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कैसे और कहां तय होती है 'काले सोने' की कीमत?

कच्चा तेल जिसे ‘काला सोना’ कहा जाता है, उसकी कीमत सिर्फ किसी एक देश या सरकार तय नहीं करती। इसकी दरें अंतरराष्ट्रीय बाजार, मांग-आपूर्ति, डॉलर की चाल और वैश्विक हालात जैसे कई फैक्टर मिलकर तय करते हैं। ऐसे में आम आदमी के लिए यह समझना जरूरी है कि आखिर क्रूड ऑयल की कीमत कैसे और कहां तय होती है, और इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्यों पड़ता है।

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Crude Oil Prices

क्रूड ऑयल, जिसे बाजार में ‘काला सोना’ कहा जाता है, न सिर्फ ऊर्जा का एक मुख्य स्रोत है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का भी सबसे अहम हिस्‍सा है। हर दिन दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं में इसका इस्तेमाल होता है गाड़ियों के इंजन से लेकर फैक्ट्रियों तक, बिजली उत्पादन से लेकर प्लास्टिक बनाने तक। इसलिए यह जानना जरूरी है कि कच्चे तेल की कीमत आखिर तय कहां और कैसे होती है और उसके बाद इसका असर पेट्रोल-डीज़ल जैसे ईंधन की कीमतों पर कैसे पड़ता है?

कैसे तय होती हैं काले सोने की कीमतें?

काला सोना यानि क्रूड ऑयल की कीमतें सप्लाई और डिमांड (मांग और आपूर्ति) के नियम से तय होती हैं। जब दुनिया में तेल की मांग बढ़ती है और सप्लाई सीमित रहती है, तो कीमतें ऊपर जाती हैं; और जब सप्लाई ज़्यादा और मांग कम होती है, तो कीमतें गिरती हैं। यह नियम सीधे पूरे वैश्विक बाजार पर लागू होता है, न कि सिर्फ किसी एक देश पर। इसलिए यह कहा जाता है कि तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर तय होती हैं यानी जहां यह दुनिया भर में खरीदा और बेचा जाता है उसे देखकर।

बेंचमार्क (Benchmark)

तेल के भाव का असली फैसला कुछ प्रमुख बेंचमार्क क्रूड्स के आधार पर होता है। इनमें सबसे मुख्य हैं ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) और WTI (West Texas Intermediate)। ये बेंचमार्क इस वजह से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि दुनिया भर के ट्रेडर इन्हें रेफरेंस प्राइस मानते हैं। दुनिया भर के तेल के सौदों, फ्यूचर्स और कॉन्ट्रैक्ट्स के दाम इसी आधार पर तय होते हैं।

बेंचमार्क के भाव हर दिन बाजार में बदलते हैं क्योंकि उन्हें सप्लाई, मांग, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की धारणा (market sentiment) के हिसाब से नया मूल्य मिलता है। उदाहरण के लिए, अगर OPEC+ जैसे देश उत्पादन कम करने का निर्णय लेते हैं, तो सप्लाई कम होगी और कीमतों में बढ़त आ सकती है; वहीं सप्लाई ज़्यादा होने पर कीमतें गिर सकती हैं।

भू-राजनीतिक तनाव और मार्केट सेंटीमेंट

तेल बाजार सिर्फ सप्लाई और डिमांड से ही प्रभावित नहीं होता भू-राजनीतिक घटनाओं का भी असर होता है। जैसे मध्य-पूर्व में तनाव, किसी बड़े उत्पादक देश पर प्रतिबंध या युद्ध की स्थिति ये सब तेल सप्लाई पर असर डालते हैं और कीमतों में तेजी या गिरावट ला सकते हैं। बाजार में निवेशक यह सोचकर पहले से दामों को एडजस्ट कर देते हैं कि भविष्य में सप्लाई बाधित हो सकती है।

इसके अलावा बाजार के निवेशक (speculators और hedgers) भी तेल के भाव पर असर डालते हैं। जब उन्हें लगता है कि भविष्य में कीमतें बढ़ेंगी, तो वे अभी से खरीदारी करते हैं; अगर गिरावट का अंदेशा है, तो बेचते हैं। इससे फ्यूचर्स मार्केट में कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ जाता है।

कच्चे तेल की कीमत पेट्रोल डीजल पर कैसे डालती हैं असर?

