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Explained : AI की रेस में अमेरिका और चीन में कांटे की टक्कर, कहां तक पहुंचा भारत?

मीम से मिसाइल तक AI का इस्तेमाल हो रहा है। चीन और अमेरिका के बीच AI कों कंट्रोल करने के लिए कांटे की टक्कर चल रही है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस रेस में भारत कहां खड़ा है?

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भारत ने बनाई मेड एआई इन इंडिया की रणनीति
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Jul 24, 2026, 15:18 IST
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US vs China AI Battle Explained : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीकी विकास की वह सरहद है, जिसे लांघा जा चुका है और इंसानी सभ्यता अब हमेशा के लिए बदलने जा रही है। पिछले हजारों वर्षों से सबसे सुरक्षित और सम्मानीय माने जाने वाले बुद्धिमानी से जुड़े पेशे AI की वजह से अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं। डॉक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर और प्रॉफेशनल ट्रेडर जैसे जॉब AI की वजह से खतरे में हैं। हालांकि, इन जॉब्स का खतरे में होना किसी देश के लिए ज्यादा बड़ी चिंता नहीं है। बल्कि, AI की दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से बढ़ती क्षमताएं हैरान कर रही हैं।

यही वजह है कि दुनिया इस समय सिर्फ AI नहीं बना रही, बल्कि अगली आर्थिक और रणनीतिक महाशक्ति तय कर रही है। अमेरिका और चीन इस दौड़ में अरबों डॉलर झोंक रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत सिर्फ विदेशी कंपनियों के लिए AI की 'प्रयोगशाला' (Test Bed) है या खुद AI सुपरपावर बनने की दिशा में बढ़ रहा है? बहरहाल, इसका जवाब हां या नहीं में आसान से नहीं दिया जा सकता है। लिहाजा, सबसे पहले समझिए अमेरिका और चीन की लड़ाई किस बात की है?

AI में अमेरिका बनाम चीन

आज AI की दुनिया में दो अलग-अलग मॉडल काम कर रहे हैं। एक तरफ अमेरिका का मॉडल है। अमेरिका की ताकत उसके प्राइवेट सेक्टर में है। क्योंकि, यहां पर

OpenAI, Google, Anthropic, Meta जैसी कंपनियां हैं, जो ग्लोबल AI रिसर्च में लीड कर रही हैं। 2026-27 में अमेरिकी कंपनियों ने AI पर करीब 750 अरब डॉलर का निवेश करने जा रही हैं। जबकि, वहीं पिछले 2 साल में अरबों डॉलर का निवेश किया जा चुका है। यही वजह है कि दुनिया के बेहतरीन AI वैज्ञानिक बड़ी संख्या में अमेरिका में काम कर रहे हैं। अमेरिका में आज AI पूरी तरह बाजार की ताकत पर विकसित हो रहा है।

कैसा है चीन का मॉडल?

चीन का AI मॉडल अमेरिका से पूरी तरह उलटा है। चीन ने AI को पूरी तरह राष्ट्रीय रणनीति बना दिया है। AI पर रिसर्च के लिए सरकार फंड देती है। घरेलू डेटा का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। खासतौर पर चीन के AI का विकास PLA की जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। हालांकि, अमेरिकी AI कंपनियां का पेंटागन के साथ सहयोग भी जगजाहिर है। लेकिन, चीन में मोटेतौर पर कंपनियां सरकार के साथ मिलकर AI विकसित कर रही हैं। आरोप यह भी हैं, चीन के ज्यादातर AI मॉडल अमेरिकी मॉडल्स की नकल हैं। यह ठीक वैसा ही है, जैसा चीन ने कार, स्मार्टफोन और इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ किया है। बहरहाल, जैसे भी हों चीन के DeepSeek और Kimi K3 जैसे मॉडल दिखा चुके हैं कि चीन अमेरिकी बढ़त तेजी से कम कर रहा है।

AI की रेस में कौन कहां है?

देशसबसे बड़ी ताकतसबसे बड़ी चुनौती
अमेरिकारिसर्च, निवेश, चिप्स, टॉप कंपनियांलागत बहुत ज्यादा
चीनसरकारी समर्थन, डेटा, तेजी से विकासअमेरिकी चिप प्रतिबंध
भारतटैलेंट, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, बड़ी आबादीGPU, चिप और निजी निवेश की कमी

क्या भारत सिर्फ AI की प्रयोगशाला है?

दिसंबर 2024 में बिल गेट्स ने भारत को ऐसी जगह बताया था जहां नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर टेस्ट किया जा सकता है। लंबे समय से वैश्विक टेक कंपनियां भारत को डेटा, हेल्थ, एजुकेशन और डिजिटल सेवाओं के लिए एक विशाल टेस्ट मार्केट मानती रही हैं। हालांकि, यह बात पूरी तरह भारत के लिए खराब नहीं है। क्योंकि, भारत विकास के जिस पायदान पर खड़ा है, वहां उसकी डेमोग्राफी सबसे बड़ी ताकत है। यही वजह है कि सॉफ्टवेयर सर्विसेज, डेटा एनोटेशन, टेस्टिंग और बैक-ऑफिस प्रोसेस से भारत को जॉब जेनरेशन और फॉरेन करेंसी रिजर्व बनाने में खासी मदद मिली है।

