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H-1B Visa पर अमेरिकी सख्ती, चीन ने खोले दरवाजे- लेकर आया K वीजा प्रोग्राम, जानें क्या है ड्रैगन की मंशा?

H-1B की तरह स्पॉन्सरशिप और लॉटरी सिस्टम की दिक्कतें K-वीजा में नहीं होंगी। यह रिसर्च और एंटरप्रेन्योरशिप दोनों के लिए दरवाजे खोलता है। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं जैसे क्लियर गाइडलाइन की कमी, ट्रांसपेरेंसी पर सवाल और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी को लेकर आशंकाएं।

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चीन K वीजा प्रोग्राम

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगतार अटपटे फैसले ले रहे हैं। दुनियाभर के कई देशों पर भारी टैरिफ लगाने के बाद अब उन्होंने H-1B वीजा की फीस में भारी बढ़ोतरी का ऐलान किया है। इसका सबसे अधिक असर भारतीय पेशेवरों पर होने की आशंका है, क्योंकि कुल एच-1बी वीजा का करीब 77% इस्तेमाल भारतीय आईटी कंपनियों के पेशेवरों द्वारा किया जाता है। ट्रंप के इस फैसले की जबरदस्त आलोचना हो रही है। इस बीच ट्रंप प्रशासन ने साफ किया है कि नया नियम सिर्फ नए वीजा पर लागू होगा। आपको बता दें कि ट्रंप सरकार ने हाल ही में H-1B वीजा की फीस लगभग 1.5-4 हजार डॉलर से बढ़ाकर 1 लाख डॉलर प्रति वर्ष करने का ऐलान किया है।

इस बीच चीन ने नया दांव खेल दिया है। चीन ने AI, बायोटेक्नोलॉजी, बायोइंजीनियरिंग, ग्रीन एनर्जी, डेटा साइंस और बिजनेस एनालिस्ट फिल्ड में दुनियाभर के युवाओं को आकर्षित करने के लिए K वीजा प्रोग्राम का ऐलान किया है। चीन की स्टेट काउंसिल ने 1 अक्टूबर 2025 से नया K वीजा प्रोग्राम शुरू करने को मंजूरी दी है। आइए जानते हैं कि क्या है K वीजा और इससे किसे फायदा मिलेगा? साथ ही यह भी जानेंगे कि क्या चीन बीजिंग को सिलिकॉन वैली 2.0 बनाना चाह रहा है?

क्या है K-वीजा?

चीन में मौजूदा 12 वीज़ा कैटेगरी की तुलना में K-वीजा ज्यादा लचीला और आसान माना जा रहा है। इस वीजा के तहत मल्टीपल एंट्री और लंबे समय तक रहने की सुविधा मिलेगी। चीन की स्टेट काउंसिल के अनुसार, K-वीजा उन विदेशी युवा वैज्ञानिकों और तकनीकी टैलेंट को मिलेगा, जिन्होंने चीन या विदेश की किसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी/रिसर्च संस्थान से STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) में बैचलर या उससे ऊंची डिग्री हासिल की हो। यह वीजा एजुकेशन और रिसर्च फिल्ड से जुड़े युवाओं के लिए भी उपलब्ध होगा।

कौन कर सकता है आवेदन?

मिली जानकारी के अनुसार, K-वीजा के लिए आवेदन करने वाले पेशेवरों के पास चीनी अधिकारियों द्वारा निर्धारित योग्यताएं होना जरूरी होगा। विदेशों में चीनी दूतावासों द्वारा इस वीजा के लिए आवश्यक दस्तावेजों की सूची जारी की जाएगी। इसमें शैक्षिक योग्यता का प्रमाण और पेशेवर या शोध कार्य का प्रमाण देना होगा।

चीन की नई चाल

अमेरिका की सख्ती के बीच चीन ने अगस्त में K वीजा पॉलिसी शुरू की है। इसके तहत कोई भी विदेशी बिना कन्फर्म नौकरी के चीन में एंट्री ले सकता है। यह दरअसल बीजिंग की कोशिश है कि वह ग्लोबल टैलेंट को आकर्षित करके अपने टेक और डिजिटल इकोनॉमी सेक्टर को मजबूत करे।

भारत के लिए अवसर या खतरा?

