भारतीय फिल्म अभिनेता Rajpal Yadav का नाम हाल के वर्षों में एक चेक बाउंस मामले को लेकर चर्चा में रहा। यह मामला सिर्फ एक सेलिब्रिटी विवाद नहीं था, बल्कि इसने आम लोगों को यह समझने का अवसर दिया कि चेक बाउंस और ऑटो-डेबिट फेल होने के कानूनी और वित्तीय परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं। आइए जानते हैं चेक बाउंस और ऑटो-डेबिट फेल होने को लेकर क्या नियम बनाए गए हैं।
सबसे पहले चेक बाउंस के नियमों की बात करते हैं-
चेक बाउंस क्या होता है
जब कोई व्यक्ति किसी को भुगतान के लिए चेक देता है और बैंक खाते में पर्याप्त धनराशि न होने के कारण वह चेक अस्वीकृत हो जाता है तो इसे चेक बाउंस कहा जाता है। भारत में यह केवल वित्तीय असुविधा नहीं है, बल्कि Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत अपराध माना जाता है।
मामला कैसे पहुंचता है अदालत तक
सबसे पहले चेक बाउंस होने पर बैंक मेमो जारी करता है। भुगतान पाने वाला व्यक्ति 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेज सकता है। नोटिस मिलने के 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं किया गया तो मामला अदालत में जा सकता है। दोष सिद्ध होने पर दो वर्ष तक की सजा, जुर्माना (चेक राशि का दोगुना तक) या दोनों हो सकते हैं। राजपाल यादव के मामले में बार-बार भुगतान न करने और अदालत के निर्देशों का पालन न करने के कारण उन्हें सजा का सामना करना पड़ा। यह बताता है कि चेक देना एक कानूनी प्रतिबद्धता है, केवल कागजी औपचारिकता नहीं।
अब समझते हैं कि ऑटो-डेबिट/मैंडेट फेल होने को लेकर क्या नियम हैं-
ऑटो-डेबिट/मैंडेट फेल क्या होता है
आजकल EMI, बीमा प्रीमियम, SIP या सब्सक्रिप्शन के लिए लोग ई-मैंडेट या ऑटो-डेबिट का इस्तेमाल करते हैं। इसमें ग्राहक पहले से बैंक को अनुमति देता है कि तय तारीख पर राशि ऑटो डेबिट कर ली जाए। यानी खुद ही काट ली जाए। वहीं, अगर खाते में पर्याप्त बैलेंस नहीं है और ऑटो-डेबिट फेल हो जाता है तो आमतौर पर बैंक रिटर्न चार्ज या पेनल्टी लगाता है। लेट फीस जुड़ सकती है। यहां तक कि बार-बार फेल होने पर क्रेडिट स्कोर प्रभावित हो सकता है। इसके अलावा, बीमा पॉलिसी या सेवा अस्थायी रूप से बंद हो सकती है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ऑटो-डेबिट फेल होना अपने आप में अपराध नहीं है, जबकि चेक बाउंस कानूनी मुकदमे का रूप ले सकता है।
वित्तीय अनुशासन से जुड़े दोनों मामले
बहुत से लोग यह नहीं जानते कि पोस्ट-डेटेड चेक भी कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं। साथ ही, लगातार EMI फेल होने पर बैंक सिविल रिकवरी प्रक्रिया शुरू कर सकता है, जो लंबी और महंगी हो सकती है। दोनों ही मामले वित्तीय अनुशासन से जुड़े हैं। लापरवाही केवल पेनल्टी नहीं, बल्कि कानूनी संकट का कारण भी बन सकती है।