AI से मिल रही भारत को चुनौती

भारत अब तक तकनीक बनाने से ज्यादा उसे लागू करने का काम करता रहा है। लेकिन, लेकिन AI ने भारत के पुराने मॉडल को चुनौती दी है। खासतौर पर भारत की IT इंडस्ट्री को AI से इतनी बड़ी चुनौती मिली है कि देश की टॉप आईटी कंपनियों के शेयर पांच साल के निचले स्तर पर हैं। अब तक भारतीय आईटी कंपनियां ज्यादा इंजीनियर, ज्यादा कोडिंग और ज्यादा कमाई के मॉडल पर काम कर रही थीं। लेकिन, अब अब AI एजेंट खुद कोड लिख रहे हैं। इसी वजह से बड़े IT कॉन्ट्रैक्ट हो रहे हैं, जिससे TCS, Infosys जैसी कंपनियों के सामने चुनौतियां आ रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक आने वाले वर्षों में 40-50% तक व्हाइट-कॉलर नौकरियां AI से प्रभावित हो सकती हैं। यानी अगर भारत सिर्फ विदेशी AI मॉडल के ऊपर ऐप बनाता रहा तो भविष्य में उसकी प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है।

एआई की वैश्विक रेस में भारत

एआई की वैश्विक रेस में भारत

भारत क्या कर रहा है?

AI की रेस में भारत सॉफ्टवेयर वाली गलती नहीं कर रहा है। बल्कि, सरकार अब "Make AI in India" रणनीति पर काम कर रही है। इसके तहत IndiaAI Mission के लिए कुल ₹10,372 करोड़ का बजट अलोकेट किया गया है। खासतौर पर जोर सस्ती GPU कंप्यूटिंग पर है। भारतीय भाषाओं वाले AI मॉडल पर काम करने वाले स्टार्टअप को फंडिंग दी जा रही है। इसके अलावा AI स्किल डेवलपमेंट पर अलग से कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। वहीं, प्रशिक्षण के लिए सरकारी डेटासेट उपलब्ध कराया जा रहा हे।

भारत के बड़े AI प्रोजेक्ट

Sarvam AI भारत का पहला AI यूनिकॉर्न बन गया है। यह भारतीय भाषाओं पर फोकस कर रहा है। सरकार के सहयोग से तैयार हो रहा यह भारत का अपना AI मॉडल है। इसके अलावा ओला के भाविश अग्रवाल की कंपनी Krutrim भी भारतीय भाषाओं के AI मॉडल और भविष्य में AI चिप विकसित करने की भी योजना पर काम कर रही है। वहीं, IIT बॉम्बे की अगुवाई वाला प्रोजेक्ट BharatGen पूरी तरह भारतीय डेटा और भारतीय भाषाओं पर आधारित मॉडल तैयार कर रहा है।

भारत की सबसे बड़ी कमजोरी क्या है?

भारत अपने AI मॉडल बना रहा है। लेकिन, भारत को GPU अमेरिकी कंपनियों से खरीदने पड़ रहे हैं। खासतौर पर अमेरिकी कंपनी NVIDIA पर भारी निर्भरता है। भारत के लिए पूरी तरह स्वदेशी AI मॉडल बनाने की राह में सबसे बड़ी चुनौती स्वदेशी AI चिप का नहीं होना है। इसके अलावा AI को ट्रेन करने के लिए बनाया जाने वाला क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर भी विदेशी कंपनियों के पास है। यानी सॉफ्टवेयर भारतीय हो सकता है लेकिन हार्डवेयर और क्लाउड अभी भी विदेशी हैं।

भारत को किस रास्ते पर चलना चाहिए?

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अमेरिका और चीन की तरह सबसे बड़ा मॉडल बनाने की होड़ में नहीं पड़ना चाहिए। इसके बजाय भारत को अपनी जरूरतों के मुताबिक

UPI, आधार और डिजिलॉकर जैसे कामयाब प्रोजेक्ट को ध्यान में रखकर स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और भारतीय भाषाओं व रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर AI का समझारी से इस्तेमाल करना चाहिए। भारत को फिलहाल AI सॉवरेनिटी की जगह Workflow Sovereignty पर जोर देकर दुनिया में AI पर हो रहे बेतहाशा खर्च से अपनी जरूरतों को पूरा करना चाहिए।

क्या भारत अमेरिका और चीन को चुनौती दे सकता है?

किसी भी तकनीकी विकास को लेकर भारत का मकसद कभी किसी देश को चुनौती देना नहीं रहा है। बल्कि, भारत का प्रयास हमेशा स्वतंत्र विकल्प विकसित करना रहा है। भारत को फिलहाल AI की रेस में चीन और अमेरिका के करीब पहुंचने के लिए शक्तिशाली AI मॉडल, स्वदेशी चिप और क्लाउड इन्फ्रा पर काम करना होगा। भारत AI के मामले में भाषाओं, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, कम लागत वाले AI समाधान और सरकारी सेवाओं में AI का इस्तेमाल कर आम भारतीयों के लिए वास्तविक जीवन में फर्क ला सकता है, जो किसी भी देश को चुनौती देने से ज्यादा अहम है।

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