कभी दुनिया के आधे हिस्से पर राज करने वाली और भारत को अपना गुलाम बनाने वाली 'ईस्ट इंडिया कंपनी' एक बार फिर इतिहास के पन्नों में अपनी कंगाली की वजह से चर्चा में है। करीब 400 साल पुरानी यह कंपनी, जिसने कभी अपनी निजी सेना के दम पर देशों को जीता था, आज ₹12 करोड़ का मामूली कर्ज न चुका पाने के कारण दिवालिया (Bankrupt) हो गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस समय इस कंपनी की कमान एक भारतीय मूल के व्यवसायी के हाथ में है। आइए जानते हैं कैसे एक साम्राज्य चलाने वाली कंपनी आज खुद को बचाने में नाकाम रही।
₹12 करोड़ का कर्ज
ईस्ट इंडिया कंपनी (EIC), जो कभी मसालों, चाय और कपड़ों के व्यापार का पर्याय थी, आज अपनी वित्तीय देनदारियों को पूरा करने में असमर्थ साबित हुई है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कंपनी पर लगभग ₹12 करोड़ का कर्ज था, जिसे वह समय पर नहीं चुका पाई। इसके परिणामस्वरूप, कंपनी को 'वॉलंटरी लिक्विडेशन' (Voluntary Liquidation) यानी अपनी मर्जी से दिवालिया घोषित करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है। यह कंपनी के इतिहास में दूसरी बार है जब वह इस तरह के वित्तीय संकट में फंसी है। 1874 में ब्रिटिश सरकार ने इसे पहली बार भंग किया था, लेकिन बाद में इसे एक लग्जरी ब्रांड के रूप में पुनर्जीवित किया गया था।
संजीव मेहता के हाथ में कमान
ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास तब एक दिलचस्प मोड़ पर आया जब साल 2010 में भारतीय मूल के बिजनेसमैन संजीव मेहता ने इसे खरीद लिया। उन्होंने इस ऐतिहासिक नाम को एक 'लग्जरी लाइफस्टाइल ब्रांड' के रूप में पेश किया, जो चाय, कॉफी, चॉकलेट और कीमती यादें (Memorabilia) बेचती थी। संजीव मेहता ने उस समय गर्व से कहा था कि जिस कंपनी ने कभी भारत पर राज किया, आज एक भारतीय उसका मालिक है। हालांकि, बाजार की बदलती परिस्थितियों और कर्ज के बोझ ने कंपनी के नए स्वरूप को भी संकट में डाल दिया है।
क्यों डूबी 'दुनिया की सबसे शक्तिशाली' कंपनी?
ईस्ट इंडिया कंपनी के दोबारा दिवालिया होने के पीछे कई कारण माने जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि लग्जरी रिटेल सेक्टर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और ग्लोबल इकोनॉमी में उतार-चढ़ाव ने कंपनी के मुनाफे पर असर डाला। इसके अलावा, कंपनी अपनी विस्तार योजनाओं के लिए लिए गए कर्ज को मैनेज करने में विफल रही। ₹12 करोड़ की राशि भले ही इस ऐतिहासिक नाम के सामने छोटी लगे, लेकिन कानूनी तौर पर भुगतान न कर पाने की स्थिति में लिक्विडेशन ही एकमात्र रास्ता बचा था।
1600 में महारानी एलिजाबेथ प्रथम के चार्टर से शुरू हुई इस कंपनी ने 250 से अधिक वर्षों तक भारत के संसाधनों का दोहन किया। 1857 के विद्रोह के बाद इसकी शक्तियां ब्रिटिश क्राउन को सौंप दी गई थीं। वर्तमान में इस कंपनी का दिवालिया होना केवल एक व्यापारिक घटना नहीं है, बल्कि एक युग के अंत का प्रतीक भी है। यह दिखाता है कि समय का चक्र कैसे घूमता है—जो कंपनी कभी देशों की किस्मत लिखती थी, आज वह अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष कर रही है।
