Health Insurance Claim Rejection : स्वास्थ्य बीमा की किस्त (प्रीमियम) समय पर भरने और पॉलिसी एक्टिव होने के बाद भी कई बार अस्पताल में भर्ती होने पर क्लेम खारिज (रिजेक्ट) हो जाता है। लोग अक्सर मान लेते हैं कि अगर वे हर साल प्रीमियम दे रहे हैं, तो इलाज का सारा खर्च इंश्योरेंस कंपनी उठाएगी। लेकिन असलियत यह है कि कंपनियां हर क्लेम को पॉलिसी की शर्तों, जैसे कि वेटिंग पीरियड, एक्सक्लूजन (शामिल न की जाने वाली बीमारियां), मेडिकल जरुरत और दस्तावेजों की जांच के बाद ही मंजूर करती हैं। ज्यादातर लोगों को इन शर्तों का पता तब चलता है, जब उन्हें अचानक अस्पताल में क्लेम की जरुरत पड़ती है। आइए जानते हैं वे मुख्य कारण, जिनकी वजह से एक्टिव पॉलिसी होने के बावजूद क्लेम रिजेक्ट हो सकता है और इंश्योरेंस लेते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
पुरानी बीमारियों की जानकारी न देना
इंश्योरेंस क्लेम रिजेक्ट होने की एक सबसे बड़ी और मुख्य वजह पुरानी बीमारियों (प्री-एक्जिस्टिंग डिजीज) को छुपाना या सही जानकारी न देना है। कई बार लोग पॉलिसी लेते समय अपनी पुरानी मेडिकल हिस्ट्री की जानकारी प्रस्ताव फॉर्म (प्रपोजल फॉर्म) में दर्ज नहीं करते। अस्पताल में भर्ती होने पर जब डॉक्टर मरीज के पिछले रिकॉर्ड्स लिखते हैं, तो इंश्योरेंस कंपनी को पता चल जाता है कि यह समस्या पॉलिसी खरीदने से पहले से थी। अगर आपने अपने डॉक्टर को मौखिक रूप से कोई बात बताई है, लेकिन इंश्योरेंस फॉर्म में नहीं लिखी, तो भी कंपनी इसे धोखाधड़ी मानकर क्लेम खारिज कर सकती है। इसलिए पॉलिसी लेते वक्त अपनी हर छोटी-बड़ी बीमारी की सही जानकारी देना बहुत जरूरी है।
वेटिंग पीरियड पूरा न होना
अगर आपने अपनी पुरानी बीमारी की सही जानकारी दे भी दी है और कंपनी ने आपकी पॉलिसी मंजूर कर ली है, तब भी उस बीमारी का कवर तुरंत शुरू नहीं होता। आमतौर पर प्री-एक्जिस्टिंग बीमारियों के लिए 24 से 48 महीने का वेटिंग पीरियड होता है। उदाहरण के लिए अगर किसी को डायबिटीज है और उसने पॉलिसी लेते समय इसकी घोषणा की है, तो भी डायबिटीज से जुड़ी दिक्कतों के लिए उसे तय वेटिंग पीरियड खत्म होने का इंतजार करना होगा। इस समय से पहले अस्पताल में भर्ती होने पर क्लेम नहीं मिलेगा। इसके अलावा, पथरी (किडनी स्टोन) या मोतियाबिंद जैसी कुछ खास बीमारियों और सर्जरी के लिए भी अलग से वेटिंग पीरियड लागू होता है।
पॉलिसी के एक्सक्लूजन में आने वाले इलाज
हर स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी में कुछ ऐसी चीजें और बीमारियां होती हैं जिन्हें कवर से बाहर रखा जाता है, जिन्हें 'एक्सक्लूजन' कहा जाता है। अगर आपका इलाज इन एक्सक्लूजन की कैटेगरी में आता है, तो क्लेम तुरंत खारिज हो जाएगा। उदाहरण के लिए, कॉस्मेटिक या प्लास्टिक सर्जरी आमतौर पर कवर नहीं होती, जब तक कि वह किसी दुर्घटना, जलन या कैंसर के बाद मेडिकल जरुरत के तहत न की गई हो। इसके अलावा, बिना प्रमाणित वाले या एक्सपेरिमेंटल इलाज भी कवर नहीं होते। सामान्य डॉक्टर की फीस, रूटीन जांचें और मेडिकल स्टोर से खरीदी गई दवाएं (ओपीडी खर्च) भी तब तक नहीं मिलतीं, जब तक आपकी पॉलिसी में अलग से ओपीडी कवर न जुड़ा हो।
