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El Nino का महा-खतरा : 1950 के बाद सबसे भयंकर होने की आशंका, समझें आपकी थाली और जेब पर क्या होगा असर?

WMO के मुताबिक दुनिया सुपर अल नीनो की चपेट में है। खासतौर पर भारत सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। अनुमान यह भी है कि 1950 के बाद इस बार अल नीनो का सबसे भयंकर असर हो सकता है।

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अल नीनो का असर 50 करोड़ भारतीयों पर सीधे होगा
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Jul 14, 2026, 15:29 IST

El Nino Impact on Plate to Pocket : भारत में 12 करोड़ किसान और उनके परिवार यानी कुल करीब 45-50 करोड़ लोग गुजर-बसर के लिए सीधे तौर पर मानसून पर निर्भर हैं। मानसून आज भी भारतीय इकोनॉमी के हालात तय करने वाली घटना है। अच्छा मानसून अच्छी फसल, अच्छी इनकम और ज्यादा खर्च के जरिये इकोनॉमी को रफ्तार देता है। वहीं, जब मानसून कम होता है, तो कम फसलें, कम आय और मांग में कमी भी एक स्नोबॉल इफैक्ट पैदा करती है, जिससे इकोनॉमी की रफ्तार सुस्त होती है। बहरहाल, मानसून के सामने इस बार EL Nino का महा-खतरा है। भारत जैसे देश के लिए यह सिर्फ बारिश से जुड़ी खबर नहीं है। इसका असर कम बारिश और बढ़ती गर्मी के साथ ही कृषि संकट, खाद्य संकट, महंगाई और सुस्त इकोनॉमी के तौर पर दिख सकता है।

क्यों महाखतरा है अल नीनो?

भारतीय इकोनॉमी को इस बार दोहरे झटके का सामना करना पड़ रहा है। एक तरफ जहां पश्चिम एशिया में US Iran War और Hormuz Strait Closure ने पूरी दुनिया में ईंधन संकट खड़ा कर दिया है। वहीं, दूसरी तरफ El Nino का साया है। यूं तो अल नीनो हर कुछ साल में घटित होने वाली एक सामान्य भौगोलिक घटना है। लेकिन, इस बार यह सामान्य नहीं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) और US NOAA यानी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन ने Super El Nino घोषित किया है। 1950 के बाद यह सबसे भयानक अल नीनो साबित हो सकता है।

बारिश के बाद भी असर

IMD, WMO और NOAA जैसे संगठनों के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार अल नीनो का असर सिर्फ मानसून और बारिश तक सीमित नहीं रहेगा। क्योंकि अल नीनो की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। वैज्ञानिक समुद्र के तापमान को नीनो 3.4 इंडेक्स से मापते हैं। 0.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर अल नीनो की शुरुआत मानी जाती है। 1.5 डिग्री से ऊपर इसे मजबूत माना जाता है। 2 डिग्री से ऊपर यह बेहद ताकतवर श्रेणी में पहुंच जाता है।

फिलहाल यह इंडेक्स 1.2 डिग्री के आसपास है, लेकिन वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल के आखिर तक यह 2 डिग्री के करीब पहुंच सकता है।

विकराल हो सकते हैं हालात

विकराल हो सकते हैं हालात

भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा क्या है?

भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक अब तक जब भी अल नीनो आया है, उन वर्षों में करीब 60 फीसदी मामलों में सामान्य से कम या बहुत कम बारिश दर्ज की गई थी। इस साल जून में भी बारिश सामान्य से कम रही है। मौसम विभाग पहले ही सामान्य से कम मानसून की आशंका जता चुका है। एक तरफ भारत को महंगे ईंधन की चुनौती से जूझना पड़ रहा है। वहीं, दूसरी तरफ सामान्य से कम मानसून पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक संकट खड़ा कर रहा है।

कैसे महंगाई बढ़ाएगा अल नीनो संकट?

भारत में आज भी करीब 52% बुआई वाला क्षेत्र सिंचाई नहीं, बल्कि मानसून की बारिश पर निर्भर है। ऐसे में बारिश कम होने का मतलब धान, दाल, मक्का, सोयाबीन और गन्ने जैसी खरीफ फसलों की पैदावार पर सीधा असर पड़ना है। बारिश कम होने से फसल घटती है और बाजार में आपूर्ति कम हो जाती है। इसका सीधा असर खाद्य महंगाई पर पड़ता है। साल 2014 और 2015 इसका बड़ा उदाहरण हैं। उस समय आए "गॉडजिला अल नीनो" के दौरान भारत में मानसून सामान्य से कम रहा था और देश इस सदी के सबसे सूखे वर्षों में शामिल हुआ। इसके बाद कई खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली।

क्यों पड़ेगा जेब पर असर?

अल नीनो की वजह से कम बारिश और खाद्य महंगाई सिर्फ एक पक्ष है। इसके अलावा भी कई वजहें, जो आपके जेब पर असर डाल सकती हैं। मसलन, इस बार सुपर अल नीनो की परिस्थितियां बन रही हैं। इसकी वजह से सिर्फ बारिश ही नहीं घटेगी। बल्कि, गरमी भी बढ़ेगी इसके अलावा ग्राउंड वाटर व जलाशयों पर भी दबाव बढ़ेगा। इसकी वजह से बिजली की खपत बढ़ेगी। यहां से एक ऐसा चक्र शुरू हो सकता है, जो महंगाई को और बढ़ा सकता है। क्योंकि, ज्यादा बिजली के ज्यादा ईंधन की जरूरत होगी। इसकी वजह से क्रूड, कोयला और गैस जैसे आयात बढ़ सकता है। ये सभी चीजें मिलकर आम आदमी के जेब पर भारी पड़ सकती हैं।

अल नीनो की वजह से बारिश कम लेकिन अचानक होने का खतरा

अल नीनो की वजह से बारिश कम लेकिन अचानक होने का खतरा

गर्मी का नया रिकॉर्ड भी बन सकता है

पुणे स्थित भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अल नीनो ऐसे समय आया है, जब दुनिया पहले से रिकॉर्ड गर्मी झेल रही है। ऐसे में 2027 इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शामिल हो सकता है। इससे हीटवेव, जंगल की आग और चरम मौसम की घटनाओं का खतरा और बढ़ जाएगा। इसके साथ ही वैज्ञानिकों का कहना है कि अल नीनो के दौरान कुल बारिश कम हो सकती है, लेकिन जब बारिश होगी, तो वह कम समय में बहुत तेज हो सकती है। यानी कई इलाकों में लंबे सूखे के बाद अचानक बाढ़ जैसी स्थिति भी बन सकती है।

महंगाई और अल नीनो का रिश्ता

IMF, RBI और अन्य संस्थानों के वित्तीय आंकड़ों के आकलन से यह निष्कर्ष निकलता है कि हर मजबूत अल नीनो महंगाई नहीं बढ़ाता, लेकिन जब अल नीनो के साथ मानसून भी बुरी तरह कमजोर पड़ता है, तो महंगाई दोहरे अंकों तक बढ़ सकती है। मसलन, 2009-10 में खाद्य महंगाई दो अंकों तक पहुंच सकती है। IMF की रिसर्च के अनुसार, भारत में मजबूत अल नीनो औसतन 0.56 प्रतिशत अंक अतिरिक्त महंगाई का दबाव पैदा करता है, क्योंकि देश के उपभोक्ता खर्च में खाने-पीने की चीजों की हिस्सेदारी बहुत अधिक है।

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