भारतीय IT कंपनियां अमेरिकी निर्भरता कम करके चीन और एशिया-प्रशांत बाजारों में पैठ बना सकती हैं। हालांकि, यह इतना आसान नहीं है। चीन में ऊंचे ऑपरेशन खर्च, राजनीतिक जोखिम और रेगुलेटरी जटिलताएं पूरी तरह से वहां शिफ्ट होना मुश्किल बनाती हैं। चीन में अमेरिका जैसी पारदर्शिता नहीं है। ऐसे में भारतीय पेशवरों के लिए अमेरिका जैसा चीन में सहज महसूस करना मुश्किल होगा। इसलिए H-1B visa के मुकाबले K-वीजा अभी उतना आकर्षक विकल्प नहीं बन सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन का यह कदम ग्लोबल STEM टैलेंट को अपनी ओर खींचने की कोशिश है। हालांकि, यह देखना बाकी है कि K-वीजा अमेरिका और यूरोप की तरह ही करियर ग्रोथ दिला पाएगा या नहीं?

H-1B वीजा से तुलना

H-1B की तरह स्पॉन्सरशिप और लॉटरी सिस्टम की दिक्कतें K-वीजा में नहीं होंगी। यह रिसर्च और एंटरप्रेन्योरशिप दोनों के लिए दरवाजे खोलता है। लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं जैसे क्लियर गाइडलाइन की कमी, ट्रांसपेरेंसी पर सवाल और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी को लेकर आशंकाएं। वीजा मिलने के बाद भी सवाल यह रहेगा कि क्या विदेशी प्रोफेशनल चीन में लंबे समय तक रहना चाहेंगे? भाषा, कल्चर, ओपननेस और करियर प्रॉस्पेक्ट्स जैसे मुद्दों पर चीन अभी भी अमेरिका और यूरोप से पीछे है। कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब अभी मिलना बाकी है।

K वीजा

K वीजा

आगे के सवाल

  • क्या चीन मेरिट-आधारित क्लियर क्राइटेरिया जारी करेगा?
  • क्या वीजा प्रोसेसिंग बाकी देशों से तेज होगी?
  • क्या विदेशी टैलेंट को ग्रांट, हाउसिंग और करियर पाथ दिए जाएंगे?
  • क्या भारतीय प्रोफेशनल इसे अवसर मानेंगे या भू-राजनीतिक जोखिम?

क्या बीजिंग को सिलिकॉन वैली बनाना चाहता है चीन?

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन तेजी से तरक्की जरूर कर रहा है लेकिन कई मायनो में वह अमेरिका से काफी पीछे है। इसी को देखते हुए चीन लगातार अपनी नीतियों में बदलाव कर रहा है। चीन की तैयारी बीजिंग को सिलिकॉन वैली बनाने की है। अभी तक उसे इसमें बहुत सफलता नहीं मिली हैं चीन में बहुत कम विदेशी मूल के कर्मचारी हैं - सिलिकॉन वैली जैसी जगहों के विपरीत, जहां लगभग 70 प्रतिशत कर्मचारी संयुक्त राज्य अमेरिका के बाहर के हैं। प्रतिभा को आकर्षित करने के लिए, चीन ने 2004 में एक स्थायी निवास योजना शुरू की, लेकिन 2018 तक केवल 12,000 ग्रीन कार्ड जारी किए गए थे। कोरोना महामारी के दौरान और उसके बाद चीन से प्रवासियों का पलायन भी हुआ। ऐसे में चीन की यह नई कवायद विदेशी टैलेंस को आकर्षित करने के साथ अपनी छवि को बेहतर बनाने की है।

Alok Kumr
आलोक कुमार author

आलोक कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में एसोसिएट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं। इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और प्रिंट मीडिया में 17 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभ... और देखें

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