अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के सैन्य ठिकानों पर किए गए हालिया हमलों ने पूरे मध्य पूर्व को युद्ध की आग में झुलसा दिया है। ईरान ने इस लड़ाई को निर्णायक अंत तक ले जाने की धमकी दी है, ईरान ने साफ कर दिया है कि इस लड़ाई का अंत वह खुद करेगा। इन धमकियों के बीच एक बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं इस विनाशकारी झटके को कैसे सह पाएंगी और किसकी अर्थव्यवस्था ढह जाएगी? युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि खजाने से भी लड़े जाते हैं। आइए, आंकड़ों और वर्तमान परिस्थितियों के आईने में देखते हैं कि इस विनाशकारी युद्ध में किसकी आर्थिक नींव कितनी मजबूत है।
आर्थिक आंकड़ों में इजरायल का दबदबा
आर्थिक ताकत के मामले में इजरायल और ईरान के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। अनुमानों के अनुसार, इजरायल की जीडीपी (GDP) लगभग 666.4 अरब डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है, जबकि इसकी आबादी केवल एक करोड़ के आसपास है। इसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी लगभग 60,000 डॉलर है, जो दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक है। इसके विपरीत, 9 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले ईरान की जीडीपी केवल 375 अरब डॉलर के करीब है और प्रति व्यक्ति आय महज 4,000 डॉलर है। इजरायल को अमेरिका और पश्चिमी देशों का मजबूत आर्थिक समर्थन प्राप्त है, जो उसे लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता देता है।
गाजा युद्ध का इजरायल पर आर्थिक बोझ
हालांकि इजरायल आर्थिक रूप से मजबूत है, लेकिन अक्टूबर 2023 से चल रहे गाजा अभियान ने उसकी अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाला है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 के अंत तक इजरायल इस युद्ध पर 67.5 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। स्थिति को संभालने के लिए इजरायली कैबिनेट ने इस साल युद्ध मद में 35 अरब डॉलर का भारी-भरकम बजट मंजूर किया है। संघर्ष के कारण मजदूरों की कमी, व्यापार में रुकावट और पर्यटन में गिरावट ने करीब 60,000 इजरायली कंपनियों को बंद होने पर मजबूर कर दिया है। यह युद्ध इजरायल के लिए भी आर्थिक रूप से काफी महंगा साबित हो रहा है।
प्रतिबंधों और महंगाई से बेहाल ईरान
ईरान की आर्थिक स्थिति इजरायल की तुलना में अत्यंत कमजोर है, जिसका मुख्य कारण पश्चिमी देशों के कड़े आर्थिक प्रतिबंध (Sanctions) हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कच्चे तेल के निर्यात पर टिकी है, लेकिन इन प्रतिबंधों ने उसकी मुद्रा, ईरानी रियाल, को मिट्टी में मिला दिया है। आज स्थिति यह है कि एक भारतीय रुपया 14,434 ईरानी रियाल के बराबर है। देश में महंगाई दर आसमान छू रही है, जिससे आम जनता का जीवन नरक बन गया है। ईरान की जीडीपी में रिवॉल्यूशनरी गार्ड का नियंत्रण है, जो पूरी तरह से पारदर्शी नहीं है, जिससे आर्थिक संकट और गहरा गया है।
तेल के कुओं पर निर्भर इकोनॉमी
ईरान की पूरी औद्योगिक क्षमता उसके तेल उद्योग पर टिकी है, जिसका 90% से ज्यादा निर्यात अकेले चीन को होता है। यदि इजरायल युद्ध के दौरान ईरान के तेल ठिकानों को निशाना बनाता है, तो ईरान का राजस्व पूरी तरह बंद हो जाएगा और उसकी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी। पहले से ही गरीबी रेखा के नीचे जी रही ईरानी आबादी के लिए युद्ध एक बड़ी त्रासदी साबित होगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि ईरान लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष को आर्थिक रूप से झेलने के लिए तैयार नहीं है।
