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Explained: इनफॉर्मल इकोनॉमी क्या है? सिस्टम से बाहर लेकिन अर्थव्यवस्था की जान! कैसे करोड़ों भारतीयों का है सहारा

Informal Economy Explained: इनफॉर्मल इकोनॉमी बिना रजिस्ट्रेशन और बिना सोशल सिक्योरिटी के चलने वाली आर्थिक गतिविधियां हैं। भारत की करीब 90% वर्कफोर्स इसमें शामिल है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं।

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भारत की इनफॉर्मल इकोनॉमी का पूरा सच (तस्वीर-AI)
Authored by: रामानुज सिंह
Updated Oct 4, 2026, 15:03 IST
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Informal Economy Explained : भारत में लाखों लोग ऐसे काम करते हैं जो किसी बड़ी कंपनी या सरकारी संस्था के तहत नहीं आते। कोई सड़क किनारे दुकान लगाता है, कोई घर से छोटा कारोबार करता है, कोई दिहाड़ी मजदूरी करता है तो कोई छोटे स्तर पर सामान बनाकर बेचता है। ऐसे काम और उनसे जुड़ी नौकरियों को आम तौर पर इनफॉर्मल इकोनॉमी यानी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा कहा जाता है। नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस यानी NSO की Annual Survey of Unincorporated Sector Enterprises (ASUSE) 2025 रिपोर्ट ने भारत के इस बड़े क्षेत्र की तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में करीब 7.92 करोड़ गैर-कृषि अनइनकॉरपोरेटेड संस्थान हैं। इनमें 12.8 करोड़ से ज्यादा लोग काम करते हैं।

इनफॉर्मल इकोनॉमी क्या होती है?

आसान शब्दों में समझें तो ऐसी आर्थिक गतिविधियां, जो पूरी तरह औपचारिक कानूनी और संस्थागत व्यवस्था के दायरे में नहीं आतीं, इनफॉर्मल इकोनॉमी का हिस्सा होती हैं। इनमें ऐसे छोटे कारोबार शामिल हो सकते हैं जो कंपनी के रूप में रजिस्टर्ड नहीं हैं या जिनका कारोबार तय कानूनी सीमा से कम है। इसी तरह ऐसी नौकरियां भी इनफॉर्मल रोजगार का हिस्सा हो सकती हैं, जिनमें लिखित नौकरी का समझौता, सामाजिक सुरक्षा या पेड छुट्टी जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ILO यानी इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन इनफॉर्मल सेक्टर और इनफॉर्मल रोजगार को अलग-अलग तरीके से देखता है। इनफॉर्मल सेक्टर मुख्य रूप से छोटे और अनइनकॉरपोरेटेड कारोबारों से जुड़ा है, जबकि इनफॉर्मल रोजगार का संबंध ऐसी नौकरियों से है जिनमें सामाजिक सुरक्षा और कानूनी रोजगार सुविधाओं की कमी होती है।

इनफॉर्मल सेक्टर की पहचान कैसे होती है?

इनफॉर्मल कारोबारों में कई सामान्य बातें देखने को मिलती हैं। अक्सर कारोबार और उसके मालिक की कानूनी पहचान अलग नहीं होती। यानी कारोबार में नुकसान होने पर मालिक की निजी संपत्ति भी जोखिम में आ सकती है। ऐसे कारोबारों में आधुनिक मशीनों की जगह ज्यादा लोगों के काम करने और पारंपरिक तरीकों पर निर्भरता देखी जाती है। कई छोटे कारोबारों में पूरी तरह व्यवस्थित अकाउंटिंग या ऑडिट की व्यवस्था भी नहीं होती। काम करने वाले लोगों को भी कई बार भविष्य निधि, स्वास्थ्य बीमा, ग्रेच्युटी या पेड छुट्टी जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। कई जगह नौकरी का समझौता लिखित होने के बजाय केवल मौखिक होता है। इससे नौकरी की सुरक्षा कम हो जाती है।

भारत में कितने लोग इनफॉर्मल काम करते हैं?

