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RBI और सरकार ने बाजार की हर 'ख्वाहिश' की पूरी, फिर भी क्यों लाल हुए निफ्टी-सेंसेक्स?

रिजर्व बैंक और सरकार ने शुक्रवार को वे तमाम ऐलान किए, जो बाजार चाहता था। लेकिन, सेंसेक्स और निफ्टी लाल निशान में बंद हुए। यह बताता है कि बाजार क्रूड ऑयल की कीमत और मानसून की ओर देख रहा है।

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रिजर्व बैंक के उपाय नहीं आए काम

रिजर्व बैंक ने शुक्रवार 5 जून, 2026 को पांच ऐसे बड़े उपायों के ऐलान किए हैं, जो विदेशी निवेशकों को भारतीय बाजार की तरफ आकर्षित करेंगे। इसके अलावा सरकार ने भी आयकर अधिनियम में संशोधन कर सरकारी सिक्योरिटी निवेश में FII के निवेश को टैक्स फ्री कर दिया है। लेकिन, इस सबके बाद भी Sensex और Nifty सहित पूरा बाजार सुस्ती के माहौल में बंद हुआ।

निफ्टी-सेंसेक्स में दिनभर उतार-चढ़ाव में रहे। दिन के आखिर में Nifty 0.21% की गिरावट के साथ 49.85 अंक नीचे 23,366.70 अंक पर बंद हुआ। वहीं, दिन में 23,478.95 अंक पर हल्की तेजी में ओपनिंग हुई। इसके बाद 23,516.35 के इंट्रा डे हाई और 23,282.65 के इंट्रा डे लो तक गिरा। इसी तरह सेंसेक्स भी 0.16% की गिरावट के साथ 116.67 अंक नीचे 74,243.34 अंक पर बंद हुआ। दिन में सेंसेक्स 74,717.57 के इंट्रा डे हाई और 73,988.75 के इंट्रा डे लो के बीच झूलता रहा।

क्याें लाल रहा बाजार?

RBI ने एक साथ कई बड़े कदम उठाए। मसलन, बैंकों को FCNR(B) डिपॉजिट्स को बढ़ावा देने के लिए छूट दी है। इसके अलावा PSU कंपनियों के लिए ECB (External Commercial Borrowing) कोआसान किया है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों (FPI) के लिए सरकारी बॉन्ड में निवेश के नियम नरम किए हैं। इसके साथ ही सरकार ने G-Sec निवेश पर टैक्स राहत दी है। इस तरह RBI और सरकार ने देश में FII और डॉलर के इनफ्लो को बढ़ाने के कई पुख्ता इंतजाम किए गए। लेकिन, बाजार ने इसे सेलिब्रेट नहीं किया। सामान्य परिस्थितियों में इतना बड़ा पैकेज शेयर बाजार में तेज रैली ला सकता था। लेकिन, Nifty-Sensex लाल निशान में बंद हुए। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह निवेशकों की यह धारणा है कि भले ही पॉलिसी मेकर्स अपना काम कर चुके हैं, लेकिन, असली जोखिम पॉलिसी मेकर्स के काबू से बाहर है।

RBI का लक्ष्य बाजार नहीं, रुपया बचाना

भले सरकार और RBI के तमाम उपाय सतही तौर पर बाजार को बचाने वाले दिखते हैं। लेकिन, असल में इन पहलों का असली लक्ष्य रुपये के अवमूल्यन की रफ्तार को रोकना है। इसके अलावा दूसरा बड़ा मकसद देश के फॉरेक्स रिजर्व को मजबूत बनाए रखने के लिए डॉलर की उपलब्धता बढ़ाना है। इन सब उपायों से सरकार आखिर में अपना Current Account Deficit को नियंत्रित रखना चाहती है। सरकार क इन उपायों से एक अनुमान के मुताबिक अगले कुछ महीनों में 30-40 अरब डॉलर तक का अतिरिक्त विदेशी मुद्रा प्रवाह आ सकता है।

बाजार का बूस्टर नहीं रुपये का रुरक्षा कवच

रिजर्व बैंक और सरकार ने जो उपाय किए हैं, उनकी वजह से रातों रात शेयर बाजार में FII-FPI का इनफ्लो नहीं बढ़ेगा। यानी मोटे तौर पर बाजार के लिए बूस्टर डोज नहीं, बल्कि रुपये का सुरक्षा कवच बनाया गया है। ECB की न्यूनतम अवधि 3 साल होती है। इसी तरह FCNR(B) जमा 3-5 साल की अवधि की होगी। लिहाजा, इन इंस्ट्रूमेंट के जरिये जो विदेशी मुद्रा भारत में आएगी, वह असल में बाजार की जगह रुपये को मजबूत करेगी।

विदेशी निवेशक क्यों नहीं ले रहे रुचि?

फिलहाल, भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड में लगभग 6.2%-6.3% रिटर्न मिल रहा है। वहीं, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड करीब 4.5% यील्ड दे रहे हैं। इसके अलावा लेकिन विदेशी निवेशकों को रुपये का हेजिंग खर्च भी देना पड़ता है जो करीब 3%-3.5% है। होता है। इस तरह विदेशी निवेशकों को जब तक भारत में 8% से ज्यादा का रिटर्न नहीं मिलेगा, उनकी भारत में दिलचस्पी नहीं होगी। वहीं, दूसरी तरफ शेयर बाजार में भी विदेशी निवेशकों की दिलचस्पी घट रही है। क्योंकि, भारत के कॉरपोरेट सेक्टर की कमाई और शेयरों के वैल्यूएशन में तालमेल नहीं दिख रहा है। विदेशी निवेशकों को अब भी भारतीय बाजार की ज्यादातर लिस्टेड कंपनियों के शेयरों की कीमत उनकी कमाई की तुलना में महंगी लग रही है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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