है, जिसकी लंबाई लगभग छह किलोमीटर है। करीब दो महीने पहले यूपीएमआरसी ने इस मार्ग की अप लाइन पर मेट्रो ट्रायल शुरू किया था। बीते सप्ताह डाउन लाइन पर सिग्नलिंग सिस्टम का परीक्षण भी पूरा कर लिया गया। अब 20 अप्रैल से यहां नियमित ट्रायल की शुरुआत होगी। शुरुआती तीन से छह दिनों तक मेट्रो को 5 से 20 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलाया जाएगा, जबकि पूरा परीक्षण करीब एक महीने तक जारी रहेगा।
एक साथ किया जाएगा दोनों लाइनों का ट्रायल
इसके बाद अप और डाउन दोनों लाइनों पर एक साथ मेट्रो का ट्रायल किया जाएगा, जिसमें ट्रेनों को अधिकतम 90 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलाया जाएगा। वहीं, यमुना नदी पर लगभग 200 करोड़ रुपये की लागत से मेट्रो पुल का निर्माण तेजी से जारी है। इस परियोजना के तहत कुल सात पिलर बनाए जा रहे हैं, जिनमें से चार का निर्माण पूरा हो चुका है और शेष तीन पर काम चल रहा है। पुल को एक वर्ष के अंदर तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। संयुक्त महाप्रबंधक (जनसंपर्क) पंचानन मिश्र के अनुसार, एमजी रोड, नेशनल हाईवे-19 और सुल्तानपुरा रोड पर मेट्रो स्टेशनों का निर्माण कार्य भी तेज गति से आगे बढ़ रहा है।
भूमिगत मेट्रो ट्रैक का निर्माण
भूमिगत मेट्रो ट्रैक का निर्माण आधुनिक तकनीकों की मदद से किया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे पहले स्टेशन का निर्माण पूरा किया जाता है। इसके बाद एक लॉन्चिंग शाफ्ट तैयार किया जाता है, जिसके जरिए टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) को नीचे उतारकर सुरंग बनाने का काम शुरू होता है। यह मशीन गोल आकार की टनल तैयार करती है। चूंकि सुरंग का आकार गोल होता है, इसलिए सीधे पटरियां बिछाना संभव नहीं होता। ऐसे में पहले ट्रैक स्लैब डालकर समतल सतह बनाई जाती है, जिस पर बैलास्टलेस ट्रैक बिछाया जाता है। इस प्रकार के ट्रैक में कंक्रीट की बीम, जिसे प्लिंथ बीम कहा जाता है, के ऊपर पटरियां स्थापित की जाती हैं। पारंपरिक ट्रैक की तुलना में यह ज्यादा मजबूत होता है और इसके रखरखाव की जरूरत भी कम पड़ती है।
