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दुनिया अमेरिका-ईरान की लड़ाई में व्यस्त, भारत-चीन खोलने जा रहे व्यापार का नया रास्ता

दुनिया जहां अमेरिका-ईरान की लड़ाई में व्यस्त है। वहीं, भारत और चीन ने कारोबार बढ़ाने के लिए नए रास्ते से व्यापार शुरू करने की तैयारी कर ली है। 2020 में दोनों देशों के बीच हुई झड़प के बाद से लिपुलेख से कारोबार बंद है। लेकिन, अब खुलने जा रहा है।

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लिपुलेख से जून से शुरू होगा कारोबार

Lipulekh Pass Trade Restart: दुनिया में जहां अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के चलते कोहराम मचा है। भारत और चीन ने आपसी कारोबारी हितों को देखते हुए करीब 6 साल के ठहराव के बाद लिपुलेख दर्रे से बॉर्डर ट्रेड फिर शुरू करने की तैयारी पूरी कर ली है। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक यह जून 2026 से शुरू होने वाला यह व्यापार जहां सीमावर्ती इलाकों के लिए राहत है, वहीं नेपाल ने इसे अपनी संप्रभुता से जुड़ा मुद्दा बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

6 साल बाद खुलेगा ट्रेड रूट

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में स्थित लिपुलेख दर्रे से भारत-चीन सीमा व्यापार को 2026 में फिर शुरू किया जाएगा। यह व्यापार आमतौर पर जून से सितंबर के बीच चलता है। केंद्र सरकार के निर्देश के बाद स्थानीय प्रशासन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। विदेश मंत्रालय, गृह मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय से मंजूरी मिलने के बाद जिला प्रशासन को ट्रांजिट कैंप, बैंकिंग, कस्टम, सुरक्षा और मेडिकल सुविधाओं की तैयारी करने को कहा गया है। यह रूट 2019 में कोविड और सीमा तनाव के कारण बंद हो गया था।

नेपाल क्यों जता रहा विरोध

नेपाल ने इस फैसले पर “कड़ा एतराज” जताया है। काठमांडू का कहना है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र उसके दार्चुला जिले का हिस्सा हैं। नेपाल 1816 की सुगौली संधि का हवाला देता है, जिसके अनुसार काली नदी को भारत-नेपाल सीमा माना गया था। नेपाल का दावा है कि नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, जिससे यह पूरा इलाका उसके हिस्से में आता है। वहीं भारत का मानना है कि काली नदी का उद्गम कालापानी के पास है, जिससे लिपुलेख भारतीय सीमा में आता है।

2020 में बढ़ा था विवाद

साल 2020 में यह विवाद तब और बढ़ गया जब भारत ने धारचूला से लिपुलेख तक 80 किमी लंबी सड़क का उद्घाटन किया। इसका उद्देश्य कैलाश मानसरोवर यात्रा और सीमा लॉजिस्टिक्स को बेहतर बनाना था। इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया और बाद में इसे संविधान में भी शामिल कर लिया। भारत ने इसे “अनुचित नक्शा दावा” बताया था।

भारत का नजरिया अलग

भारत इस फैसले को पारंपरिक व्यापार को बहाल करने के तौर पर देखता है। लिपुलेख 1992 में चीन (तिब्बत) के साथ व्यापार के लिए खोला गया पहला प्रमुख बॉर्डर पोस्ट था। सरकार का कहना है कि सीमा विवाद को कूटनीतिक बातचीत से सुलझाया जाएगा, जबकि व्यापार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।

अर्थव्यवस्था को मिलेगा सहारा

लिपुलेख सिर्फ व्यापार का रास्ता नहीं है, बल्कि कैलाश मानसरोवर यात्रा का अहम मार्ग भी है। इसके खुलने से सीमावर्ती भोटिया समुदाय और स्थानीय व्यापारियों को बड़ा फायदा मिलेगा। तिब्बत के तकलाकोट में 2019 से पड़े सामान को भी व्यापारी वापस ला सकेंगे। इससे क्षेत्रीय व्यापार, रोजगार और इंफ्रास्ट्रक्चर को नई गति मिलने की उम्मीद है।

रणनीतिक मायने भी अहम

यह कदम भारत-चीन के बीच रिश्तों में धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर बढ़ने का संकेत भी है। साथ ही यह सीमावर्ती इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। हालांकि, नेपाल के साथ सीमा विवाद अब भी अनसुलझा है, जिससे आने वाले समय में कूटनीतिक चुनौतियां बनी रह सकती हैं।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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