किसी ने क्या खूब कहा है कि भाषाएं लोगों के साथ चलती हैं। उनके घरों में जाती हैं, बाजारों में घूमती हैं, गीतों में गुनगुनाती हैं और फिर एक दिन पता चलता है कि उन्होंने दूसरी भाषा के घर में भी अपनी जगह बना ली है। हिंदी और उर्दू के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
दोनों की अपनी साहित्यिक परंपराएं हैं। अपनी लिपियां हैं। अपनी पहचान है। वैसे जब बात हमारी रोजमर्रा की बोलचाल की आती है तो दोनों के बीच की दीवारें जैसे कहीं गायब हो जाती हैं। हम बोलते हिंदी हैं, लेकिन हमारी बातों में उर्दू के इतने शब्द घुले होते हैं कि कई बार खुद हमें पता नहीं चलता कि कौन सा शब्द कहां से आया और कब हमारी अपनी जुबान का हिस्सा बन गया।
हिंदी बोलते-बोलते उर्दू बोलने लगते हैं हम
जरा अपनी रोज की बातचीत पर गौर कीजिए। हम खबर पूछते हैं। बाजार जाते हैं। सवाल करते हैं और जवाब सुनते हैं। मौसम बदलता है तो उसका जिक्र करते हैं। किताब पढ़ते हैं, कागज पर लिखते हैं और दुनिया की बातें करते हैं। ये शब्द अब इतने अपने लगते हैं कि इनके साथ किसी दूसरी भाषा का ख्याल ही नहीं आता।
फिर आते हैं वे शब्द, जिनमें एक खास एहसास भी छिपा है- मोहब्बत, जिंदगी, रिश्ता, ख्वाब, इंतजार, सफर, चेहरा, एहसास, अंदाज। इनमें से किसी एक शब्द को हमारी रोजमर्रा की हिंदी से निकालकर देखिए। वाक्य शायद सही रह जाए, लेकिन उसकी आवाज बदल जाएगी। उसमें कुछ कमी सी महसूस होगी।
यही हिंदी और उर्दू का रिश्ता है। कागज पर दोनों को अलग-अलग समझना आसान है, लेकिन जिंदगी की बातचीत में दोनों को अलग करना उतना ही मुश्किल।
हिंदी 'मां' तो उर्दू है 'मौसी'
हिंदी और उर्दू का यह रिश्ता आज का नहीं है। यह सदियों की आवाजाही से बना है। भारतीय उपमहाद्वीप में अलग-अलग भाषाएं, बोलियां और संस्कृतियां एक-दूसरे से मिलती रहीं। बाजारों में, बस्तियों में, दरबारों में, गीतों में और आम लोगों की बातचीत में शब्द एक भाषा से दूसरी भाषा तक पहुंचते रहे।
इसी साझी जमीन ने एक ऐसी भाषाई दुनिया तैयार की, जिसे हिंदुस्तानी की परंपरा से भी जोड़ा जाता है। मुनव्वर राना का मशहूर शेर इस रिश्ते को कितनी खूबसूरती से कहता है-
“लिपट जाता हूं मां से और मौसी मुस्कुराती है,
मैं उर्दू में गजल कहता हूं हिंदी मुस्कुराती है।”
यही हिंदी और उर्दू की सबसे खूबसूरत तस्वीर है। दरबारों की भाषा अलग रही होगी। साहित्य की अपनी भाषा रही होगी। धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भों की अपनी शब्दावली रही होगी। लेकिन आम लोगों की जुबान ने इन सीमाओं को कभी बहुत गंभीरता से नहीं लिया। लोग मिले तो शब्द भी मिले और धीरे-धीरे एक-दूसरे के हो गए।
हिंदी को उर्दू से मिली नजाकत
उर्दू ने हिंदी को बोलने का एक खास अंदाज भी दिया। दरअसल किसी बात को सीधे कह देना एक बात है। उसी बात को थोड़ी नरमी, तहजीब और नजाकत के साथ कहना दूसरी।
उर्दू की रवायत ने हिंदी की अभिव्यक्ति में यही मिठास जोड़ी। संबोधन में एक अपनापन आया। बातचीत में एक तहजीब आई। भावनाओं को कहने के लिए कुछ ऐसे शब्द मिले, जिनमें अर्थ के साथ उनका एहसास भी सुनाई देता है। मसलन, प्यार और मोहब्बत दोनों का अर्थ हम समझते हैं। लेकिन दोनों शब्द सुनकर मन में उठने वाली तस्वीर एक जैसी नहीं होती।
