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महंगाई का झटका! अब और महंगे हो सकते हैं साबुन, तेल और खाने-पीने के सामान; जानिए क्यों बढ़ने वाली हैं कीमतें

कच्चे माल की बढ़ती लागत के कारण आने वाले दिनों में साबुन, तेल और खाने-पीने की चीजें 3 से 7% तक महंगी हो सकती हैं। कंपनियों द्वारा बढ़ी लागत का बोझ ग्राहकों पर डालने से आम जनता का बजट बिगड़ने के पूरे आसार है।

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Fuel Price Hike Impact

घरेलू बजट और रोजमर्रा की जरूरतों पर नजर रखने वाले आम उपभोक्ताओं के लिए एक बार फिर चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आ रही है। अगर आप आने वाले दिनों में घर का राशन, साबुन, शैम्पू, टूथपेस्ट या कुकिंग ऑयल (खाने का तेल) खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो आपको अपनी जेब थोड़ी ज्यादा ढीली करनी पड़ सकती है। हाल ही में आई एक वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार, फास्ट-मूविंग कंज्यूमर गुड्स (FMCG) यानी रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाले सामानों और खाने-पीने की चीजों की कीमतों में एक बार फिर बढ़ोतरी होने के पूरे आसार नजर आ रहे हैं। इस संभावित मूल्य वृद्धि का सीधा कारण इन सामानों को बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (Raw Materials) की लागत में लगातार हो रहा इजाफा है। कंपनियां अब इस बढ़ी हुई लागत का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डालने की तैयारी कर रही हैं, जिससे आम आदमी की मासिक रसोई का बजट बिगड़ सकता है।

क्यों महंगी होंगी चीजें?

इस संभावित महंगाई को समझने के लिए हमें सबसे पहले इसके पीछे की मुख्य वजह यानी कच्चे माल के गणित को समझना होगा। साबुन, डिटर्जेंट और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स बनाने के लिए पाम ऑयल (Palm Oil), क्रूड ऑयल (कच्चा तेल) और विभिन्न प्रकार के रसायनों की भारी आवश्यकता होती है। पिछले कुछ महीनों में वैश्विक और घरेलू बाजारों में इन बुनियादी चीजों के दाम तेजी से बढ़े हैं। इसके अलावा, खाने-पीने की चीजें जैसे बिस्कुट, स्नैक्स और पैकेज्ड फूड बनाने के लिए गेहूं, चीनी और खाद्य तेलों की जरूरत होती है, जिनकी कीमतें भी लगातार ऊपर जा रही हैं। जब कंपनियों को सामान तैयार करने में ही ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ता है, तो उनके पास अपने प्रॉफिट मार्जिन (मुनाफे) को बचाने के लिए प्रॉडक्ट्स के दाम बढ़ाने या फिर उनके पैकेट का वजन घटाने (Shrinkflation) के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता।

इनपुट कॉस्ट में हो रही बढ़ोतरी

विशेषज्ञों की मानें तो एफएमसीजी सेक्टर की बड़ी कंपनियां पिछले काफी समय से इस इनपुट कॉस्ट (लागत) में हो रही बढ़ोतरी को खुद झेलने की कोशिश कर रही थीं, ताकि बाजारों में मांग कम न हो। लेकिन अब कच्चे माल की कीमतें उनके नियंत्रण से बाहर होती जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कई बड़ी कंपनियों के अधिकारियों ने यह संकेत दिया है कि अगर कच्चे माल की कीमतों में जल्द ही गिरावट नहीं आई, तो वे आने वाली तिमाही में अपने चुनिंदा प्रोडक्ट्स की कीमतों में 3 से 7 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि जो सामान आपको अभी मिल रहा है, उसकी एमआरपी (MRP) आने वाले दिनों में बढ़ जाएगी। ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के बाजारों में इसका व्यापक असर देखने को मिल सकता है।

कीमतें बढ़ने का यह सिलसिला केवल पर्सनल केयर या ग्रॉसरी तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन (माल ढुलाई) के खर्चों में हुई बढ़ोतरी ने भी आग में घी डालने का काम किया है। जब कच्चे तेल के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिर होते हैं, तो डीजल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे कारखानों से सामान को दुकानों तक पहुंचाने का भाड़ा भी महंगा हो जाता है। यह बढ़ा हुआ माल ढुलाई का खर्च उत्पाद की अंतिम कीमत में ही जोड़ दिया जाता है। ऐसे में रिटेलर्स और होलसेलर्स दोनों का मानना है कि आने वाले त्योहारों या महीनों से पहले बाजार में एक बार फिर मूल्य वृद्धि का दौर देखा जा सकता है।

हर वर्ग के लोगों पर पड़ेगा असर

इस तरह की महंगाई का सबसे सीधा और गहरा असर देश के मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ता है। जब आय सीमित हो और रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं के दाम लगातार बढ़ते जाएं, तो लोगों को अपनी अन्य गैर-जरूरी इच्छाओं या सेविंग्स (बचत) में कटौती करनी पड़ती है। हालांकि, बाजार के जानकारों को उम्मीद है कि अगर आने वाले समय में मानसून बेहतर रहता है और कृषि उत्पादन में सुधार आता है, तो खाने-पीने की चीजों के दाम कुछ हद तक काबू में आ सकते हैं। लेकिन जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और पाम ऑयल जैसी कमोडिटीज की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक आम उपभोक्ताओं को इस तरह के महंगाई के झटकों के लिए मानसिक और वित्तीय रूप से तैयार रहना होगा।

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Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठी author

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिच... और देखें

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