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क्या ग्रेच्युटी के 5 साल पूरे होने का इंतजार करना सही है या बेहतर हाइक पर बदल लें जॉब?

ग्रैच्युटी और करियर ग्रोथ के बीच फैसला आज लाखों वेतनभोगी कर्मचारियों के लिए बड़ी दुविधा बन गया है, ऐसे में आइए जानते हैं आपको कंपनी में ग्रेच्युटी के पैसों के लिए रुकना सही है या ज्यादा हाइक लेकर नौकरी बदलना?

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Gratuity Vs Job Change

जरा सोचिए, आप अपनी कंपनी में पांच साल पूरे होने से सिर्फ चार महीने दूर हैं, तभी एक रिक्रूटर आपको एक शानदार ऑफर (Salary Hike) देता है ज्यादा सैलरी, बड़ी भूमिका और बेहतर पद। सुनने में यह काफी आकर्षक लगता है, लेकिन इसमें एक पेच भी है। अगर आप जल्दबाज़ी में नौकरी छोड़ देते हैं, तो आप ग्रैच्युटी जैसे बड़े लाभ से हाथ धो बैठेंगे। ग्रैच्युटी (Gratuity) वह एकमुश्त रकम होती है, जो नौकरी खत्म होने पर कर्मचारी को दी जाती है। आमतौर पर इसे पाने के लिए कर्मचारी का लगातार पांच साल तक कंपनी में काम करना जरूरी माना जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ग्रैच्युटी के 5 साल पूरे होने का इंतजार करना सही है या बेहतर हाइक पर बदल लें जॉब?

क्या है ग्रेच्युटी?

ग्रेच्युटी असल में आपकी वफादारी और लंबी सेवा के बदले कंपनी की तरफ से मिलने वाला एक वित्तीय इनाम है। पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट के तहत, जो कंपनियां 10 या उससे अधिक कर्मचारियों के साथ काम करती हैं, उन्हें अपने कर्मचारियों को यह लाभ देना अनिवार्य होता है। इसकी गणना आपकी आखिरी बेसिक सैलरी और कंपनी में बिताए गए सालों के आधार पर की जाती है। चूंकि इसके लिए 5 साल की न्यूनतम अवधि तय है, इसलिए कई लोग 4 साल पूरे होने के बाद सिर्फ इस रकम को पाने के चक्कर में अपनी वर्तमान नौकरी में टिके रहते हैं, भले ही वे वहां के वर्क कल्चर या सैलरी से खुश न हों।

हाईक लेना बेहतर या ग्रेच्युटी?

लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों और करियर एक्सपर्ट्स की मानें तो केवल ग्रैच्युटी के पैसों के लिए किसी अच्छी अपॉर्चुनिटी (अवसर) को लात मार देना हर बार समझदारी का फैसला नहीं होता। इसे एक सीधे गणित से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि आपकी वर्तमान बेसिक सैलरी 40,000 रुपये है और आप वहां 4 साल पूरे कर चुके हैं। अगर आप 5 साल पूरे होने पर कंपनी छोड़ते हैं, तो आपको ग्रैच्युटी के रूप में लगभग 1.15 लाख रुपये मिलेंगे। लेकिन, अगर आपको 4 साल पूरे होते ही दूसरी कंपनी से 30% से 40% की भारी सैलरी हाइक का ऑफर मिल रहा है, जिससे आपकी मासिक इन-हैंड सैलरी में 15,000 से 20,000 रुपये की बढ़ोतरी हो सकती है, तो आपको तुरंत स्विच करने के बारे में सोचना चाहिए।

इसका कारण यह है कि नई कंपनी से मिलने वाली बढ़ी हुई सैलरी महज 6 से 7 महीनों के भीतर ही आपकी उस ग्रैच्युटी की रकम (1.15 लाख रुपये) की भरपाई कर देगी। इसके बाद मिलने वाला बढ़ा हुआ वेतन आपका शुद्ध मुनाफा होगा। इतना ही नहीं, जब आप ऊंचे बेस (ज्यादा सैलरी) पर नई कंपनी में काम शुरू करते हैं, तो भविष्य में होने वाले सालाना अप्रैजल (Appraisal) और अगली जॉब स्विच के दौरान आपको और भी बड़ा फायदा मिलता है। इसलिए, लंबे समय के वित्तीय विकास (Long-term Financial Growth) को देखें तो एक अच्छा सैलरी हाइक हमेशा ग्रैच्युटी के संचय से कहीं ज्यादा फायदेमंद साबित होता है।

कैसे निकालें इस उलझन का हल?

हालांकि, इस फैसले को लेते समय आपको कुछ विशेष परिस्थितियों का भी ध्यान रखना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि आपकी वर्तमान कंपनी में 5 साल पूरे होने में सिर्फ 2 या 3 महीने ही बचे हैं, तो बेहतर यही होगा कि आप थोड़ा इंतजार कर लें। आप नए एम्प्लॉयर (जिस कंपनी से ऑफर आया है) से अपनी जॉइनिंग डेट को कुछ हफ्ते आगे बढ़ाने का अनुरोध कर सकते हैं। ज्यादातर कंपनियां अच्छे उम्मीदवारों के लिए इतना इंतजार करने को तैयार हो जाती हैं। इससे आपको ग्रैच्युटी की रकम भी मिल जाएगी और नया बेहतरीन ऑफर भी हाथ से नहीं जाएगा।

इसके विपरीत, अगर आपकी वर्तमान नौकरी में 5 साल पूरे होने में अभी 1 या 2 साल का लंबा समय बाकी है, तो केवल ग्रैच्युटी के लिए रुके रहना आपके करियर की ग्रोथ को रोक सकता है। आज के इस प्रतिस्पर्धी युग में करियर में लगातार आगे बढ़ना और नई स्किल्स सीखना बेहद जरूरी है। एक ही जगह बिना किसी बड़ी ग्रोथ के सिर्फ ग्रैच्युटी के लिए समय काटना आपकी मार्केट वैल्यू को कम कर सकता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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