Dollar vs Rupee : भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव का मानना है कि मौजूदा वैश्विक हालात को देखते हुए आरबीआई को रुपये में थोड़ी और गिरावट आने देनी चाहिए। उनका कहना है कि कमजोर रुपया देश की अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि रुपये की कीमत को किसी एक स्तर पर रोकने की कोशिश करने के बजाय उसे बाजार की परिस्थितियों के अनुसार चलने देना बेहतर होता है। पीटीआई-भाषा को दिए एक विशेष इंटरव्यू में सुब्बाराव ने कहा कि विनिमय दर यानी रुपये की कीमत को संभालने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल केवल अंतिम विकल्प के तौर पर किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर हर बार रुपये को बचाने के लिए ब्याज दरें बढ़ाई जाएंगी, तो इसका असर देश की आर्थिक वृद्धि पर पड़ सकता है।
पश्चिम एशिया संकट से बढ़ा दबाव
इन दिनों पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर भारतीय मुद्रा पर भी दिखाई दे रहा है। इसी दबाव के कारण रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। इस महीने की शुरुआत में रुपया डॉलर के मुकाबले 97.15 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। जानकारों के मुताबिक, पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद से रुपया डॉलर के मुकाबले करीब पांच प्रतिशत तक गिर चुका है। वहीं, इस साल की शुरुआत से अब तक इसमें 6.1 प्रतिशत की गिरावट आई है। पिछले एक साल में रुपये की कीमत 10 प्रतिशत से ज्यादा कमजोर हुई है।
महंगाई और विकास के बीच संतुलन बड़ी चुनौती
सुब्बाराव ने कहा कि आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखना है। अगर ब्याज दरों में कटौती की जाती है, तो इससे महंगाई और रुपये पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, अगर बहुत ज्यादा दरें बढ़ा दी जाएं, तो इसका असर उद्योगों, निवेश और आर्थिक विकास पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि फिलहाल जल्दबाजी में ब्याज दरें बढ़ाने की जरुरत नहीं है। आरबीआई को पहले महंगाई के रुख को ध्यान से देखना चाहिए। अगर महंगाई तेजी से बढ़ती है, तो शुरुआत में नकदी या तरलता प्रबंधन जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। सीधे ब्याज दरें बढ़ाना अंतिम कदम होना चाहिए।
जून में होगी अहम बैठक
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति की अगली बैठक तीन से पांच जून के बीच होने वाली है। इस बैठक में नीतिगत ब्याज दर यानी रेपो रेट पर फैसला लिया जाएगा। फिलहाल रेपो रेट 5.25 प्रतिशत है। केंद्रीय बैंक पिछले साल से अब तक इसमें कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती कर चुका है। अब बाजार और उद्योग जगत की नजर इस बात पर टिकी है कि आरबीआई आने वाले दिनों में महंगाई, रुपये की कमजोरी और आर्थिक विकास के बीच किस तरह संतुलन बनाता है।