इलाज का मेडिकल रूप से जरूरी न होना
केवल अस्पताल में भर्ती हो जाना ही क्लेम मिलने की गारंटी नहीं है। इंश्योरेंस कंपनियां यह भी जांचती हैं कि क्या मरीज का अस्पताल में भर्ती होना वाकई 'मेडिकल रूप से आवश्यक' (मेडिकली नेसेसरी) था या नहीं। अगर किसी बीमारी का इलाज घर पर या ओपीडी में दवा लेकर किया जा सकता था, लेकिन मरीज केवल क्लेम लेने के लिए अस्पताल में भर्ती हो गया, तो कंपनी क्लेम रिजेक्ट कर सकती है। इलाज और अस्पताल में भर्ती होने का फैसला स्वीकृत मेडिकल मानकों और डॉक्टर की लिखित सलाह के अनुसार होना चाहिए।
अधूरे या गलत मेडिकल दस्तावेज
क्लेम पास होने में दस्तावेजों की सबसे अहम भूमिका होती है। अगर अस्पताल के रिकॉर्ड, बिल या रिपोर्ट अधूरी, स्पष्ट न होने वाली या संदिग्ध हैं, तो क्लेम अटक सकता है या खारिज हो सकता है। मरीज और उसके परिवार को चाहिए कि वे इलाज से जुड़े सभी कागजात संभालकर रखें। इसमें डॉक्टर का प्रिस्क्रिप्शन, जांच रिपोर्ट (पैथोलॉजी और एक्स-रे/एमआरआई), डिस्चार्ज समरी, अस्पताल का बिल और भुगतान की रसीदें शामिल हैं। अगर कंपनी को जांच के दौरान कोई दस्तावेज गायब या गलत लगता है, तो क्लेम खारिज कर दिया जाता है।
कैशलेस क्लेम का रिजेक्ट होना
अस्पताल में कैशलेस सुविधा न मिलने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपका क्लेम हमेशा के लिए खारिज हो गया है। कैशलेस सुविधा अस्पताल और बीमा कंपनी के बीच का एक एडवांस अप्रूवल सिस्टम है। अगर अस्पताल में किसी कारण से कैशलेस रिक्वेस्ट रिजेक्ट हो जाती है, तो घबराने की जरुरत नहीं है। आप खुद अस्पताल का बिल चुकाकर बाद में रीइम्बर्समेंट (रकम वापसी) के लिए क्लेम फाइल कर सकते हैं। कैशलेस रिजेक्ट होने पर अस्पताल से उसका लिखित कारण जरूर लें। अगर समस्या किसी कागजी कमी या मेडिकल स्पष्टीकरण की है, तो डॉक्टर से अतिरिक्त रिपोर्ट बनवाकर रीइम्बर्समेंट क्लेम के साथ जमा करें।
पॉलिसी खरीदने से पहले इन बातों की करें जांच
बीमा एक्सपर्ट्स का मानना है कि केवल कम प्रीमियम या ज्यादा कवर (सम इंश्योर्ड) देखकर पॉलिसी नहीं खरीदनी चाहिए। पॉलिसी लेने से पहले 'कस्टमर इंफॉर्मेशन शीट' को ध्यान से पढ़ें, जिसमें मुख्य शर्तें आसान भाषा में लिखी होती हैं। इसके अलावा बीमारियों का वेटिंग पीरियड, एक्सक्लूजन लिस्ट, रूम रेंट की सीमा (रूम रेंट कैपिंग), को-पेमेंट क्लॉज (जहां मरीज को बिल का कुछ प्रतिशत खुद देना होता है) और डिडक्टिबल्स की जांच करें। यह भी देख लें कि आपके शहर के कौन-कौन से अस्पताल कंपनी के नेटवर्क में शामिल हैं। पॉलिसी की शर्तों को पहले से समझकर आप इमरजेंसी के समय क्लेम रिजेक्ट होने के झंझट से बच सकते हैं।
