Govt plea against RIL Dismissed in court : मंगलवार को सरकार को झटका देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने मुकेश अंबानी (Mukesh Ambani) की रिलायंस इंडस्ट्रीज (Reliance Industries) या RIL और इसके पार्टनर्स पर फ्रॉड करने की याचिका खारिज कर दी है।
रिलायंस पर सरकार ने गलत तरीके 1.729 अरब डॉलर (14,185 करोड़ रु) से अधिक कमाने का आरोप लगाया था। सरकार की दलील थी कि उन्हें डिपॉजिट से गैस निकालकर उसे एक्स्पलॉइट करने का कोई अधिकार नहीं था।
रिलायंस को बड़ी राहत
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने 24 जुलाई, 2018 के इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन के फैसले को बरकरार रखा, जिसके तहत RIL के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम के पक्ष में फैसला सुनाया गया था। इस कंसोर्टियम में यूके की BP PLC और कनाडा की Niko Resources शामिल हैं। न्यायमूर्ति भंभानी ने कोई हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
क्या था सरकार की दलील
सरकार ने इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन के फैसले को साइड करने की मांग की थी और कहा था कि फैसला पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ है और इसमें एक ठेकेदार (आरआईएल) को एक प्रीमियम दिया है जिसने धोखाधड़ी के साथ-साथ क्रिमिनल ऑफेंस करके पैसा कमाया है।
इस मामले में आरआईएल के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम का पक्ष लेते हुए सिंगापुर में मौजूद आर्बिट्रेटर लॉरेंस बू की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल ने जुलाई 2018 में 2:1 से फैसला दिया था। फैसले में सरकार के तर्क को खारिज कर दिया गया था।
सरकार को करना होगा भुगतान
आर्बिट्रेशन ने कहा था कि प्रॉड्यूसिंग वेल्स (कुएं) कॉन्ट्रैक्ट एरिया में हों तो प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट ठेकेदार यानी रिलायंस को गैस का उत्पादन करने से नहीं रोकता। साथ ही कंसोर्टियम सरकार को किसी भी राशि का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं है।
इतना ही नहीं बाद में सरकार को कंसोर्टियम को मध्यस्थता की लागत के रूप में 8.3 मिलियन डॉलर (करीब 68 करोड़) का भुगतान करने का भी निर्देश दिया गया था।
2014 का है मामला
2014 में, ONGC ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर करके शिकायत की थी कि रिलायंस उसके ब्लॉक से गैस का उत्पादन कर रही है। फिर सरकार ने रिलायंस से 1.47 अरब डॉलर की मांग की थी।
