भीषण गर्मी की मार झेल रहे दिल्ली के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद परेशान करने वाली खबर आई है। वैश्विक स्तर पर चल रहे तनाव और कोयले की आसमान छूती कीमतों के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट का सीधा असर अब दिल्ली की जनता की जेब पर पड़ने जा रहा है। दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए राजधानी की निजी बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को उपभोक्ताओं से भारी-भरकम ‘फ्यूल एंड पावर परचेज एडजस्टमेंट सरचार्ज’ (FPPAS) वसूलने की खुली छूट दे दी है। इस नए आदेश के बाद बिजली कंपनियों पर लगी 10 प्रतिशत की पुरानी सीमा पूरी तरह खत्म हो गई है, जिससे बिना सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं के मासिक बिजली बिल में 17 प्रतिशत तक का बड़ा उछाल आना बिल्कुल तय माना जा रहा है।
क्यों बढ़ेगा बिजली बिल?
इस पूरी बढ़ोतरी के पीछे मुख्य वजह बिजली उत्पादन की बढ़ती लागत को बताया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण ऊर्जा संकट गहरा गया है। इसके अलावा, विदेशों से आयात होने वाले कोयले की कीमतों और उसके ट्रांसपोर्टेशन (परिवहन) खर्च में भारी बढ़ोतरी हुई है। बिजली उत्पादन की इसी रिकॉर्ड तोड़ लागत की भरपाई करने के लिए दिल्ली की प्रमुख बिजली कंपनियों बीआरपीएल (BRPL), बीवाईपीएल (BYPL) और टाटा पावर (TPDDL) ने मई के महीने में आयोग (DERC) से गुहार लगाई थी। कंपनियों का कहना था कि अप्रैल में उनकी वास्तविक बिजली खरीद लागत बहुत ज्यादा रही है, इसलिए सरचार्ज वसूलने की 10 प्रतिशत की अधिकतम सीमा में ढील दी जाए, जिसे आयोग ने अब स्वीकार कर लिया है।
नए आदेश के मुताबिक, अलग-अलग बिजली कंपनियों को अलग-अलग सीमा तक सरचार्ज वसूलने की मंजूरी दी गई है। टाटा पावर (TPDDL) के उपभोक्ताओं को अब पूरा 16 प्रतिशत एफपीपीएएस (FPPAS) देना होगा। वहीं बीएसईएस राजधानी (BRPL) के क्षेत्र में रहने वाले लोगों के लिए अप्रैल महीने के आधार पर कुल 17.94 प्रतिशत और बीएसईएस यमुना (BYPL) के उपभोक्ताओं के लिए कुल 17.43 प्रतिशत सरचार्ज वसूलने की हरी झंडी दी गई है। डीईआरसी ने यह भी साफ कर दिया है कि कंपनियों को दी गई यह विशेष छूट तब तक मासिक आधार पर जारी रहेगी, जब तक कि आयोग इस संबंध में कोई अगला नया दिशानिर्देश या आदेश जारी नहीं कर देता।
किन लोगों पर पड़ेगा असर?
हालांकि, इस कड़े फैसले के बीच दिल्ली के एक बड़े वर्ग के लिए राहत की बात यह है कि इसका असर सभी उपभोक्ताओं पर एक समान नहीं पड़ेगा। इस बढ़े हुए सरचार्ज का सीधा झटका सिर्फ उन लोगों को लगेगा जो दिल्ली सरकार की बिजली सब्सिडी योजना के दायरे से बाहर हैं। जो उपभोक्ता दिल्ली सरकार की तरफ से पूर्ण (100%) या 50 प्रतिशत की बिजली सब्सिडी पा रहे हैं, उन्हें इस बढ़ोतरी से पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। इसका मतलब यह है कि मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के वे लोग, जो पूरा बिजली बिल चुकाते हैं, उनका मासिक बजट अब पूरी तरह हिलने वाला है।
चिलचिलाती धूप और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी के इस मौसम में दिल्ली में बिजली की मांग पहले ही अपने चरम पर है। ऐसे समय में बिजली बिलों में 16 से 18 प्रतिशत तक की यह वृद्धि उपभोक्ताओं के लिए 'करेला और नीम चढ़ा' जैसी साबित होगी। एयर कंडीशनर और कूलर के भारी इस्तेमाल के बीच बढ़े हुए टैरिफ का असर अगले महीने के बिलों में साफ दिखाई देगा। अब देखना यह होगा कि इस फैसले के बाद जनता की तरफ से क्या प्रतिक्रिया आती है और क्या सरकार गैर-सब्सिडी वाले उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए कोई बीच का रास्ता निकालती है या नहीं।
CTI ने दिल्ली सीएम रेखा गुप्ता को लिखा पत्र
