US H-1B Visa Fraud Probe : अमेरिका में नौकरी करने और वहां स्थायी रूप से बसने का सपना देख रहे भारतीय पेशेवरों के लिए एक बड़ी और झटकेदार खबर सामने आई है। अमेरिकी प्रशासन ने वीजा धोखाधड़ी के एक मामले की जांच के तहत दिग्गज आईटी कंपनी कॉग्निजेंट (Cognizant) के लिए नए 'ग्रीन कार्ड' आवेदनों की प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। यह फैसला अमेरिकी श्रम विभाग ने ट्रंप प्रशासन के तहत 'व्हाइट हाउस फ्रॉड टास्क फोर्स' के साथ मिलकर की गई जांच के बाद लिया है। इस कदम से न केवल कॉग्निजेंट में काम करने वाले भारतीय कर्मचारियों को बड़ा झटका लगा है, बल्कि टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और एचसीएल जैसी अन्य प्रमुख भारतीय आईटी कंपनियों के कर्मचारियों की चिंताएं भी बढ़ गई हैं।
वीजा फ्रॉड की जांच और कॉग्निजेंट पर कार्रवाई
अमेरिकी श्रम विभाग के महानिरीक्षक एंथनी डी'एस्पोसिटो ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस कार्रवाई की घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि कॉग्निजेंट और एक अन्य कंपनी क्लाउडेरा (Cloudera) की 'परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन' (PERM) फाइलिंग को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। श्रम विभाग का कहना है कि जब तक एच-1बी और PERM कार्यक्रमों में कथित धोखाधड़ी की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक कॉग्निजेंट को नए आवेदन दाखिल करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अधिकारियों ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिकी कर्मचारियों के हितों और रोजगार से खिलवाड़ करने वाली कंपनियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
क्या होता है PERM और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में इसकी भूमिका?
अमेरिका में परमानेंट रेजीडेंसी यानी 'ग्रीन कार्ड' हासिल करने की दिशा में PERM (प्रोग्राम इलेक्ट्रॉनिक रिव्यू मैनेजमेंट) पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम माना जाता है। इस प्रक्रिया के तहत अमेरिकी कंपनियों को श्रम विभाग (DoL) से मंजूरी लेनी होती है कि वे किसी विदेशी कर्मचारी को हमेशा के लिए अपने यहां नौकरी पर रख सकें। नियम के मुताबिक, कंपनी को पहले यह साबित करना होता है कि उस खास पद के लिए अमेरिका में कोई योग्य या इच्छुक स्थानीय उम्मीदवार मौजूद नहीं है। साथ ही, विदेशी वर्कर को नौकरी देने से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन या काम करने के माहौल पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा। PERM फाइलिंग सस्पेंड होने का मतलब है कि अब कॉग्निजेंट अपने कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया शुरू नहीं कर पाएगी।
भारतीय आईटी कंपनियों और पेशेवरों पर गहराएगा संकट
चेन्नई में 1994 में शुरू हुई और अब अमेरिका के न्यू जर्सी में मुख्यालय वाली कॉग्निजेंट अमेरिका में सबसे ज्यादा H-1B वीजा स्पॉन्सर करने वाली कंपनियों में से एक है। हालांकि, बीते कुछ वर्षों में कंपनी के वीजा अप्रूवल में कमी आई है, फिर भी हजारों भारतीय कर्मचारी इसके जरिए अमेरिका में कार्यरत हैं। इस ताजा सस्पेंशन के बाद अमेरिकी श्रम विभाग की नजरें अन्य बड़ी भारतीय आईटी कंपनियों पर भी टिक गई हैं, क्योंकि वे भी बड़े पैमाने पर H-1B और PERM वीजा कार्यक्रमों पर निर्भर हैं। पहले से ही करीब 10 लाख भारतीय नागरिक अमेरिका में एम्प्लॉयमेंट-बेस्ड ग्रीन कार्ड के भारी-भरकम बैकलाग में फंसे हुए हैं। ऐसे में प्रमुख टेक कंपनियों पर इस तरह की पाबंदी लगने से भारतीयों का अमेरिका में लंबे समय तक रहने और बसने का रास्ता और ज्यादा मुश्किल और अनिश्चित हो जाएगा।
