भारत में निवेश के लिए फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) को आज भी सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद माना जाता है। जब भी हमारे पास कुछ अतिरिक्त पैसे जमा होते हैं, हम सबसे पहले बैंक जाकर एफडी कराने की सोचते हैं। लेकिन अक्सर बैंक कर्मचारी हमसे पूछते हैं कि हमें 'संचयी' यानी Cumulative FD चाहिए या 'गैर-संचयी' यानी Non-Cumulative FD। ज्यादातर लोग बिना अंतर समझे किसी भी विकल्प को चुन लेते हैं, जबकि यह चुनाव आपके रिटर्न और आपकी वित्तीय जरूरतों पर सीधा असर डालता है। ऐसे में आइए जानते हैं दोनों में क्या अंतर है और आपके रिटर्न पर ये कैसे असर डालता है?
Cumulative FD
संचयी या Cumulative FD वह निवेश है जहां आपके द्वारा जमा किए गए पैसे पर मिलने वाला ब्याज आपके मूलधन (Principal) में जुड़ता जाता है। इसमें बैंक आपको बीच-बीच में कोई भुगतान नहीं करता। यहां 'कंपाउंडिंग' (चक्रवृद्धि ब्याज) का जादू काम करता है। मान लीजिए आपने 1 लाख रुपये जमा किए, तो पहले साल का जो ब्याज बनेगा, वह आपके 1 लाख में जुड़ जाएगा। अगले साल आपको 1 लाख प्लस पहले साल के ब्याज पर ब्याज मिलेगा। इस तरह मैच्योरिटी के समय आपको एक बड़ी और भारी-भरकम राशि एक साथ मिलती है। यह विकल्प उन लोगों के लिए सबसे अच्छा है जो लंबी अवधि के लिए बचत करना चाहते हैं और जिन्हें तुरंत पैसों की जरूरत नहीं है।
Non-Cumulative FD
इसके ठीक उलट, गैर-संचयी या Non-Cumulative FD उन लोगों के लिए बनाई गई है जिन्हें अपने खर्चों के लिए नियमित अंतराल पर पैसों की आवश्यकता होती है। इसमें बैंक आपके ब्याज को मूलधन में नहीं जोड़ता, बल्कि उसे आपकी पसंद के अनुसार मासिक (Monthly), तिमाही (Quarterly) या छमाही (Half-yearly) आधार पर आपके बचत खाते में भेज देता है। यहां आपको कंपाउंडिंग का लाभ नहीं मिलता, क्योंकि आप ब्याज का पैसा साथ के साथ इस्तेमाल कर रहे होते हैं। यह विकल्प सेवानिवृत्त (Retired) लोगों या वरिष्ठ नागरिकों के लिए बेहतरीन है, जिन्हें अपनी पेंशन के अलावा मासिक खर्चों के लिए एक निश्चित रकम की जरूरत होती है।
किसमें है ज्यादा मुनाफा और क्यों?
अगर हम केवल मुनाफे की बात करें, तो गणित के हिसाब से 'Cumulative FD' हमेशा बेहतर होती है। इसका कारण 'पावर ऑफ कंपाउंडिंग' है। चूंकि आपका ब्याज निवेशित रहता है, इसलिए अंत में आपको मिलने वाली कुल राशि Non-Cumulative के मुकाबले अधिक होती है। उदाहरण के तौर पर, 5 साल की एफडी में Cumulative विकल्प आपको काफी ज्यादा रिटर्न देगा क्योंकि ब्याज पर ब्याज मिलता रहा। हालांकि, Non-Cumulative का फायदा इसकी 'तरलता' (Liquidity) में है। यह आपको हर महीने या हर तीन महीने में नकदी का प्रवाह देता रहता है, जिससे आपके रोजमर्रा के काम नहीं रुकते।
टैक्स और टीडीएस का गणित
एक और जरूरी बात जो आपको जाननी चाहिए, वह है टैक्स। चाहे आप Cumulative चुनें या Non-Cumulative, दोनों ही मामलों में मिलने वाला ब्याज टैक्स के दायरे में आता है। अगर एक साल में आपका कुल ब्याज 40,000 रुपये (वरिष्ठ नागरिकों के लिए 50,000 रुपये) से अधिक है, तो बैंक 10% टीडीएस (TDS) काटता है। Cumulative FD में भी बैंक हर साल मिलने वाले ब्याज पर टीडीएस काटता है, भले ही वह पैसा आपको मैच्योरिटी पर एक साथ मिलना हो। इसलिए निवेश से पहले अपनी टैक्स लायबिलिटी को जरूर समझ लें।
