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हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में पूरा पैसा क्यों नहीं मिलता?

अस्पताल में भर्ती होने के बाद अक्सर लोग सोचते हैं कि हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में पूरा पैसा क्यों नहीं मिला। रूम रेंट लिमिट से लेकर नॉन-मेडिकल आइटम तक, वे 6 मुख्य वजहें जिनकी वजह से इंश्योरेंस कंपनियां बिल में कटौती करती हैं।

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हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम में पूरा पैसा क्यों नहीं मिलता?

स्वास्थ्य संबंधी आपातकाल (Medical Emergency) के समय हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी एक बड़े वित्तीय ढाल का काम करती है। हालांकि, अस्पताल में इलाज कराने के बाद जब क्लेम सेटलमेंट का समय आता है, तो अक्सर पॉलिसीधारकों को झटका लगता है। कई बार अस्पताल का कुल बिल 5 लाख रुपये होता है, लेकिन इंश्योरेंस कंपनी केवल 3.5 या 4 लाख रुपये ही पास करती है। लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि बीमा कंपनी ने बाकी पैसे क्यों काट लिए। असल में, क्लेम राशि में होने वाली यह कटौती (Deductions) पॉलिसी में दिए गए कुछ खास नियमों, शर्तों और लिमिटेशंस के कारण होती है।

क्यों कटता है हेल्थ इंश्योरेंस का पैसा?

कटौती का सबसे बड़ा और मुख्य कारण रूम रेंट कैपिंग (Room Rent Limit) होता है। ज्यादातर हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों में रोजाना के कमरे के किराये पर एक निश्चित सीमा (जैसे सम एश्योर्ड का 1% या 2%) तय होती है। अगर आप अपनी लिमिट से महंगा कमरा चुनते हैं, तो इंश्योरेंस कंपनी न केवल कमरे का अतिरिक्त किराया काटती है, बल्कि 'प्रोपोर्शनेट डिडक्शन' (Proportionate Deduction) नियम लागू करके डॉक्टर की फीस, सर्जरी और नर्सिंग जैसे अनुपातिक खर्चों पर भी कटौती कर देती है।

दूसरा मुख्य कारण नॉन-मेडिकल आइटम्स (Non-Medical Expenses) का बिल में शामिल होना है। बीमा कंपनियां अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले डिस्पोजेबल सामान जैसे पीपीई किट, दस्ताने (Gloves), मास्क, थर्मामीटर, सिरिंज, वाइप्स, कॉटन और एडमिशन फीस आदि का भुगतान नहीं करती हैं। IRDAI के नियमानुसार इन्हें कंज्यूमेबल्स माना जाता है और इनका खर्च मरीज को खुद अपनी जेब से उठाना पड़ता है, जब तक कि उसने कंज्यूमेबल कवर ऐड-ऑन (Add-on Cover) न लिया हो।

तीसरी वजह को-पेमेंट (Co-Payment) और डिडक्टिबल्स (Deductibles) की शर्त है। कई पॉलिसियों में, विशेषकर सीनियर सिटीजन पॉलिसियों में, 10% से 20% तक का को-पेमेंट क्लॉज होता है। इसका मतलब है कि क्लेम का उतना प्रतिशत हिस्सा पॉलिसीधारक को खुद चुकाना होगा।

इसके अलावा, चौथा कारण प्रोसीजर कैपिंग या सब-लिमिट (Sub-limits) है। कई बीमारियों जैसे मोतियाबिंद (Cataract), किडनी स्टोन या नी रिप्लेसमेंट के इलाज पर बीमा कंपनियां एक अधिकतम सीमा तय कर देती हैं। भले ही आपका सम एश्योर्ड 10 लाख हो, लेकिन अगर मोतियाबिंद की सब-लिमिट 40,000 रुपये है, तो कंपनी उससे ज्यादा का भुगतान नहीं करेगी।

पांचवां कारण प्री और पोस्ट हॉस्पिटलाइजेशन की समय सीमा और गलत बिलिंग होती है। अस्पताल में भर्ती होने से पहले (Pre) और डिस्चार्ज के बाद (Post) के दवा-जांच के बिलों को तय समय (जैसे 30 या 60 दिन) के भीतर जमा न करने पर वे रिजेक्ट हो जाते हैं। छठा कारण मेडिकल इंश्योरेंस क्लेम फॉर्म में सही दस्तावेज या ओरिजिनल बिल न देना है। क्लेम में कटौती से बचने के लिए पॉलिसी लेते समय ही रूम रेंट लिमिट, कंज्यूमेबल कवर और सब-लिमिट्स को ध्यान से पढ़ें और हमेशा नेटवर्क अस्पताल में ही कैशलेस सुविधा का लाभ उठाएं।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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