चीन दुनिया की फैक्टरी है। लेकिन, यहां बने उत्पाद क्या उत्पात मचा सकते हैं, इसका किसी को अंदाजा भी नहीं। कभी चीन टिकटॉक और PUBG जैसे गेम से डेटा और इंटेलिजेंस जुटाता है, तो कभी रेयर अर्थ की सप्लाई को डिसरप्ट कर दुनिया को घुटनों पर ले आता है। अब चीन का नया कारनामा सामने आया है। चीन में बने पावर इन्वर्टर जासूस और ऐसे एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं, जो एक झटके में इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड को तबाह कर सकते हैं।
अमेरिका में चीन के पावर इन्वर्टर को लेकर लंबे समय से यह शंका जताई जा रही थी। अब अमेरिका के फेडरल कम्युनिकेशन कमीशन (FCC) ने इसकी पुष्टि की है कि चीन में बने स्मार्ट पावर इन्वर्टर ग्रिड के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। इसके साथ ही अमेरिका ने चीन से इन पावर इन्वर्टर के आयात पर रोक भी लगा दी है। दिलचस्प बात यह है कि भारत में भी इस तरह के इन्वर्टर का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। भारत में पावर इन्वर्टर का बाजार करीब 4 अरब डॉलर का है और यह 11 फीसदी की तेजी से बढ़ रहा है। भारत के बढ़ते इस बाजार का सीधा फायदा भी चीन को मिल रहा है, क्योंकि भारत में स्मार्ट पावर इन्वर्टर बाजार में चीन की हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है।
अमेरिका का बड़ा एक्शन
राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए अमेरिका ने चीनी कनेक्टेड पावर इन्वर्टर्स पर बड़ा शिकंजा कस दिया है। अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) ने विदेशी, खासकर चीनी पावर इन्वर्टर्स को अपनी 'कवर्ड लिस्ट' में डालते हुए नए मॉडलों के लिए अमेरिकी बाजार लगभग बंद कर दिया है। लेकिन इस फैसले ने भारत के लिए भी बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस तरह के इन्वर्टर्स को अमेरिका अपने बिजली ग्रिड के लिए संभावित सुरक्षा खतरा मान रहा है, उसी श्रेणी के कई चीनी इन्वर्टर्स भारत के सोलर सेक्टर में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहे हैं।
आखिर इन्वर्टर से कैसे हो सकता है हमला?
पहले पावर इन्वर्टर केवल बिजली को एक रूप से दूसरे रूप में बदलने का काम करते थे। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। आधुनिक सोलर और बैटरी इन्वर्टर्स इंटरनेट से जुड़े होते हैं। इनमें रिमोट मॉनिटरिंग, सॉफ्टवेयर अपडेट, क्लाउड कनेक्टिविटी और डेटा ट्रांसफर जैसी सुविधाएं होती हैं। यही कनेक्टिविटी अब सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बन गई है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यदि ऐसे उपकरणों का नियंत्रण किसी विदेशी इकाई के हाथ में चला जाए या उनमें छिपे संचार मॉड्यूल का दुरुपयोग हो, तो बड़ी संख्या में इन्वर्टर्स को एक साथ प्रभावित किया जा सकता है। इससे बिजली उत्पादन अचानक घट सकता है, ग्रिड की फ्रीक्वेंसी बिगड़ सकती है और क्षेत्रीय स्तर पर बिजली आपूर्ति बाधित हो सकती है।
अमेरिका ने क्यों लगाया बैन?
FCC का कहना है कि विदेशी निर्मित कनेक्टेड पावर इन्वर्टर्स अमेरिका के महत्वपूर्ण ऊर्जा ढांचे के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। इसी वजह से इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम मानते हुए नए मॉडलों को मंजूरी देने पर रोक लगा दी गई है। यह फैसला अमेरिका की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह अपने ऊर्जा और तकनीकी ढांचे में विदेशी निर्भरता कम करना चाहता है।

Power Inverter
भारत में क्या स्थिति है?
भारत दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते सोलर बाजारों में शामिल है। रूफटॉप सोलर से लेकर बड़े सोलर पार्कों तक बड़ी संख्या में चीनी कंपनियों के पावर इन्वर्टर्स लगे हुए हैं। कम कीमत, तेज सप्लाई और उत्पादन क्षमता के कारण Sungrow, Growatt, Solis, Sineng जैसी कंपनियों की भारतीय बाजार में मजबूत मौजूदगी है। हालांकि, भारत सरकार ने कुछ सरकारी परियोजनाओं में डेटा लोकलाइजेशन और साइबर सुरक्षा से जुड़े नियम लागू किए हैं, लेकिन अमेरिका जैसी व्यापक रोक अभी तक नहीं लगाई गई है।
क्या सचमुच ग्रिड फेल हो सकता है?
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यह खतरा पूरी तरह काल्पनिक नहीं है। यदि किसी देश के बिजली नेटवर्क में बड़ी संख्या में इंटरनेट से जुड़े इन्वर्टर्स एक साथ साइबर हमले का शिकार हो जाएं, तो बिजली ग्रिड पर दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, किसी पूरे देश का ग्रिड ठप होना कई अन्य सुरक्षा प्रणालियों, ग्रिड प्रबंधन और ऑपरेशनल कंट्रोल पर भी निर्भर करता है। यानी चीन एक बटन दबाकर पूरे भारत की बिजली तुरंत बंद तो नहीं कर सकता है। लेकिन, स्मार्ट इन्वर्टर से जुड़ा साइबर सुरक्षा जोखिम वास्तविक हो सकता है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
भारत ने 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली क्षमता का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सोलर ऊर्जा का तेजी से विस्तार हो रहा है। ऐसे में सवाल केवल सस्ती तकनीक का नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा का भी है। अमेरिका संभावित साइबर जोखिम को देखते हुए पहले से सुरक्षा कवच मजबूत कर रहा है, जबकि भारत फिलहाल स्वच्छ ऊर्जा विस्तार और लागत के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले वर्षों में यह बहस और तेज हो सकती है कि ऊर्जा संक्रमण के साथ साइबर सुरक्षा को कितना महत्व दिया जाए।