दिल्ली विद्युत विनियामक आयोग (DERC) द्वारा पावर परचेजिंग एडजस्टमेंट चार्ज (PPAC) में बढ़ोतरी के फैसले के बाद दिल्ली की जनता और व्यापारी वर्ग में भारी चिंता देखी जा रही है। इस नए आदेश के तहत दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में बिजली सप्लाई करने वाली कंपनियों को दरों में भारी बढ़ोतरी की मंजूरी मिल गई है। वेस्ट, सेंट्रल और दक्षिणी दिल्ली में बिजली देने वाली BRPL के बिलों में 17.94 प्रतिशत, ट्रांस यमुना क्षेत्र की BYPL में 17.43 प्रतिशत और उत्तरी व बाहरी दिल्ली में टाटा पावर (TPDDL) के उपभोक्ताओं पर 16 प्रतिशत अतिरिक्त PPAC चार्ज लगाया गया है। बिजली की ये नई दरें 10 जून से ही लागू हो चुकी हैं, जिसका सीधा और बड़ा असर जुलाई महीने में आने वाले बिजली के बिलों में साफ दिखाई देगा। इस फैसले के बाद दिल्ली के व्यापारियों और उद्यमियों के शीर्ष संगठन 'चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री' (CTI) ने गहरी चिंता व्यक्त की है। CTI के चेयरमैन बृजेश गोयल ने इस गंभीर मुद्दे पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को एक आधिकारिक पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है।
बृजेश गोयल ने पत्र के माध्यम से सरकार का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित किया है कि दिल्ली में कमर्शियल और इंडस्ट्रियल बिजली की दरें पहले से ही पड़ोसी राज्यों हरियाणा और उत्तर प्रदेश की तुलना में बहुत ज्यादा हैं। अब इस नई बढ़ोतरी के बाद दिल्ली के उद्योगों का पड़ोसी राज्यों में पलायन (Shift) होने का खतरा काफी बढ़ गया है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में न केवल बिजली की दरें सस्ती हैं, बल्कि वहां न्यूनतम मजदूरी भी दिल्ली के मुकाबले कम है, जिससे वहां उत्पादन लागत काफी कम बैठती है। CTI चेयरमैन ने स्पष्ट किया कि दिल्ली में आवासीय (Residential) उपभोक्ताओं को तो बिजली बिलों में सब्सिडी का लाभ मिल जाता है, लेकिन कमर्शियल और इंडस्ट्रियल सेक्टर को किसी भी प्रकार की सब्सिडी नहीं मिलती। ऐसे में इस नए बोझ के कारण व्यापारियों और फैक्ट्री मालिकों की कमर टूट जाएगी, जिससे अंततः बाजार में वस्तुओं के दाम बढ़ना बिल्कुल तय है।
कमर्शियल और इंडस्ट्रियल कीमत
बिजली दरों की तुलनात्मक स्थिति को देखें तो कमर्शियल और इंडस्ट्रियल दोनों ही मोर्चों पर दिल्ली काफी महंगी साबित हो रही है। कमर्शियल रेट्स के मामले में दिल्ली में 3 kVA से ऊपर के कनेक्शन के लिए प्रति यूनिट दर 8.50 रुपये है, जबकि हरियाणा में 11 kV कनेक्शन पर यह दर मात्र 6.95 रुपये है। इस प्रकार दिल्ली कमर्शियल बिजली के मामले में हरियाणा से करीब 20 से 25 प्रतिशत तक अधिक महंगी है। उत्तर प्रदेश से तुलना करें तो वहां 11kV पर यूनिट रेट 8.12 रुपये है। हालांकि यूपी का फिक्स्ड चार्ज थोड़ा ज्यादा है, लेकिन प्रति यूनिट के मामले में दिल्ली वहां से भी 5 से 8 प्रतिशत महंगी बैठती है। यदि बड़े कारखानों और इंडस्ट्रीज (HT रेट) की बात की जाए, तो दिल्ली में यह दर 7.75 रुपये प्रति kVAh है, जबकि हरियाणा में 11 kV के लिए यह सिर्फ 6.95 रुपये है और वहां MSME उद्योगों को 2 रुपये प्रति यूनिट की विशेष सब्सिडी भी दी जाती है। इस वजह से औद्योगिक बिजली के मामले में भी दिल्ली हरियाणा से 7 से 10 प्रतिशत महंगी है। वहीं उत्तर प्रदेश ने पिछले 6 सालों से अपना टैरिफ नहीं बढ़ाया है, जिससे वहां की दरें भी दिल्ली के मुकाबले काफी अनुकूल हैं।
इस भारी अंतर का सीधा असर दुकानदारों और फैक्ट्री मालिकों के मासिक बिजली बिलों पर दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के करोल बाग की एक दुकान का मासिक बिजली बिल गुड़गांव (हरियाणा) की दुकान की तुलना में लगभग 9,500 रुपये और नोएडा (यूपी) की दुकान से करीब 3,500 रुपये ज्यादा आता है। इसी तरह, दिल्ली के बवाना औद्योगिक क्षेत्र की एक फैक्ट्री का मासिक बिल हरियाणा के मानेसर की फैक्ट्री से हर महीने करीब 1.2 लाख रुपये अधिक बैठता है। कुल मिलाकर बिजली खर्च के मामले में हरियाणा सबसे सस्ता है, उसके बाद उत्तर प्रदेश का नंबर आता है और दिल्ली इस सूची में सबसे महंगी साबित हो रही है। यही कारण है कि भारी भरकम बिजली बिलों और उच्च संचालन लागत से बचने के लिए अब दिल्ली के कई वेयरहाउस और फैक्ट्रियां तेजी से हरियाणा और केएमपी (KMP) एक्सप्रेसवे के आसपास के इलाकों में शिफ्ट हो रहे हैं, जो दिल्ली की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है।
