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History of LPG in India: लकड़ी और कोयले को पीछे छोड़ कैसे हर भारतीय रसोई की शान बना 'लाल सिलेंडर', बदल दिया भारत का ₹1 लाख करोड़ का एनर्जी मार्केट?

पारंपरिक चूल्हे से एलपीजी तक, भारतीय रसोई ने लंबा सफर तय किया है। कभी गांवों की आत्मनिर्भरता स्वाद और पोषण का आधार थी, पर अब हम पेट्रोलियम उत्पादों और बाजार पर निर्भर हैं।

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lpg cylinder crisis

भारत में रसोई की तस्वीर हमेशा से ऐसी नहीं थी जैसी आज हम देखते हैं। कुछ दशक पहले तक देश की अधिकांश आबादी सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक के लिए लकड़ी, कोयले और उपलों (गोबर के कंडे) पर निर्भर थी। लेकिन आज वही भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी (LPG) उपभोक्ता बन चुका है। यह सफर केवल एक ईंधन के बदलने की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत के ₹1 लाख करोड़ से भी बड़े एनर्जी मार्केट के कायाकल्प और करोड़ों महिलाओं को धुएं से आजादी दिलाने की महागाथा है। जब ईरान-इजरायल युद्ध के कारण गैस सप्लाई पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, तब इस 'लाल सिलेंडर' के इतिहास और इसकी मजबूती को समझना और भी जरूरी हो जाता है।

कब हुई एलपीजी की शुरुआत

भारत में एलपीजी की शुरुआत 1950 के दशक में हुई थी, लेकिन तब यह केवल बड़े शहरों के कुछ रईस परिवारों तक ही सीमित था। उस दौर में गैस कनेक्शन होना 'स्टेटस सिंबल' माना जाता था और एक सिलेंडर पाने के लिए हफ्तों का इंतजार करना पड़ता था। 1970 और 80 के दशक में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) ने इसके वितरण का जिम्मा संभाला, जिससे इसकी पहुंच मध्यम वर्ग तक हुई। हालांकि, असली क्रांति तब आई जब सरकार ने इसे 'सब्सिडी' और 'डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर' (PAHAL योजना) से जोड़ा। इससे न केवल लीकेज रुकी, बल्कि सरकार को भी यह समझ आया कि गैस को घर-घर पहुंचना केवल जनसेवा नहीं, बल्कि एक विशाल इकॉनमी को खड़ा करना है।

1 लाख करोड़ का मार्केट

इस पूरे बदलाव में 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' (PMUY) ने गेम-चेंजर की भूमिका निभाई। इस योजना ने ग्रामीण भारत की उन करोड़ों महिलाओं तक एलपीजी पहुँचाया, जो सदियों से चूल्हे के धुएं में अपनी सेहत खराब कर रही थीं। उज्ज्वला योजना के बाद भारत में एलपीजी कवरेज लगभग 99% तक पहुंच गया। बिजनेस के नजरिए से देखें तो इसने एक विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया हजारों बॉटलिंग प्लांट्स, लाखों डिलीवरी ट्रक और लाखों लोगों के लिए रोजगार के अवसर। आज भारत का एलपीजी मार्केट ₹1 लाख करोड़ से अधिक का हो चुका है, जिसमें घरेलू गैस के साथ-साथ कमर्शियल और इंडस्ट्रियल गैस की मांग भी लगातार बढ़ रही है।

इतिहास गवाह है कि भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए हमेशा से आयात पर निर्भरता झेली है। आज हम अपनी 50% से अधिक एलपीजी की जरूरत विदेशों से, खासकर मिडिल-ईस्ट के देशों से पूरी करते हैं। यही कारण है कि जब 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' जैसे रास्तों पर युद्ध की स्थिति बनती है, तो भारत में भी हलचल तेज हो जाती है। लेकिन आज का भारत 1970 के दशक जैसा नहीं है। आज हमारे पास एक मजबूत सप्लाई चेन है और सरकार ने ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों (जैसे बायोगैस और पाइप वाली प्राकृतिक गैस - PNG) पर भी काम शुरू कर दिया है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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