Insolvency and Bankruptcy Code : वित्तीय सेवा सचिव एम नागराजू ने बुधवार (28 जनवरी 2026) को कहा कि दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) ने भारत की कंपनियों की दिवाला समाधान प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। उन्होंने इसे “पासा पलटने वाला” बताते हुए कहा कि इसने पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता को बढ़ावा दिया है। नागराजू ने यह बातें भारतीय दिवाला और ऋणशोधन बोर्ड (आईबीबीआई) और इनसॉल इंडिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कही। नागराजू ने कहा कि आईबीसी ने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की नींव रखी है। उन्होंने हालांकि यह भी माना कि आईबीसी के सामने अभी कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियां बनी हुई हैं। इनमें मुख्य रूप से कर्ज समाधान और परिसमापन में लगने वाला समय, परिसंपत्तियों के मूल्य में होने वाला नुकसान, लेनदारों की कम वसूली, और राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) की क्षमता संबंधी सीमाएं शामिल हैं।
2025 का आईबीसी संशोधन विधेयक: चुनौतियों का समाधान
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक नागराजू ने बताया कि आईबीसी संशोधन विधेयक, 2025 इन चुनौतियों को दूर करने के प्रयास में लाया गया है। यह विधेयक मुख्य रूप से समाधान और परिसमापन में होने वाली देरी और कम वसूली दर जैसी समस्याओं पर केंद्रित है। विधेयक में समूह दिवाला प्रक्रिया, सीमा-पार दिवाला और लेनदार-प्रेरित दिवाला प्रक्रियाओं से जुड़े नए प्रावधान प्रस्तावित किए गए हैं। इससे आईबीसी की कार्यप्रणाली और अधिक मजबूत और व्यापक होगी। उन्होंने उम्मीद जताई कि इन सुधारों से दिवाला मामलों के समाधान की समयसीमा और प्रभावशीलता में सुधार होगा, निवेशकों और लेनदारों का भरोसा बढ़ेगा, और भारत की दिवाला प्रणाली वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप होगी।
आईबीसी के छह संशोधन और सरकारी प्रयास
आईबीसी को 2016 में लागू किए जाने के बाद अब तक इसमें छह संशोधन किए जा चुके हैं। नागराजू ने बताया कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय और आईबीबीआई के प्रयासों के अलावा वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) भी दिवाला प्रक्रियाओं को तेज करने के लिए लगातार कदम उठा रहा है। इनमें सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बड़े खातों की नियमित समीक्षा, आईबीबीआई के साथ सक्रिय समन्वय और बैंकों को सामान्य परामर्श जारी करना शामिल है। नागराजू ने कहा कि आईबीसी सरकार के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है। उन्होंने वित्तीय आंकड़े साझा करते हुए बताया कि सितंबर 2025 तक 1,300 कॉरपोरेट कर्जदारों के मामलों में समाधान योजनाएं मंजूर की गईं, जिससे लेनदारों को लगभग चार लाख करोड़ रुपये की वसूली हुई। इसके परिणामस्वरूप अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (एनपीए) अनुपात 2.05% और शुद्ध एनपीए 0.52% रह गया।
आईबीसी से बकाया जल्द चुकाने की प्रेरणा
नागराजू ने यह भी बताया कि कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआईआरपी) शुरू होने पर कंपनियों का नियंत्रण खोने का डर देनदारों को जल्द बकाया चुकाने के लिए प्रेरित कर रहा है। मार्च 2025 तक सीआईआरपी शुरू करने से जुड़े 30,310 आवेदन एनसीएलटी में जाने से पहले ही सुलझा लिए गए थे। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2023-24 में 1.41 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया था, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1.78 लाख करोड़ रुपये हो गया। ये आंकड़े आईबीसी की सफलता और भारतीय बैंकिंग प्रणाली की मजबूती को दर्शाते हैं।
नागराजू ने जोर देकर कहा कि आईबीसी ने न केवल कंपनियों के दिवाला समाधान की प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाया है, बल्कि यह निवेशकों और लेनदारों के भरोसे को बढ़ाने, बैंकिंग क्षेत्र की दृष्टि सुधारने, और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप दिवाला प्रणाली विकसित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आगामी आईबीसी संशोधन विधेयक इन सुधारों को और सुदृढ़ करेगा और भारत की अर्थव्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाएगा।
