2 देशों की लड़ाई में भारत के बासमती चावल कारोबार पर मंडराया संकट, गिर सकते हैं दाम
- Authored by: रिचा त्रिपाठी
- Updated Jan 17, 2026, 06:08 PM IST
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाने की चेतावनी से भारतीय बासमती चावल उद्योग में बेचैनी बढ़ गई है। ईरान, भारत के बासमती चावल का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार है, ऐसे में वहां होने वाले निर्यात पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। इस अनिश्चित हालात का असर अब नए सौदों, भुगतान व्यवस्था और मंडियों में बासमती चावल की कीमतों पर भी साफ नजर आने लगा है।
Basmati Rice
भारत का बासमती चावल पूरी दुनिया में अपनी खुशबू और क्वालिटी के लिए जाना जाता है, लेकिन अब इसके निर्यात को लेकर चिंता बढ़ती नजर आ रही है। इसकी वजह है अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का ईरान को लेकर लिया गया नया फैसला। ट्रंप ने ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर कड़े टैरिफ लगाने के संकेत दिए हैं, जिसका सीधा असर भारत के बासमती चावल निर्यात पर पड़ सकता है।
दरअसल, ईरान भारत के बासमती चावल का एक बड़ा खरीदार रहा है। हर साल बड़ी मात्रा में भारत से बासमती चावल ईरान भेजा जाता है। लेकिन अब अमेरिका की सख्त नीति और ईरान पर बढ़ते आर्थिक दबाव के कारण वहां से ऑर्डर घटने की आशंका जताई जा रही है। इससे भारतीय निर्यातकों के साथ-साथ किसानों की चिंता भी बढ़ गई है।
भारत के लिए क्यों है परेशानी
जानकारों के मुताबिक, अगर ईरान पर और ज्यादा प्रतिबंध लगाए जाते हैं या टैरिफ बढ़ते हैं, तो वहां के आयातकों के लिए भारत से चावल खरीदना महंगा हो जाएगा। इसका नतीजा यह हो सकता है कि ईरान भारत से कम बासमती खरीदे या दूसरे सस्ते विकल्पों की तरफ रुख करे। इससे भारत के बासमती निर्यात में गिरावट आ सकती है।
एक और बड़ी समस्या पेमेंट को लेकर है। पहले ही कई भारतीय निर्यातकों का पैसा ईरान में अटका हुआ बताया जा रहा है। डॉलर की कमी और ईरानी मुद्रा की कमजोरी के चलते भुगतान में देरी हो रही है। अगर हालात और बिगड़ते हैं, तो यह रकम और ज्यादा समय तक फंसी रह सकती है, जिससे कारोबारियों को नुकसान होगा।
भारत कई देशों का पेट भरता है
हालांकि राहत की बात यह है कि ईरान ही भारत का इकलौता बाजार नहीं है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे देशों में भी भारतीय बासमती की अच्छी मांग है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान से मांग घटती भी है, तो भारत दूसरे बाजारों में इसकी भरपाई करने की कोशिश कर सकता है।
बासमती चावल की खासियत यह है कि इसकी खुशबू, लंबाई और स्वाद का कोई सस्ता विकल्प आसानी से नहीं मिल पाता। यही वजह है कि वैश्विक बाजार में इसकी पहचान बनी हुई है। इसी भरोसे के चलते निर्यातकों को उम्मीद है कि लंबी अवधि में बासमती की मांग बनी रहेगी।
सरकार और निर्यात संगठन भी हालात पर नजर बनाए हुए हैं। जरूरत पड़ने पर नए बाजार तलाशने, व्यापार समझौते बढ़ाने और भुगतान की समस्याओं को हल करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। इससे किसानों और कारोबारियों को राहत मिलने की उम्मीद है।
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