अगर पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने से पेट्रोल सस्ता नहीं होता, माइलेज 3 से 5% तक घट जाता है और सोशल मीडिया पर इंजन खराब होने के दावे किए जा रहे हैं। इसके बाद भी सरकार Ethanol Blending के फैसले पर मजबूती से टिकी है। अब सरकार ने उन तमाम सवालों के जवाब भी दिए हैं, जिनके आधार पर सरकार की इस नीति को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग से जुड़े तमाम सवालों के जवाब 14 पन्नों के विस्तृत FAQ में दिए हैं। यहां हम इन FAQ के आधार पर यह विश्लेषण कर रहे हैं कि महंगा और कम एफिशिएंट होने के बाद भी इथेनॉल ब्लेंडिंग क्यों जरूरी है। इसके साथ ही जानेंगे कि क्या सरकार इसे लागू करने में जल्दबाजी कर रही है। क्यों E5 और E10 वाहनों को अलग से फ्यूल नहीं दिया जा सकता है?
सबसे पहले समझें E20 क्या?
E20 का मतलब है कि 1 लीटर पेट्रोल में 20% इथेनॉल और 80% पेट्रोल होता है। इथेनॉल गन्ने, मक्का, शीरा, खराब खाद्यान्न और दूसरे कृषि स्रोतों से बनने वाला जैव ईंधन है। भारत ने अप्रैल 2026 से देशभर में E20 को आधार ईंधन बना दिया है। सरकार का साफ कहना है कि इसका मकसद सिर्फ पेट्रोल में दूसरा ईंधन मिलाना नहीं है, बल्कि Crude Oil के आयात पर निर्भरता कम करना है।
इथेनॉल ब्लेंडिंग का क्या फायदा?
हर किसी के दिमाग में यही सबसे बड़ा सवाल है। सरकार ने साफ तौर पर यह बात मानी है कि कई बार E20 सामान्य पेट्रोल से सस्ता नहीं पड़ता। खासतौर पर जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल या इससे कम होती है, तब इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल की लागत कई मामलों में सामान्य पेट्रोल से ज्यादा हो जाती है। लेकिन, सरकार का तर्क अलग है। सरकार का कहना है कि इथेनॉल ब्लेंडिंग का मकसद पेट्रोल को सस्ता बनाना नहीं, बल्कि भारत को अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार के उतार-चढ़ाव से बचाना है।
क्या है सरकार की दलील?
सरकार का कहना है कि आज भारत में बिकने वाले हर लीटर पेट्रोल का लगभग 20% हिस्सा इथेनॉल से बना है। यानी ईंधन का एक बड़ा हिस्सा अब क्रूड से मुक्त हो गया है। यह ऐसी चीज है, जिसका उत्पादन देश में बढ़ाया जा सकता है। यह किसी बाहरी युद्ध, शिपिंग संकट से सीधे प्रभावित नहीं होता। सरकार का कहना है कि इसी वजह से पिछले कुछ वर्षों में भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कई देशों की तुलना में कम बढ़ोतरी हुई।
क्या भारत ने E20 लागू करने में जल्दबाजी की?
सोशल मीडिया पर अक्सर यह सवाल उठाया जाता है कि भारत इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को जल्दबाजी में चला रहा है। खासतौर पर ब्राजील की मिसाल दी जाती है, जिसने कई दशकों में जाकर इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को सफल बनाया है। सरकार ने इसे पूरी तरह से मनगठंत बताया है। सरकार का कहना है कि भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम 2001 में एक पायलट प्रोजेक्ट से शुरू हुआ था। 2004 में इसकी औपचारिक शुरुआत हुई। 2013 में पहली बार एक नीति लागू हुई। 2018 की राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के बाद उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया गया। 2021 में नीति आयोग ने E20 का रोडमैप जारी किया और उसके बाद चरणबद्ध तरीके से ब्लेंडिंग बढ़ाई गई।
ब्लेंडिंग प्रतिशत की वर्षवार तालिका
| वर्ष (ESY) | ब्लेंडिंग प्रतिशत | 2020-21 | 8.1%
सरकार ने आंकड़ों के साथ बताया है कि भारत में ब्लेंडिंग को रातों-रात नहीं शुरू किया गया है। बल्कि, यह भारत में भी दशकों लंबी प्रक्रिया के बाद यह स्थिति आई है।
क्या E20 से पुराने वाहनों का इंजन खराब होगा?