भारत की रोजगार व्यवस्था में इनफॉर्मल सेक्टर की भूमिका बहुत बड़ी है। स्रोत के मुताबिक, देश के करीब 90 प्रतिशत वर्कफोर्स को इनफॉर्मल रोजगार की स्थिति में माना जाता है। PLFS 2025 के अनुसार, कुल रोजगार में करीब 56.2 प्रतिशत लोग स्वरोजगार से जुड़े हैं। इनमें अपने छोटे कारोबार चलाने वाले और परिवार के कारोबार में बिना वेतन मदद करने वाले लोग शामिल हैं। करीब 20.2 प्रतिशत लोग कैजुअल लेबर यानी दिहाड़ी या अस्थायी काम करते हैं। निर्माण, खेती और शहरी दिहाड़ी मजदूरी में ऐसे काम ज्यादा दिखाई देते हैं। वहीं करीब 23.6 प्रतिशत लोग नियमित वेतन या सैलरी पाने वाले हैं। लेकिन इनमें से भी कई लोगों के पास लिखित नौकरी का कॉन्ट्रैक्ट या सामाजिक सुरक्षा की सुविधा नहीं होती।

देश की अर्थव्यवस्था में कितना योगदान?

इनफॉर्मल सेक्टर केवल रोजगार देने तक सीमित नहीं है। इसका देश की अर्थव्यवस्था में भी बड़ा योगदान है। स्रोत के अनुसार, यह क्षेत्र भारत के कुल GDP में करीब 45 प्रतिशत योगदान देता है। यानी छोटे दुकानदार, कारीगर, दिहाड़ी मजदूर, छोटे निर्माता और दूसरे अनौपचारिक काम देश की आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा संभालते हैं।

छोटी दुकान से दिहाड़ी मजदूरी तक... भारत की इनफॉर्मल इकोनॉमी में आखिर कितने करोड़ लोग? (तस्वीर-istock)

छोटी दुकान से दिहाड़ी मजदूरी तक... भारत की इनफॉर्मल इकोनॉमी में आखिर कितने करोड़ लोग? (तस्वीर-istock)

डिजिटल तकनीक से बदल रही तस्वीर

अब इनफॉर्मल इकोनॉमी भी धीरे-धीरे डिजिटल हो रही है। UPI और छोटे दुकानदारों के QR कोड ने छोटे कारोबारों के लेनदेन को डिजिटल बनाया है। इससे कारोबार के पास डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड बन सकता है। बैंक और वित्तीय संस्थान इस रिकॉर्ड के आधार पर कारोबार की आमदनी और कैश के प्रवाह को समझ सकते हैं। इससे छोटे कारोबारों के लिए कर्ज हासिल करना आसान हो सकता है। ASUSE 2025 के अनुसार इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले प्रतिष्ठानों की हिस्सेदारी 2023-24 के 26.7 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 39.4 प्रतिशत हो गई।

ई-श्रम से मिल रही पहचान

सरकार ने असंगठित क्षेत्र के कामगारों की पहचान के लिए e-Shram पोर्टल शुरू किया है। स्रोत के अनुसार 31.78 करोड़ से ज्यादा असंगठित कामगार इस पोर्टल पर रजिस्टर हो चुके हैं। इससे कामगारों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार हो रहा है। इसका उद्देश्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाना है।

गिग इकोनॉमी भी बढ़ रही है

आज के समय में इनफॉर्मल काम का एक नया रूप गिग इकोनॉमी के रूप में सामने आया है। ऐप के जरिए डिलीवरी, कैब, होम सर्विस और दूसरे काम करने वाले लोग इसका हिस्सा हैं। ऐसे काम में लोगों को अपने समय के हिसाब से काम करने की सुविधा मिल सकती है। लेकिन दूसरी तरफ उनकी आमदनी अस्थिर हो सकती है। कई गिग वर्कर पारंपरिक कर्मचारियों की तरह न्यूनतम वेतन, स्वास्थ्य सुरक्षा या अन्य रोजगार अधिकारों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं होते।

इनफॉर्मल इकोनॉमी की सबसे बड़ी समस्याएं

इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्याओं में कम उत्पादकता, कर्ज मिलने में दिक्कत और सामाजिक सुरक्षा की कमी शामिल हैं। छोटे कारोबारों के पास आधुनिक मशीनें और तकनीक नहीं होने के कारण एक कर्मचारी उतना उत्पादन नहीं कर पाता जितना आधुनिक तकनीक वाले औपचारिक कारोबार में हो सकता है। दूसरी समस्या कर्ज की है। बैंक आम तौर पर कर्ज देने के लिए संपत्ति, ऑडिट किए गए खातों और क्रेडिट रिकॉर्ड जैसी चीजें देखते हैं। छोटे कारोबारों के पास ये दस्तावेज अक्सर नहीं होते। इसलिए उन्हें बैंक से कर्ज मिलने में परेशानी होती है और उन्हें माइक्रोफाइनेंस या निजी उधारदाताओं पर निर्भर रहना पड़ सकता है।

