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पश्चिम एशिया, न रूस; अब चीन के हाथों में ग्लोबल ऑयल मार्केट का 'रिमोट कंट्रोल', जानिए कैसे

अमेरिका-ईरान के युद्ध ने दशकों पुरानी धारणाओं को ध्वस्त किया है। अब तक ओपेक और पश्चिम एशिया को ग्लोबल ऑयल मार्केट का कंट्रोलर माना जाता रहा है। लेकिन, अब चीन नियंत्रण चीन के हाथ में आ गया है।

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अब चीन के हाथ ऑयल मार्केट का नियंत्रण

Global Oil Market Dynamics and China : दशकों तक दुनिया के तेल बाजार का एक तय फॉर्मूला रहा है। इसमें पश्चिम एशिया, ओपेक और रूस मोटे तौर पर ऑयल मार्केट को कंट्रोल करते दिखते हैं। इन देशों का उत्पादन घटाने का फैसला या रूस से सप्लाई में रुकावट आते ही क्रूड की कीमतें आसमान छूने लगती हैं।

लेकिन, US-Iran War ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया। इस बार दुनिया ने देखा कि तेल बाजार को स्थिर रखने में सबसे बड़ी भूमिका किसी खाड़ी देश या अमेरिका ने नहीं, बल्कि चीन ने निभाई है। Hormuz crisis से तेल आपूर्ति बाधित होने के बावजूद जिस तरह कीमतें अनुमानित स्तर तक नहीं पहुंचीं, उसने यह संकेत दे दिया कि अब वैश्विक ऑयल मार्केट में चीन की रणनीति कीमतों की दिशा तय करने लगी है।

क्यों नहीं आई तेल में विस्फोटक तेजी?

अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाली करीब 1.1 करोड़ बैरल प्रतिदिन की तेल आपूर्ति प्रभावित हुई। यह दुनिया की कुल क्रूड ऑयल सप्लाई का लगभग 20% हिस्सा है। इतिहास बताता है कि इससे कहीं छोटे सप्लाई झटकों ने भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया था। लेकिन, इस बार ऐसा व्यापक असर देखने को नहीं मिला। यही सबसे बड़ा सवाल बना कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

चीन ने कैसे बदल दिया पूरा खेल?

ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी वजह चीन की कई वर्षों से बनाई गई रणनीति थी। उसने संकट आने से पहले ही अपनी तैयारी पूरी कर ली थी। मसलन, चीन ने पिछले कई वर्षों में रूस और ईरान से भारी छूट पर तेल खरीदकर अपने रणनीतिक और व्यावसायिक भंडार भर लिए। अनुमान है कि उसके पास 100 करोड़ बैरल से अधिक तेल का स्टॉक मौजूद था। जैसे ही ग्लोबल मार्केट में क्रूड ऑयल की कमी शुरू हुई, चीन ने नए बैरल खरीदने के बजाय अपने स्टॉक का इस्तेमाल शुरू कर दिया। इस दौरान चीन ने आयात में करीब 30 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी कर दी। इससे बाकी देशों के लिए बाजार में अधिक तेल उपलब्ध रहा और कीमतों पर दबाव कम हुआ।

इलेक्ट्रिक वाहनों ने घटा दी तेल की भूख

चीन में बिकने वाली लगभग आधी नई कारें अब इलेक्ट्रिक या हाइब्रिड हैं। दुनिया में आज सबसे ज्यादा इलेक्ट्रिक वाहन चीन में हैं। इसकी वजह से चीन के परिवहन क्षेत्र में तेल की मांग लगातार घट रही है। यही वजह है कि चीन पहले की तुलना में वैश्विक तेल बाजार पर कम दबाव डालता है और जरूरत पड़ने पर अपनी खरीद आसानी से घटा सकता है।

चीन अब 'स्विंग बायर' बना

चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए न्यूक्लियर और सोलर जैसे अल्टरनेट स्रोतों पर भी जोर दे रहा है। इसकी वजह से क्रूड जैसे स्रोतों पर उसकी निर्भरता घट रही है। इसकी वजह से चीन अब स्विंग बायर बन गया है। पहले सऊदी अरब जैसे उत्पादक स्विंग प्रोड्यूसर के तौर पर उत्पादन बढ़ाकर या घटाकर कीमतों को प्रभावित करते थे। लेकिन, अब चीन स्विंग बायर बनकर डिमांड साइड से कीमतों को कंट्रोल कर रहा है।

भारत के लिए क्या संदेश?

भारत को इस पूरे घटनाक्रम से दो बड़ी सीख मिलती हैं। पहली, चीन ने इस तरह के हालात से निपटने के लिए कई सालों पहले तैयारी की, जिसकी वजह से उसे महंगा तेल आयात करने से राहत मिली और अपनी मांग घटाने से भारत जैसे बड़े आयातक देशों को भी महंगे तेल से तत्काल राहत मिली।

इसके अलावा चीन का रणनीतिक तेल भंडार केवल आपातकालीन सुरक्षा का साधन नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत का भी प्रतीक बन गया।

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    Yateendra Lawaniya
    यतींद्र लवानियाauthor

    प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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