अब सवाल यह उठता है कि तेल की यह वैश्विक कीमत आम लोगों को कैसे प्रभावित करती है। भारत जैसे देश में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल के भाव बदलते हैं, तो इसका असर पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों पर सीधे दिखता है।

भारत में पेट्रोल और डीजल की रोज़ाना कीमतें क्रूड ऑयल की वैश्विक कीमत, डॉलर-रुपया विनिमय दर, और टैक्स (जैसे एक्साइज ड्यूटी, वैट) के आधार पर तय होती हैं। तेल कंपनियां हर दिन सुबह नए रेट जारी करती हैं ताकि वैश्विक मार्केट की चाल सीधे घरेलू कीमतों पर असर डाले। इसमें कच्चे तेल की कीमत एक बड़ा हिस्सा रखती है।

जैसे ही क्रूड की कीमत बढ़ती है, कंपनियों की लागत बढ़ती है और सरकार टैक्स आदि जोड़ने के बाद पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ा देती है। इसी कारण 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद तेल की कीमतों में उछाल आया तो पेट्रोल-डीज़ल भी महँगा हुआ है। वहीं जब तेल सस्ता होता है, तब भी टैक्स और अन्य शुल्क की वजह से खुदरा कीमतों में उतनी गिरावट नहीं दिखती।

दुनिया भर के संगठन और OPEC+ की भूमिका

विश्व के कई बड़े तेल उत्पादक देश मिलकर OPEC+ नाम से एक गठबंधन बनाते हैं। इसमें सऊदी अरब, रूस और अन्य प्रमुख उत्पादक देश शामिल हैं। यह समूह समय-समय पर उत्पादन बढ़ाने या घटाने का निर्णय लेता है, जिससे वैश्विक तेल कीमतों पर बड़ा असर पड़ता है। उदाहरण के तौर पर जब इन देशों ने उत्पादन कम किया, तो तेल की कीमतें ऊपर चली गईं।

मार्केट फ्यूचर्स, ट्रेडिंग और भावों की उतार-चढ़ाव

तेल को सिर्फ भौतिक उत्पाद के रूप में नहीं बल्कि फ्यूचर्स कॉन्ट्रैक्ट के रूप में भी खरीदा और बेचा जाता है। इसका मतलब है कि निवेशक भविष्य में तय मूल्य पर आज ही खरीदने या बेचने का निर्णय ले सकते हैं। यह ट्रेडिंग वैश्विक भावों को तेज़ी से बदल देती है।

भविष्य में तेल कीमतों के रुझान

आने वाले सालों में मांग और सप्लाई के बीच संतुलन, वैश्विक आर्थिक वृद्धि की दर, और ऊर्जा नीतियों में बदलाव (जैसे renewables में shift) क्रूड ऑयल की कीमतों को बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ विश्लेषणों में यह भविष्यवाणी की गई है कि लंबी अवधि में तेल की कीमतें कम हो सकती हैं अगर सप्लाई ज़्यादा रहे और मांग कम हो।

कहां होती है ट्रेडिंग?

अगर एक बैरल कच्चे तेल की बात करें, तो इसमें 158.987 लीटर, यानी लगभग 159 लीटर तेल होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के मौजूदा भाव के हिसाब से देखें तो 1 लीटर ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 40 रुपये और 1 लीटर WTI क्रूड लगभग 38.80 रुपये के आसपास बैठती है। यहां यह समझना जरूरी है कि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। इसी वजह से कच्चे तेल की कीमतों को आमतौर पर डॉलर में ही आंका जाता है।

भारत में कच्चे तेल की ट्रेडिंग MCX (मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज) पर होती है, जहां इसके भाव रुपये में तय किए जाते हैं। लेकिन जब भारत दूसरे देशों से तेल खरीदता है, तो उसका भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। ऐसे में डॉलर-रुपया विनिमय दर बेहद अहम हो जाती है। अगर रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है, तो भारत को कच्चा तेल सस्ता पड़ता है, वहीं अगर रुपया कमजोर होता है तो उसी तेल के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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