बिजनेस

किस वजह से बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम? ये हैं वो 4 बड़े कारण जिन्होंने बिगाड़ा आपका बजट

दुनियाभर में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल ने आपके घर का बजट बिगाड़ दिया है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अचानक आई इस भारी तेजी के पीछे ईरान युद्ध और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसे 4 मुख्य कारण जिम्मेदार हैं।

Image

pakistan Gold (2)

देशभर में पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल और डीजल (Petrol diesel price) की कीमतों में जो भारी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है, उसने आम आदमी की चिंता बढ़ा दी है। मिडिल क्लास जो पहले ही बढ़ती महंगाई से जूझ रहा था, उसके लिए ₹3 प्रति लीटर तक की यह वृद्धि किसी बड़े झटके से कम नहीं है। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि तेल कंपनियों को दाम बढ़ाने पड़े? इसका जवाब केवल घरेलू राजनीति में नहीं, बल्कि सात समंदर पार चल रही वैश्विक हलचलों में छिपा है। मुख्य रूप से चार ऐसे बड़े कारण हैं जिन्होंने मिलकर तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया है।

ये हैं वो 4 बड़े कारण

वजह नंबर 1: ईरान युद्ध और सप्लाई चेन पर संकट

पेट्रोल-डीजल महंगा होने की सबसे प्राथमिक और तात्कालिक वजह है मध्य-पूर्व (Middle East) में बढ़ता तनाव, विशेष रूप से ईरान के आसपास के युद्ध जैसे हालात। ईरान दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है और वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) जैसे रास्तों से होकर गुजरता है। युद्ध की आहट और तनाव की वजह से इस समुद्री रास्ते से होने वाली सप्लाई बाधित होने का डर पैदा हो गया है। जब सप्लाई कम होती है और मांग बनी रहती है, तो कीमतें बढ़ना स्वाभाविक है। इसी डर ने वैश्विक स्तर पर तेल की उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता पैदा कर दी है।

वजह नंबर 2: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़ते दाम

भारतीय तेल कंपनियां अपनी जरूरत का करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा कच्चा तेल (Crude Oil) विदेशों से खरीदती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें पिछले कुछ समय में काफी ऊपर चली गई हैं। जब वैश्विक बाजार में प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो भारतीय रिफाइनरियों के लिए इसे खरीदना महंगा हो जाता है। इसी बढ़ी हुई लागत की भरपाई करने के लिए सरकारी और निजी तेल कंपनियां घरेलू बाजार में पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम बढ़ा देती हैं।

वजह नंबर 3: भारतीय तेल कंपनियों को हो रहा नुकसान

पिछले काफी समय से अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद घरेलू बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश की जा रही थी। इस वजह से इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी कंपनियों को अंडर-रिकवरी यानी घाटे का सामना करना पड़ रहा था। कंपनियां अपनी लागत और मुनाफे के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही थीं। जब घाटा सहने की क्षमता कम होने लगी और कच्चा तेल लगातार महंगा बना रहा, तो कंपनियों ने अपनी वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए इस बढ़ी हुई कीमत का बोझ अंततः ग्राहकों की जेब पर डाल दिया।

वजह नंबर 4: वैश्विक अनिश्चितता और आर्थिक कारक

दुनियाभर में चल रही आर्थिक और राजनीतिक अनिश्चितता भी इसकी एक बड़ी वजह है। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत में गिरावट आने से भारत के लिए कच्चे तेल का आयात और भी महंगा हो गया है क्योंकि तेल का भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। इसके अलावा, वैश्विक निवेश बाजार में अनिश्चितता के कारण भी जिंसों (Commodities) की कीमतों में सट्टेबाजी बढ़ जाती है, जिससे तेल के भाव चढ़ते हैं। इन तमाम वैश्विक कारकों ने मिलकर एक ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ तेल की कीमतों को नियंत्रित करना सरकार और कंपनियों के लिए मुश्किल हो गया है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

और पढ़ें
End of Article