यही सबसे ज्यादा चर्चा वाला मुद्दा है। सरकार का कहना है कि E20 लागू करने से पहले ऑटोमोबाइल कंपनियों, ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI), SIAM और तेल कंपनियों के साथ व्यापक परीक्षण किए गए। 40 हजार किलोमीटर से ज्यादा टेस्टिंग और फील्ड ट्रायल के बाद ही इसे लागू किया गया।
क्या है सरकार की दलील?
सरकार ने बताया कि Maruti Suzuki ने 2025-26 के दौरान 2.84 करोड़ वाहनों की सर्विसिंग की, जिनमें करीब 1.5 करोड़ पुराने वाहन भी शामिल थे। मारुति सुजुकी के मुताबिक इस दौरान E20 की वजह से रबर पाइप, इंजन या ईंधन प्रणाली में किसी असामान्य खराबी की जानकारी नहीं मिली है। सरकार के मुताबिक हीरो मोटोकॉर्प ने भी ऐसा ही अनुभव साझा किया है। सरकार का कहना है कि अगर E20 वास्तव में इंजन खराब करता, तो लाखों वारंटी दावे और शिकायतें सामने आतीं, जो नहीं हुईं।
माइलेज कम होने पर क्या बोली सरकार?
इस मामले में सरकार ने आलोचनाओं को आंशिक रूप से स्वीकार किया है। सरकार ने स्वीकार किया है कि कुछ वाहनों में माइलेज 3% से 5% तक कम हो सकता है। हालांकि, सरकार का कहना है कि माइलेज ही ईंधन का एकमात्र पैमाना नहीं है। E20 की ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा है, इंजन नॉकिंग कम होती है, एक्सेलरेशन बेहतर मिलता है, इंजन साफ रहता है और लाइफ साइकल के आधार पर कार्बन उत्सर्जन लगभग 40% तक कम हो सकता है।
Ethanol Blending पर सरकार ने दिया हर सवाल का जवाब
E10 या सामान्य पेट्रोल का विकल्प क्यों नहीं?
देश में आज भी लाखों वाहन ऐसे हैं, जो E20 कंपैटिबल नहीं हैं। ऐसे में आलोचकों का कहना है कि पेट्रोल पंपों पर सामान्य पेट्रोल, E10 और E20 तीनों उपलब्ध होने चाहिए। इसे लेकर सरकार का जवाब है कि भारत में 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पंप हैं। 3 तरह के ईंधन की अलग-अलग सप्लाई चेन तैयार करना बेहद महंगा और जटिल होगा। इससे लॉजिस्टिक्स, स्टोरेज और वितरण लागत काफी बढ़ जाएगी।
इसके अलावा सरकार का कहना है कि इथेनॉल उत्पादन, डिस्टिलरी और स्टोरेज नेटवर्क में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र ने लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया है। ऐसे में पीछे लौटना व्यावहारिक नहीं होगा।
आखिर सरकार को इससे क्या फायदा दिख रहा है?
सरकार के मुताबिक इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का फायदा सिर्फ पेट्रोल तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसके कई रणनीतिक फायदे हैं। मसलन अभी तक इथेनॉल ब्लेंडिंग की वजह से भारत ने 1.90 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत की है। इसके अलावा 300 लाख मीट्रिक टन क्रूड ऑयल आयात कम करना पड़ा है।
| उपलब्धि | आंकड़ा |
|---|---|
| विदेशी मुद्रा की बचत | ₹1.97 लाख करोड़ से अधिक |
| कच्चे तेल के आयात में कमी | 316 लाख मीट्रिक टन |
| कार्बन उत्सर्जन में कमी | 952 लाख मीट्रिक टन |
| किसानों को भुगतान | ₹1.66 लाख करोड़ से अधिक |
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