हाल ही में नेपाल के बागमती प्रांत में लंगटांग लिरुंग ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा त्रिशूली नदी घाटी में गिरने से विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) आ गया। पानी, मलबे और चट्टानों के तेज बहाव ने पुलों, राजमार्गों और पूरे के पूरे गांवों को तबाह कर दिया। इस भीषण तबाही के बीच नेपाल के नुवाकोट जिले के देवीघाट इलाके से आई एक तस्वीर ने दुनिया का ध्यान खींचा। जहां चारों तरफ कीचड़ और मलबे का बंजर मैदान नजर आ रहा था, वहीं चार मंजिला एक फिरोजी (Turquoise) रंग का घर पूरी तरह सीधा खड़ा रहा। प्रकाश पांडे प्याकुरेल का यह मकान बाढ़ के प्रचंड वेग को झेल गया और उनका परिवार ऊपरी मंजिल पर सुरक्षित रहा।
इस चमत्कारिक घटना ने हर किसी को हैरान कर दिया है कि आखिर भीषण बहाव के बावजूद यह मकान कैसे सुरक्षित रहा? यह घटना साबित करती है कि घर का सही लोकेशन, मजबूत नींव, आरसीसी स्ट्रक्चर और बेहतर कंस्ट्रक्शन क्वालिटी न केवल इमारत को ढहने से बचाती है, बल्कि आपदा के समय उसके अंदर मौजूद लोगों के लिए जीवन रक्षक भी बनती है।
आखिर क्यों नहीं ढहा यह मकान?
प्रकाश पांडे प्याकुरेल के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्रों की ठंडी जलवायु के कारण वहां के मकानों में इंसुलेशन और सीधा (वर्टिकल) भार उठाने वाले ढांचों को प्राथमिकता दी जाती है। मकान मालिक प्याकुरेल के अनुसार, उनके परिवार ने दशकों पहले ही त्रिशूली नदी के भौगोलिक खतरों का अंदाजा लगा लिया था। इसीलिए घर बनाते समय उन्होंने जमीन के नीचे दो मंजिल गहरी खुदाई की और हैवी रोड-ग्रेड सामग्री व मजबूत स्टील के पिलर्स का इस्तेमाल करके एक बेहद मजबूत बेस तैयार किया। जमीन की गहराई तक गड़ा यही मजबूत ढांचा (Skeletal Structure) बाढ़ के भीषण प्रहार में भी इमारत को स्थिर रखने में मददगार साबित हुआ।
बनावट है अकेले घर के टिकने का कारण
कोई भी इमारत बाढ़ में टिक पाएगी या नहीं, यह कई अहम तकनीकी और भौगोलिक कारकों पर निर्भर करता है। इस हरे मकान के टिके रहने के पीछे इसका मजबूत रेनफोर्स्ड कंक्रीट (RCC) और स्टील का पिलर फ्रेमवर्क, जमीन में गहरी और मजबूत नींव (Foundation), और इसकी खास भौगोलिक स्थिति मुख्य वजह रही। इसके अलावा, बाढ़ के दौरान इसकी निचली मंजिल की दीवारें टूटने से पानी और मलबे को निकलने का रास्ता मिल गया, जिससे पिलर्स पर सीधा दबाव कम हो गया। साथ ही, यह मकान नदी के सबसे तेज बहाव वाले मुख्य रास्ते से थोड़ा हटकर था, जिससे यह भारी चट्टानों की सीधी टक्कर से बच गया।
नेपाल की इस घटना से भारत में घर या प्लॉट खरीदने वाले लोगों और बिल्डरों के लिए कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। रियल एस्टेट में अक्सर लोग केवल घर का पेंट, टाइल्स, डिजाइन या ऊपरी सुंदरता देखकर फैसला लेते हैं, जबकि असली सुरक्षा उसकी नींव, निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग पर टिकी होती है। अगर आप कोई पुराना मकान खरीद रहे हैं, तो केवल मकान मालिक के दावों पर भरोसा न करें। किसी प्रमाणित सिविल इंजीनियर से उसका स्ट्रक्चरल ऑडिट जरूर कराएं और यह जांचें कि उसमें कोई अवैध बदलाव, अतिरिक्त मंजिल या पिलर से छेड़छाड़ तो नहीं की गई है।
इस बात का भी रखें ध्यान
घर के निर्माण के साथ-साथ उसकी लोकेशन (Location) और आसपास की ड्रेनेज व्यवस्था सबसे ज्यादा मायने रखती है। अगर कोई बहुत मजबूत घर भी नदी के मुहाने, निचले इलाके या प्राकृतिक जल निकासी वाले रास्ते (Waterways) पर बना है, तो वह भी बाढ़ के जोखिम में आ सकता है। इसलिए जमीन या मकान खरीदने से पहले यह जांचना जरूरी है कि आसपास का रोड लेवल क्या है, इलाके में पहले कभी जलभराव हुआ है या नहीं, और स्थानीय निकाय से नक्शा व निर्माण की सभी जरूरी मंजूरियां मिली हैं या नहीं।
भविष्य की प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़ या भूकंप से बचाव के लिए बिल्डरों और घर खरीदारों दोनों को सतर्क रहना होगा। डेवलपर्स को निर्माण से पहले मिट्टी की जांच (Soil Testing), सही जल निकासी का नक्शा और स्थानीय बिल्डिंग कोड का कड़ाई से पालन करना चाहिए। वहीं घर खरीदारों को बिना तकनीकी जांच और एक्सपर्ट की सलाह के किसी भी मकान को पूरी तरह 'डिसएस्टर-प्रूफ' मानकर आंख मूंदकर निवेश करने से बचना चाहिए।
