मिडिल ईस्ट में छिड़ी जंग का असर अब आम आदमी की गाड़ी की टंकी तक पहुंचने लगा है। कच्चे तेल की सप्लाई बाधित होने के डर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें अस्थिर हैं। कुछ गरीब और आर्थिक संकट से जूझ रहे देशों में तेल का स्टॉक इतना कम बचा है कि वहां की सरकारों ने 'फ्यूल राशनिंग' (Fuel Rationing) का रास्ता अपनाया है। इसका मतलब है कि अब लोग अपनी मर्जी से टंकी फुल नहीं करा सकते, बल्कि सरकार द्वारा तय की गई सीमित मात्रा में ही उन्हें ईंधन मिल रहा है।
क्या होती है फ्यूल राशनिंग (Fuel Rationing)?
आसान भाषा में समझें तो यह 'ईंधन का राशन कार्ड' जैसा सिस्टम है। जब किसी देश में तेल की भारी कमी हो जाती है, तो सरकार एक 'कोटा सिस्टम' लागू करती है। इसके तहत दोपहिया वाहनों, कारों और कमर्शियल वाहनों के लिए प्रतिदिन या प्रति सप्ताह की एक सीमा तय कर दी जाती है। उदाहरण के तौर पर, कुछ देशों में कारों के लिए दिन में केवल 5 लीटर और दोपहिया वाहनों के लिए 2 लीटर पेट्रोल की सीमा तय की गई है। यह कदम इसलिए उठाया जाता है ताकि देश की आवश्यक सेवाएं जैसे एम्बुलेंस, दमकल और पुलिस की गाड़ियां न रुकें।
किन देशों में है बुरा हाल?
फ्यूल राशनिंग की सबसे खराब मार उन देशों पर पड़ रही है जिनकी अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर थी। श्रीलंका में पिछले आर्थिक संकट के दौरान पेट्रोल के लिए कई किलोमीटर लंबी लाइनें और क्यूआर कोड (QR Code) आधारित कोटा सिस्टम देखा गया था। वर्तमान में क्यूबा और कुछ अफ्रीकी देशों में भी तेल की भारी किल्लत है। वहां पेट्रोल पंपों पर सेना तैनात करनी पड़ी है ताकि लोग तेल के लिए आपस में न लड़ें। ईरान-इजरायल युद्ध के चलते यदि होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसा महत्वपूर्ण तेल मार्ग बंद होता है, तो ऐसे देशों की सूची और लंबी हो सकती है।
भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का आयातक है। हालांकि भारत के पास पर्याप्त रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserves) हैं, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत की चिंता बढ़ा सकता है। फिलहाल भारत में तेल की कमी या राशनिंग जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन वैश्विक कीमतों में उछाल सीधे तौर पर महंगाई को बढ़ा सकता है। डीजल महंगा होने से माल ढुलाई महंगी हो जाती है, जिससे फल, सब्जी और अनाज की कीमतों में भी तेजी आती है।
गैस और बिजली पर भी असर
यह संकट केवल पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहता। तेल की कमी से गैस (LPG) और बिजली उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ता है। कई देशों में तेल की कमी के कारण पावर कट (Load Shedding) शुरू हो गया है क्योंकि वहां बिजली बनाने के लिए तेल का इस्तेमाल होता है।
