अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए हम सब सबसे ज्यादा भरोसा बैंकों पर करते हैं। चाहे सेविंग्स अकाउंट हो या फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), हमें लगता है कि बैंक में हमारा पैसा हमेशा सेफ है। लेकिन पिछले कुछ समय में पंजाब एंड महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव (PMC) बैंक और यस बैंक (Yes Bank) जैसे बड़े बैंकिंग संकटों ने आम जनता की चिंता बढ़ा दी थी। हाल ही में रिजर्व बैंक (RBI) ने कुछ और छोटे को-ऑपरेटिव बैंकों पर भी कड़े एक्शन लिए हैं, जैसे सर्वोदय को-ऑपरेटिव बैंक और कार्वार अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक के लाइसेंस रद्द किए गए हैं। ऐसे में खाताधारकों का भरोसा बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी में है। लाइव मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त मंत्रालय ने बैंक डिपॉजिट पर मिलने वाली इंश्योरेंस लिमिट यानी बीमा सुरक्षा की सीमा को 5 लाख से बढ़ाकर 7.5 लाख करने का एक नया प्रस्ताव प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को भेजा है, जिसे जल्द ही मंजूरी मिल सकती है।
कौन देता है बीमा सुरक्षा
इस पूरे मामले को और इसके फायदे को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि यह बीमा सुरक्षा हमें देता कौन है। भारत में जब आप किसी भी सरकारी, प्राइवेट, विदेशी या को-ऑपरेटिव बैंक में पैसा जमा करते हैं, तो उस पैसे को सुरक्षा देने की जिम्मेदारी 'डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन' (DICGC) की होती है। DICGC असल में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की ही एक पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था (Subsidiary) है। इस संस्था का मुख्य काम देश के सभी रजिस्टर्ड बैंकों (जिनकी संख्या मार्च 2026 तक 1,950 है) में जमा आम जनता के पैसों का बीमा करना है। इसके लिए ग्राहकों को अपनी जेब से एक भी रुपया नहीं देना होता, बल्कि इसका पूरा प्रीमियम खुद बैंक चुकाते हैं। अगर कोई बैंक पूरी तरह कंगाल हो जाता है या बंद होता है, तो कानूनन DICGC की यह जिम्मेदारी होती है कि वह प्रभावित ग्राहकों को उनका पैसा वापस लौटाए। वित्तीय वर्ष 2026 में ही DICGC ने संकट में फंसे 72 अर्बन को-ऑपरेटिव बैंकों के ग्राहकों के 1,988 करोड़ के क्लेम सेटल किए हैं।
पहले 1 लाख रुपए ही मिलता था
अगर इस इंश्योरेंस लिमिट के इतिहास पर नजर डालें, तो लंबे समय तक यह सीमा सिर्फ 1 लाख हुआ करती थी। यानी बैंक में आपके चाहे कितने भी लाख रुपये जमा हों, बैंक डूबने पर आपको केवल 1 लाख रुपये ही वापस मिलने की गारंटी थी। लेकिन सरकार ने फरवरी 2020 में एक बड़ा फैसला लेते हुए इस लिमिट को पांच गुना बढ़ाकर 1 लाख से सीधे 5 लाख कर दिया था। अब एक बार फिर ग्राहकों का भरोसा मजबूत करने और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए इस लिमिट को 5 लाख से बढ़ाकर 7.5 लाख करने की तैयारी चल रही है। अगर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से इस प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाती है, तो साल 2020 के बाद यह पहला मौका होगा जब डिपॉजिट इंश्योरेंस की सीमा में इतना बड़ा इजाफा देखा जाएगा। राहत की बात यह है कि मार्च 2026 तक DICGC का अपना खुद का डिपॉजिट इंश्योरेंस फंड (DIF) भी 14.4% की सालाना बढ़त के साथ 2,61,823 करोड़ तक पहुंच चुका है, यानी ग्राहकों का पैसा चुकाने के लिए फंड की कोई कमी नहीं है।
DICGC का क्या है नियम
अब बात करते हैं कि इस 7.5 लाख की लिमिट का गणित काम कैसे करता है। DICGC के नियमों के मुताबिक, इस इंश्योरेंस कवर के दायरे में आपका प्रिंसिपल अमाउंट (मूलधन) और उस पर मिलने वाला ब्याज (Interest) दोनों शामिल होते हैं। यह नियम एक बैंक में एक ही व्यक्ति के नाम पर खुले सभी खातों को मिलाकर लागू होता है। इसके साथ ही, आरबीआई ने बैंकों के लिए एक नया 'रिस्क-बेस्ड प्रीमियम' (RBP) नियम भी पेश किया है। पहले सभी बैंकों को एक समान फ्लैट रेट (12 पैसे प्रति 100) पर प्रीमियम देना पड़ता था, लेकिन अब मजबूत और सुरक्षित बैंक (जिनका ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा है) कम प्रीमियम देंगे और कमजोर बैंकों को ज्यादा प्रीमियम देना होगा। इस बदलाव से पूरे बैंकिंग सेक्टर पर थोड़ा असर तो पड़ेगा, लेकिन छोटे जमाकर्ताओं का भरोसा सिस्टम में बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा। सरकार का यह नया फैसला देश के करोड़ों मिडिल क्लास परिवारों और सीनियर सिटीजंस के लिए एक बड़ा सुरक्षा कवच साबित होने जा रहा है।