इसी तरह सपना और ख्वाब, यात्रा और सफर, भावना और एहसास - शब्द अलग हैं, लेकिन भाव एक-दूसरे से हाथ मिलाते हैं। इसीलिए जब कोई व्यक्ति ‘मोहब्बत’ कहता है तो जरूरी नहीं कि वह उर्दू बोल रहा हो। वह शायद अपनी भावना के लिए वही शब्द चुन रहा है, जो उसे सबसे सुंदर और सबसे सटीक लगता है।
शायरी बनी दोनों भाषाओं के बीच पुल
अगर हिंदी और उर्दू के रिश्ते को समझना हो तो शायरी और कविता की दुनिया में चले जाइए। वहां शायद ही कोई ऐसा दरवाजा मिले जिस पर भाषा का पहरा हो। गजल हो या गीत। नज्म हो या कविता। प्रेम हो या विरह। इंतजार हो या तन्हाई। बारिश हो या जिंदगी। भावनाएं किसी एक भाषा की जागीर नहीं रहीं।
यही वजह है कि कोई शेर सुनते ही हिंदी का पाठक भी उसी तरह ठहर जाता है, जैसे उर्दू का जानकार। उसे हर शब्द का व्याकरण भले न पता हो, लेकिन उसका मतलब दिल तक पहुंच जाता है। साहित्य की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह शब्दों से पहले भावनाओं को समझता है।
कविता और शायरी ने वह काम किया, जो भाषा की बहसें नहीं कर सकीं। उन्होंने लोगों को यह एहसास कराया कि अलग लिपि का मतलब अलग संवेदना नहीं होता। देवनागरी में लिखा कोई भाव उर्दू पढ़ने वाला समझ सकता है। उर्दू की लिपि में लिखा कोई एहसास हिंदी जानने वाले के दिल तक पहुंच सकता है।
सिनेमा ने पहुंचाई यह जुबान घर-घर
फिर हिंदी सिनेमा आया और इस साझी भाषा को करोड़ों लोगों तक पहुंचा दिया। फिल्मों के संवाद, गीत और शायरी हमारी बातचीत का हिस्सा बनने लगे। पर्दे पर बोले गए शब्द घरों में दोहराए जाने लगे। गीतों में आए शब्द लोगों की अपनी भावनाओं की आवाज बन गए।
मोहब्बत, इश्क, दोस्त, ख्वाब, वादा, दर्द, तन्हाई, मंजिल, सफर जैसे शब्द सिर्फ फिल्मों के नहीं रहे। वे हमारी अपनी जिंदगी में उतर आए। कभी किसी गीत ने प्रेम को आवाज दी। कभी किसी संवाद ने जुदाई को। कभी किसी शेर ने वह बात कह दी, जिसे हम खुद कह नहीं पाए। इसीलिए हिंदी सिनेमा की भाषा में उर्दू की मिठास आज भी इतनी असरदार लगती है।
किसी एक की जागीर नहीं रहती भाषा
आज भाषा के सामने एक नई दुनिया है। यहां हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के शब्द बिना किसी झिझक के एक ही वाक्य में साथ चलते हैं। नई पीढ़ी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शब्द की जड़ कहां है। उसे फर्क पड़ता है तो बस इस बात से कि बात दिल तक पहुंच रही है या नहीं। शायद यही भाषा की असली ताकत है। शब्द सफर करते हैं। सरहदें पार करते हैं। नए अर्थ पाते हैं और फिर किसी नई जुबान में अपना घर बना लेते हैं।
आज की हिंदी से उर्दू को अलग करके देखना कुछ वैसा ही है जैसे किसी पुराने शहर से उसकी गलियों की आवाजें छीन लेना। हमारी बोलचाल में संस्कृत है, उर्दू है, फारसी और अरबी के रंग हैं, अंग्रेजी के नए शब्द हैं और इन सबको मिलाकर जो भाषा बनती है, वही हमारी अपनी आवाज है।
आखिर भाषा किसी एक की जागीर तो है नहीं। वह जिसे लोग बोलते हैं, वही उसकी होती जाती है। हिंदी-उर्दू के रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात भी यही है कि हमने शब्दों से कभी उनका परिचय पत्र नहीं मांगा। जो शब्द दिल को भाया, उसे अपना लिया।
