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युद्ध की मार अब कपड़ों पर! त्योहारी सीजन में T-Shirt से लेकर Jeans खरीदना होगा महंगा, जानें क्यों?

मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध ने ग्लोबल फैशन सप्लाई चेन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इसका असर एशिया के बड़े मैन्युफैक्चरिंग हब से लेकर भारत के रिटेल स्टोर्स तक दिखाई दे सकता है।

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कपड़ा खरीदना महंगा होगा

अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध का असर अब सिर्फ कच्चे तेल, गैस और ट्रांसपोर्ट की लागत तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी आंच वैश्विक कपड़ा उद्योग तक पहुंचने लगी है। इसका असर इस त्योहारी सीजन में दिखाई दे सकता है। T-Shirt, Jeans से लेकर दूसरे कपड़ों खरीदने के लिए आपको अधिक जेब ढीली करनी पड़ सकती है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल ईस्ट में अशांति से कपड़ा बनाने में इस्तेमाल होने वाले पॉलिएस्टर और कॉटन की कीमत कफी बढ़ गई है। इसके साथ ही शिपिंग और उत्पादन लागत भी लगातार बढ़ रही है। इसका असर कपड़ों की कीमत पर पड़ना तय है।

पॉलिएस्टर और कॉटन दोनों हुए महंगे

कपड़े बनाने में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले दो प्रमुख फाइबर कॉटन और पॉलिएस्टर हैं। मौजूदा हालात में दोनों की कीमतों पर एक साथ दबाव बन रहा है। यह स्थिति कपड़ा कंपनियों के लिए ज्यादा मुश्किल पैदा कर रही है, क्योंकि आमतौर पर एक फाइबर महंगा होने पर कंपनियां दूसरे विकल्प का इस्तेमाल कर लेती हैं। युद्ध के बाद कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से पॉलिएस्टर की लागत बढ़ी है। पॉलिएस्टर पेट्रोलियम से बनने वाला सिंथेटिक फाइबर है, इसलिए तेल महंगा होने का सीधा असर इसकी कीमत पर पड़ता है।

Bloomberg के मुताबिक, बांग्लादेश की एक फैक्ट्री को युद्ध शुरू होने के कुछ ही हफ्तों में पॉलिएस्टर धागे की कीमत में करीब 25% तक की बढ़ोतरी देखने को मिली। दूसरी ओर, कॉटन की कीमतें भी बढ़ी हैं। सप्लाई को लेकर चिंता, उर्वरक की कमी और मौसम संबंधी जोखिमों ने कॉटन मार्केट पर दबाव बढ़ाया है। इसके चलते कपड़ों की कीमतों में 10% से 20% तक की बढ़ोतरी हो सकती है।

इन उत्पादों की कीमत भी बढ़ी

कपड़े की कीमत बढ़ने के पीछे सिर्फ कॉटन और पॉलिएस्टर ही जिम्मेदार नहीं हैं। डाई, केमिकल, तेल, गैस, बिजली और ट्रांसपोर्ट जैसे खर्च भी बढ़ रहे हैं। एक बेसिक T-Shirt की लागत में करीब 60% हिस्सा कच्चे माल का होता है। वहीं फैक्ट्री का मार्जिन सिर्फ करीब 2-3% रहता है। ऐसे में अगर कच्चा माल और दूसरी इनपुट लागत तेजी से बढ़ती है, तो मैन्युफैक्चरर्स के पास लागत का बोझ खुद उठाने की ज्यादा गुंजाइश नहीं रहती।

भारत के कपड़ा उद्योग पर भी असर

भारत दुनिया के बड़े टेक्सटाइल और कपड़ा सोर्सिंग सेंटरों में शामिल है। लेकिन बढ़ती लागत और कमजोर ग्लोबल डिमांड का दबाव भारतीय एक्सपोर्ट पर भी दिख रहा है। Bloomberg की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का रेडीमेड गारमेंट एक्सपोर्ट जुलाई में सालाना आधार पर 4.5% घटा। वित्त वर्ष के पहले चार महीनों में शिपमेंट में करीब 10.5% की कमी दर्ज की गई। यानी एक तरफ उत्पादन लागत बढ़ रही है और दूसरी तरफ विदेशी बाजारों में मांग कमजोर पड़ रही है। यह स्थिति भारतीय कंपनियों के लिए दोहरी चुनौती बन गई है।

त्योहारी सीजन में महंगाई का झटका

भारत में त्योहारी सीजन कपड़ों की खरीदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ में लोग जमकर खरीदारी करते हैं। अगर युद्ध के कारण कॉटन, पॉलिएस्टर, ऊर्जा और ट्रांसपोर्ट लागत लंबे समय तक ऊंची रहती है, तो आने वाले महीनों में कपड़े खरीदना महंगा हो सकता है। यानी इस बार त्योहारों पर नई T-Shirt, Jeans या दूसरे कपड़े खरीदने से पहले आपको ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, कीमत कितनी बढ़ेगी, यह युद्ध की अवधि, कच्चे तेल और फाइबर की कीमतों के साथ-साथ कंपनियों की रणनीति पर निर्भर करेगा।

Alok Kumar
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव रखने वाले आलोक ने अपने पत्रकारिता करियर में कई प्रमुख कॉर्पोरेट इवेंट्स और चर्चित स्टोरीज कवर की हैं। वह बिजनेस, बैंकिंग, शेयर मार्केट और पर्सनल फाइनेंस पर गहरी समझ रखते हैं और जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और पाठक-केंद्रित तरीके से प्रस्तुत करने में माहिर हैं। अब तक आलोक ने लगभग 18,000 स्टोरीज लिखी हैं। उनकी लेखन शैली भरोसेमंद, विश्लेषणात्मक और व्यावहारिक जानकारी देने वाली होती है।

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