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तेल बाजार में 2008 की यादें, क्या फिर 150 डॉलर प्रति बैरल होगा क्रूड?

Crude Oil Prices: हफ्ते के पहले दिन सोमवार को क्रूड ऑयल के रेट में जोरदार तेजी आई है और यह 100 डॉलर प्रति बैरल के स्‍तर को पार कर 114 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है। कुवैत द्वारा उत्‍पादन घटाने के ऐलान के बाद तेल बाजार में आग लगी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या फिर से तेल बाजार में 2008 वाला मंजर लौटने वाला है?

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Iran oil Crisis

Crude Oil Prices: दुनिया भर के एनर्जी मार्केट में एक बार फिर वैसी ही हलचल मची है जैसी साल 2008 की महामंदी के समय देखी गई थी। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव, खास तौर पर 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) के संकट ने वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मचा दिया है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें तेजी से $100 को पार कर $114 प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या कच्चा तेल एक बार फिर $150 प्रति बैरल के उस ऐतिहासिक रिकॉर्ड को छुएगा जिसने 18 साल पहले पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दिया था? भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जरूरत का 85% तेल आयात करता है, यह स्थिति किसी 'आर्थिक सुनामी' से कम नहीं है।

सोमवार, 9 मार्च को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड फ्यूचर्स 23% की भारी बढ़त के साथ $114 के करीब पहुंच गया, वहीं अमेरिकी क्रूड (WTI) ने 20% की छलांग लगाकर $114 का स्तर छू लिया है। पिछले सप्ताह अमेरिकी क्रूड में 35% की ऐतिहासिक बढ़त देखी गई, जो 1983 के बाद एक दिन में सबसे बड़ी तेजी है। बाजार के जानकारों का मानना है कि $100 तो महज एक शुरुआत है। कतर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने चेतावनी दी है कि अगर युद्ध नहीं रुका और खाड़ी देशों को उत्पादन पूरी तरह बंद करना पड़ा, तो कच्चे तेल की कीमतें $150 प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं।

वहीं, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से न केवल पेट्रोल डीजल महंगा होगा बल्कि आम जनता की जेब पर भी असर पड़ेगा। आइए आपको बताते हैं कच्चे तेल के महंगे होने से क्या क्या महंगा हो सकता है?

क्या फिर लौटेगा 2008 का वो मंजर?

साल 2008 में जब क्रूड $147 के करीब पहुंचा था, तब दुनिया में तेल की मांग चरम पर थी। आज 2026 में, मांग के साथ-साथ 'सप्लाई चेन' का टूटना सबसे बड़ी चुनौती है। अगर ईरान और इजरायल के बीच तनाव की वजह से हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद हो जाता है, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, तो $150 का आंकड़ा पार करना कोई बड़ी बात नहीं होगी। हालांकि, 2008 के मुकाबले आज भारत के पास बेहतर विदेशी मुद्रा भंडार और सोलर एनर्जी जैसे विकल्प बढ़े हैं, लेकिन तेल की यह मंदी या तेजी आज भी भारतीय बाजार की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी है।

भारत का बढ़ता 'इंपोर्ट बिल' और अर्थव्यवस्था पर चोट

जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, भारत का इंपोर्ट बिल (Import Bill) यानी तेल खरीदने का खर्च सीधे तौर पर बढ़ जाता है। भारत हर साल अरबों डॉलर का कच्चा तेल खरीदता है। अगर कीमतें $110 या $150 तक पहुंचती हैं, तो सरकार को विदेशी मुद्रा भंडार से कहीं ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ेगा। इसका सीधा असर देश के व्यापार घाटे (Trade Deficit) पर पड़ता है। जब देश की कमाई का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ तेल खरीदने में चला जाता है, तो जनकल्याणकारी योजनाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट के लिए फंड की कमी होने लगती है।

डॉलर के मुकाबले कमजोर होता रुपया

कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग का सीधा कनेक्शन हमारी करेंसी से भी है। चूंकि कच्चे तेल का भुगतान अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमेरिकी डॉलर में किया जाता है, इसलिए तेल महंगा होने पर डॉलर की मांग बढ़ जाती है। मांग बढ़ने से रुपया (Rupee) डॉलर के मुकाबले और कमजोर होने लगता है। रुपये की कमजोरी का मतलब है कि अब हमें उतना ही सामान खरीदने के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे। इससे न केवल तेल, बल्कि विदेश से आने वाली हर चीज जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी और सोना चांदी महंगी हो जाती है।

पेंट और टायर इंडस्ट्री पर सीधा असर

कच्चा तेल सिर्फ गाड़ियों में पेट्रोल-डीजल भरने के काम नहीं आता, बल्कि यह कई उद्योगों के लिए 'कच्चे माल' (Raw Material) का आधार है। पेंट (Paint) बनाने वाली कंपनियां भारी मात्रा में क्रूड डेरिवेटिव्स का इस्तेमाल करती हैं। तेल महंगा होते ही पेंट बनाना महंगा हो जाता है और इसका बोझ ग्राहकों पर डाल दिया जाता है। इसी तरह, टायर (Tyre) इंडस्ट्री में भी पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का बड़े पैमाने पर उपयोग होता है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो टायर निर्माण की लागत बढ़ जाती है, जिससे आपकी गाड़ी के नए टायर खरीदना अब जेब पर भारी पड़ने लगता है।

हर घर का बजट होगा प्रभावित

तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा और डरावना असर महंगाई (Inflation) के रूप में सामने आता है। इसे एक 'चेन रिएक्शन' की तरह समझा जा सकता है। तेल महंगा होने से ट्रक, टेंपो और मालगाड़ियों का भाड़ा बढ़ जाता है। जब ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ती है, तो किसान की फसल मंडी तक पहुंचने और मंडी से आपके घर तक आने में महंगी हो जाती है। सब्जियां, फल, दूध, अनाज और अन्य किराना सामान की कीमतें अपने आप बढ़ जाती हैं। सीधे शब्दों में कहें तो तेल की कीमतों में लगी आग अंततः आम आदमी की रसोई तक पहुंच जाती है और पूरी अर्थव्यवस्था में महंगाई का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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