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Sharekhan F&O मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा-'निवेशक नुकसान के लिए खुद जिम्मेदार'

शेयर बाजार में Futures & Options (F&O) ट्रेडिंग को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने निवेशकों के लिए एक साफ और सख्त संदेश दिया है। अदालत ने कहा है कि अगर निवेशक ने चुपचाप अपने ट्रेड अधिकृत व्यक्ति के जरिए कराए और निगरानी नहीं की, तो बाद में हुए नुकसान की जिम्मेदारी ब्रोकर पर नहीं डाली जा सकती। Sharekhan से जुड़े मामले में हाई कोर्ट ने पहले के मध्यस्थता अवॉर्ड को पलटते हुए यह साफ कर दिया कि स्पेक्युलेटिव ट्रेडिंग में मुनाफा जितना निवेशक का है, उतना ही रिस्क भी उसी का है।

Bombay High Court on F and o

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला (फोटो क्रेडिट, ओपन एआई)

Bombay High Court ने शेयर बाजार में Futures & Options (F&O) ट्रेडिंग को लेकर निवेशकों की जिम्मेदारी पर एक अहम कानूनी लकीर खींच दी है। अदालत ने साफ कहा है कि अगर निवेशक ने किसी को ट्रेडिंग के अधिकृत किया है या वह किसी और व्यक्ति के जरिए ट्रेड कराता है, तो नुकसान की भरपाई के लिए ब्रोकर के लिए जिम्मेदार नहीं बताया जा सकता है। इस फैसले के साथ ही अदालत ने वह मध्यस्थता अवार्ड को भी खारिज कर दिया, जिसमें Sharekhan को F&O ट्रेड में हुए नुकसान की 50 फीसदी रकम निवेशकों को चुकाने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने क्यों पलटा मध्यस्थता अवॉर्ड

यह मामला दो निवेशकों से जुड़ा था, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उनके खातों में अधिकृत व्यक्ति के जरिए बिना स्पष्ट अनुमति के F&O ट्रेड किए गए, जिससे उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा। निवेशकों ने इसके लिए सीधे तौर पर Sharekhan को जिम्मेदार ठहराया और 2018 में बाजार नियामक सिक्योरीटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के एक सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें ब्रोकरों को ऑर्डर प्लेसमेंट से जुड़े सबूत, जैसे कॉल रिकॉर्डिंग या लिखित निर्देश, सुरक्षित रखने को कहा गया है।

निवेशकों की शिकायत पर SEBI की इन्वेस्टर्स ग्रीवांस रिड्रेसल कमिटी ने माना कि Sharekhan प्री-ट्रेड और पोस्ट-ट्रेड कन्फर्मेशन के रिकॉर्ड रखने में विफल रहा। हालांकि, समिति ने यह भी दर्ज किया कि निवेशकों ने अपने खातों की निगरानी नहीं की। इसके बावजूद समिति ने ब्रोकर को 50 प्रतिशत ट्रेडिंग नुकसान वहन करने का आदेश दिया, जिसे बाद में अपीलीय मध्यस्थता ट्रिब्यूनल ने भी बरकरार रखा।

SEBI सर्कुलर अनिवार्य नहीं

Sharekhan ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस संदीप वी मार्ने ने कहा कि संबंधित SEBI सर्कुलर को हर परिस्थिति में अनिवार्य नहीं माना जा सकता, बल्कि यह “डायरेक्टरी” प्रकृति का है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल रिकॉर्ड न होने से यह अपने-आप साबित नहीं हो जाता कि निवेशक की तरफ से ट्रेड की कोई अनुमति नहीं थी। इसके साथ ही अदालत ने कहा “ऑथराइजेशन के सबूत का अभाव, ऑथराइजेशन के अभाव का निर्णायक प्रमाण नहीं हो सकता।” अगर निवेशक को ट्रेड की जानकारी थी और उसने चुप्पी साधे रखी, तो बाद में हुए नुकसान के लिए वह ब्रोकर को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकता।

रिस्क निवेशक का

फैसले में अदालत ने F&O जैसे हाई-रिस्क सेगमेंट की प्रकृति पर भी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि यह पूरी तरह स्पेक्युलेटिव ट्रेडिंग है, जिसमें मुनाफे की उम्मीद जितनी ज्यादा होती है, उतना ही बड़ा नुकसान उठाने का जोखिम भी होता है। ऐसे में निवेशक अगर मुनाफे का लाभ लेना चाहता है, तो नुकसान की जिम्मेदारी से भी बच नहीं सकता। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि कई मामलों में निवेशक, भरोसेमंद व्यक्ति के जरिए ट्रेड कराकर, बाद में नुकसान होने पर ब्रोकर की प्रक्रियागत चूक को हथियार बनाकर रिकवरी की कोशिश करते हैं। यह प्रवृत्ति स्वीकार्य नहीं है।

पहले के फैसलों का भी हवाला

बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में अपने पुराने फैसलों, जैसे उल्हास दांडेकर बनाम सुशील फाइनेंशियल सर्विसेज और एराच खावर बनाम निर्मल बंग सिक्योरिटीज का भी सहारा लिया। इन मामलों में भी अदालत यह स्पष्ट कर चुकी है कि ट्रेड की जानकारी और ट्रेड की अनुमति के बीच कृत्रिम दीवार नहीं खड़ी की जा सकती।

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यतींद्र लवानिया
यतींद्र लवानिया author

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों... और देखें

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