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कभी झोपड़ी में कटती थी रात, आज 20 लाख का टर्नओवर, लहठी ने कैसे बदल दी बिहार के आमना खातून की जिंदगी

आमना खातून की कहानी बताती है कि सही मार्गदर्शन, मेहनत और हौसले के साथ छोटे स्तर से शुरू किया गया काम भी बड़े कारोबार में बदला जा सकता है। फूस के छप्पर से शुरू हुआ उनका सफर आज लाखों रुपये के कारोबार तक पहुंच चुका है और ग्रामीण महिला उद्यमिता की एक प्रेरक मिसाल बन गया है।

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आज 20 लाख तक पहुंचा सालाना कारोबार

कहते हैं कि हुनर है तो एक ना एक दिन दुनिया को नजर आ ही जाएगी। जैसे कस्तूरी की महक छिपाई नहीं जा सकती, वैसे ही हुनर भी लंबे समय तक ओझल नहीं रह सकता है। बिहार के शिवहर जिले के दोस्तिया गांव की आमना खातून ने अपने हुनर और मेहनत के दम पर अपनी जिंदगी बदलने की मिसाल पेश की है। कभी आर्थिक तंगी के कारण अपने हुनर को घर तक सीमित रखने वाली आमना आज लहठी के कारोबार से सालाना 15 से 20 लाख रुपये का टर्नओवर कर रही हैं। इतना ही नहीं, उनके कारोबार से गांव की कई महिलाओं और लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। आमना की बनाई लहठियों की मांग बिहार के अलावा दूसरे राज्यों में भी है।

शादी के बाद मुश्किलों से भरा था जीवन

आमना को शादी से पहले ही पारंपरिक चूड़ी यानी लहठी बनाने का हुनर आता था, लेकिन शादी के बाद चार बच्चों की जिम्मेदारी और घर की सीमित आमदनी के कारण वह अपने हुनर का इस्तेमाल कारोबार के लिए नहीं कर पा रही थीं। उनके पति लुधियाना में सिलाई का काम करते थे और इसी आमदनी से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल था। एक समय था जब आमना के सिर पर ढंग का घर भी नहीं था, लेकिन आज उन्हें दुनिया जानती है।

आमना की जिंदगी में बदलाव तब शुरू हुआ, जब वर्ष 2017 में वह आला हजरत जीविका स्वयं सहायता समूह और बागमती ग्राम संगठन से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली और अपने हुनर को कारोबार में बदलने का मौका मिला।

40 हजार रुपये के कर्ज से दोबारा शुरू किया काम

समूह से मिली मदद और पति के सहयोग से आमना ने वर्ष 2020 में 40 हजार रुपये का पहला ऋण लिया। करीब आठ साल के अंतराल के बाद उन्होंने सीतामढ़ी से कच्चा माल खरीदकर दोबारा लहठी बनाना शुरू किया। उनकी बनाई लहठियों को स्थानीय दुकानदारों ने काफी पसंद किया। पहली ही बिक्री में उन्हें करीब 7 हजार रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। इस कमाई ने आमना का आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्होंने कारोबार को आगे बढ़ाने का फैसला किया।

सरस मेले में भी मिली बड़ी कामयाबी

आमना ने समय पर अपना ऋण चुकाया और धीरे-धीरे कारोबार का विस्तार करती गईं। सरस मेलों में भी उनकी बनाई लहठियों को खूब पसंद किया गया। यहां बिक्री से उन्हें करीब 70 हजार रुपये की सीधी बचत हुई। इससे उन्हें अपने कारोबार को बड़े स्तर पर ले जाने का हौसला मिला।

सरस मेले में भी मिली बड़ी कामयाबी

सरस मेले में भी मिली बड़ी कामयाबी

आज 20 लाख तक पहुंचा सालाना कारोबार

लगातार मेहनत का नतीजा यह रहा कि आमना का छोटा-सा घरेलू कारोबार आज एक सफल उद्योग में बदल चुका है। वह बताती हैं कि उनके कारोबार का सालाना टर्नओवर करीब 15 से 20 लाख रुपये है और इससे उन्हें हर साल लगभग 5 से 6 लाख रुपये का शुद्ध लाभ होता है। उनकी बनाई लहठियां शिवहर और सीतामढ़ी की 25 से 30 से अधिक दुकानों में बिकती हैं। इसके अलावा पटना, दिल्ली, गुरुग्राम, वाराणसी, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और देवघर के मेलों में भी उनके उत्पादों की मांग है।

कारोबार से दूसरी महिलाओं को भी मिला रोजगार

आमना की सफलता सिर्फ उनकी अपनी आर्थिक स्थिति बदलने तक सीमित नहीं है। उनके कारोबार से गांव के 13 लोगों को रोजगार मिला है। इनमें जीविका से जुड़ी 10 महिलाएं भी शामिल हैं। इस तरह आमना खुद आत्मनिर्भर बनने के साथ दूसरी महिलाओं को भी रोजगार का अवसर दे रही हैं।

9.75 लाख का पूरा कर्ज चुकाया

आमना ने अब तक समूह से करीब 9.75 लाख रुपये का ऋण लिया और उसका शत-प्रतिशत भुगतान कर दिया है। अब वह कारोबार को और बड़ा करने की तैयारी में हैं। उनका लक्ष्य 20 से 25 लाख रुपये के नए निवेश के साथ लहठी के कारोबार को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाना है।

लहठी क्या होती है?

आप में से कई लोगों को लहठी के बारे में जानकारी नहीं होगी। आपको बता दें कि बिहार और आसपास के क्षेत्रों की पारंपरिक हस्तनिर्मित चूड़ियों को लहठी कहा जाता है। इसे लाख की चूड़ी भी कहते हैं। इन्हें आमतौर पर लाख जैसे प्राकृतिक पदार्थों से तैयार किया जाता है और रंग-बिरंगे डिजाइन व आकर्षक सजावट के साथ बनाया जाता है। लहठी का इस्तेमाल खासतौर पर शादी-विवाह, त्योहारों और अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है। बिहार में लहठी बनाने की कला कई पीढ़ियों से चली आ रही है और यह स्थानीय हस्तशिल्प के साथ-साथ ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का जरिया भी बन रही है।

दूसरी महिलाओं के लिए बनीं प्रेरणा

ग्रामीण विकास विभाग और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री श्रवण कुमार ने आमना की सफलता की सराहना की है। उन्होंने कहा कि जीविका से जुड़कर लाखों ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रही हैं। उन्होंने आमना को उनकी उपलब्धि के लिए शुभकामनाएं देते हुए उम्मीद जताई कि उनकी कहानी से प्रेरित होकर दूसरी महिलाएं भी अपने हुनर और मेहनत से नई पहचान बनाएंगी।

Pradeep Pandey
प्रदीप पाण्डेयauthor

प्रदीप पाण्डेय टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में टेक और ऑटो बीट पर कंटेंट तैयार करते हैं। डिजिटल मीडिया में 10 वर्षों के अनुभव के साथ प्रदीप तकनीक की दुनिया को समझने और उसे आम पाठकों तक सरल व उपयोगी रूप में पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। प्रदीप अब तक 11,000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुके हैं। वह गैजेट रिव्यू, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक टिप्स और नवीनतम टेक इनोवेशन पर लगातार काम करते हैं। एआई टूल्स पर एक्सपेरिमेंट करना, नए ऐप्स टेस्ट करना और टेक से जुड़े प्रैक्टिकल सॉल्यूशंस खोजने में उनकी खास रुचि है।

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