West Asia में भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने के साथ वैश्विक तेल बाजार में तेज उछाल देखने को मिला है। ब्रेंट क्रूड करीब 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जो जुलाई 2022 के बाद का उच्च स्तर है। कच्चे तेल की कीमतों में इस तेजी का सीधा असर भारत की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर पड़ सकता है, क्योंकि इन कंपनियों के लिए कच्चा तेल प्रमुख इनपुट लागत है। कीमतें ऊंची रहने पर इनके मार्केटिंग मार्जिन दबाव में आ सकते हैं।
Citi ने घटाई रेटिंग
ब्रोकरेज Citi ने इस परिदृश्य को देखते हुए ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को लेकर सतर्क रुख अपनाया है। ब्रोकरेज ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन की रेटिंग घटाकर Neutral कर दी है, जबकि हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन को Sell रेटिंग दी गई है। Citi का मानना है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो इन कंपनियों की लाभप्रदता पर असर पड़ सकता है।
मुनाफे के अनुमान में कटौती
ब्रोकरेज ने तीनों कंपनियों के मुनाफे के अनुमान में भी कटौती की है। Citi के अनुसार इंडियन ऑयल के प्रॉफिट आफ्टर टैक्स अनुमान में करीब 19 प्रतिशत की कमी की गई है, जबकि भारत पेट्रोलियम के अनुमान में 15 प्रतिशत और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के अनुमान में करीब 46 प्रतिशत की बड़ी कटौती की गई है। इससे संकेत मिलता है कि सेक्टर के मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
टारगेट प्राइस में भी की गई कटौती
कमाई के अनुमान और वैल्यूएशन में बदलाव के बाद Citi ने तीनों कंपनियों के टारगेट प्राइस भी घटा दिए हैं। इंडियन ऑयल का टारगेट प्राइस 190 रुपये से घटाकर 175 रुपये कर दिया गया है। भारत पेट्रोलियम का टारगेट 425 रुपये से घटाकर 365 रुपये किया गया है।
वहीं हिंदुस्तान पेट्रोलियम के टारगेट में सबसे बड़ी कटौती करते हुए इसे 540 रुपये से घटाकर 340 रुपये कर दिया गया है। ब्रोकरेज ने इन कंपनियों के वैल्यूएशन मल्टीपल भी कम किए हैं। इंडियन ऑयल के लिए पीई मल्टीपल 8 गुना से घटाकर 7 गुना किया गया है, जबकि भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम के लिए इसे 8.5 गुना से घटाकर 7.5 गुना कर दिया गया है।
तेल की कीमतों में उछाल के पीछे क्या वजह
तेल की कीमतों में यह तेजी Middle East में बढ़ते संघर्ष और सप्लाई को लेकर बढ़ती आशंकाओं से जुड़ी है। खासकर Strait of Hormuz को लेकर बाजार में चिंता बढ़ी है, क्योंकि यह मार्ग दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल व्यापार के लिए अहम माना जाता है। यदि इस मार्ग में बाधा आती है तो वैश्विक सप्लाई पर बड़ा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ प्रमुख खाड़ी के तेल उत्पादकों ने उत्पादन में कटौती भी शुरू कर दी है। इराक और कुवैत ने सप्लाई घटाई है, जबकि कतर से एलएनजी सप्लाई में भी कमी देखी गई है। ऐसे में बाजार को लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहने की आशंका सताने लगी है।
निवेशकों के लिए क्या संकेत
ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों का असर पूरे ऊर्जा सेक्टर पर अलग-अलग तरीके से पड़ता है। जहां तेल उत्पादन करने वाली कंपनियों को ऊंची कीमतों का फायदा मिल सकता है, वहीं रिफाइनिंग और मार्केटिंग कंपनियों पर लागत का दबाव बढ़ जाता है। ऐसे में निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे सेक्टर में निवेश से पहले कच्चे तेल के रुझान और भू-राजनीतिक स्थिति पर नजर रखें। विश्लेषकों का मानना है कि Middle East संकट के चलते आने वाले समय में तेल बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर टिकती हैं तो ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के शेयरों में दबाव देखने को मिल सकता है।
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