गर्मी और मौसम की मार भी बड़ी चुनौती

इनफॉर्मल कामगारों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो बाहर काम करते हैं। निर्माण मजदूर, किसान और डिलीवरी वर्कर इसका उदाहरण हैं। तेज गर्मी और खराब मौसम का सीधा असर उनकी कमाई पर पड़ सकता है। अगर कोई मजदूर गर्मी की वजह से काम नहीं कर पाता तो उसकी रोज की कमाई भी प्रभावित होती है। स्रोत के अनुसार, 2030 तक गर्मी के कारण बाहर काम करने वाले अनौपचारिक श्रमिकों को औसतन 22.5 कामकाजी दिन सालाना गंवाने का अनुमान है।

सरकार की ओर से क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

इनफॉर्मल इकोनॉमी को औपचारिक व्यवस्था से जोड़ने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। Code on Social Security, 2020 का उद्देश्य असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म कामगारों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना है। Udyam Assist Platform छोटे और अनरजिस्टर्ड कारोबारों को औपचारिक पहचान दिलाने में मदद करता है। इससे वे बैंकिंग व्यवस्था और प्राथमिकता वाले क्षेत्र के कर्ज तक पहुंच बना सकते हैं। PM SVANidhi के जरिए सड़क किनारे काम करने वाले विक्रेताओं को छोटे कारोबार के लिए कर्ज दिया जाता है। समय पर कर्ज चुकाने पर कर्ज की राशि आगे बढ़ सकती है। PM Vishwakarma योजना पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण, औपचारिक पहचान और बाजार से जोड़ने पर जोर देती है।

फॉर्मल और इनफॉर्मल इकोनॉमी में क्या अंतर है?

फॉर्मल इकोनॉमी में कारोबार आम तौर पर सरकारी संस्थाओं के पास रजिस्टर्ड होते हैं। कर्मचारियों को लिखित रोजगार कॉन्ट्रैक्ट, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी सुरक्षा मिलने की व्यवस्था होती है। कारोबार टैक्स व्यवस्था से भी जुड़ा होता है। इसके उलट इनफॉर्मल इकोनॉमी में कारोबार अनरजिस्टर्ड या छोटे स्तर पर हो सकते हैं। कर्मचारियों के पास लिखित कॉन्ट्रैक्ट और सामाजिक सुरक्षा की सुविधा नहीं होती। आमदनी भी रोज की मजदूरी, काम की मात्रा या मौसम के हिसाब से बदल सकती है।

भारत के लिए चुनौती यह है कि इनफॉर्मल कारोबारों को केवल नियमों के जरिए औपचारिक बनाने के बजाय उन्हें बढ़ने के लिए आसान रास्ता दिया जाए। छोटे कारोबारों के लिए आसान टैक्स व्यवस्था, डिजिटल रिकॉर्ड के आधार पर कर्ज, बेहतर मशीनों तक पहुंच, कौशल प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना जरूरी है। साथ ही गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को भी बेहतर सुरक्षा देने की जरुरत है। सरकार के सामने लक्ष्य ऐसा औपचारिकरण होना चाहिए जिसमें छोटे कारोबार और कामगार अपनी आजीविका खोए बिना औपचारिक व्यवस्था से जुड़ सकें।

कुल मिलाकर, इनफॉर्मल इकोनॉमी भारत की अर्थव्यवस्था का कोई छोटा हिस्सा नहीं है। यह करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी से जुड़ी है और देश के उत्पादन में भी बड़ी भूमिका निभाती है। इसलिए इसका औपचारिकरण केवल कागजी रजिस्ट्रेशन का काम नहीं, बल्कि कामगारों को बेहतर आय, सुरक्षा, कर्ज और सम्मानजनक काम से जोड़ने की प्रक्रिया होना चाहिए।

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