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FAO ने दी चेतावनी: नया अल नीनो चरण शुरू, भारत की फसलों पर बढ़ा खतरा, चावल-मक्का उत्पादन होगा प्रभावित

El Nino: एफएओ ने अल नीनो से मानसून कमजोर होने की चेतावनी दी है, जिससे भारत में चावल-मक्का उत्पादन घट सकता है और खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।

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अल नीनो ने बढ़ाई चिंता

Photo : iStock

El Nino : संयुक्त राष्ट्र की संस्था खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) ने चेतावनी (FAO warning) दी है कि नया अल नीनो चरण आधिकारिक रूप से शुरू हो गया है। अल नीनो एक ऐसी जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के तापमान में बदलाव होता है और इसका असर दुनिया भर के मौसम पर पड़ता है। इस बार चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि यह भारत के ग्रीष्मकालीन मानसून को कमजोर कर सकता है। मानसून कमजोर होने का सीधा असर खेती पर पड़ता है, खासकर उन फसलों पर जो बारिश पर निर्भर होती हैं। भारत में खरीफ सीजन के दौरान चावल और मक्का जैसी फसलें इसी मानसून पर आधारित होती हैं।

भारत की खेती और मानसून पर असर का खतरा

खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) का कहना है कि अगर मानसून कमजोर पड़ता है तो भारत के कई हिस्सों में सूखे जैसी स्थिति बन सकती है। इससे किसानों को भारी नुकसान हो सकता है, क्योंकि पानी की कमी से फसलें ठीक से नहीं उग पातीं। खासतौर पर चावल और मक्का जैसी फसलें, जिन्हें बड़ी मात्रा में पानी की जरुरत होती है, सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकती हैं। संस्था ने बताया कि इससे न सिर्फ उत्पादन घट सकता है, बल्कि किसानों की आय और ग्रामीण आजीविका पर भी असर पड़ेगा।

पूरे एशिया में सूखे का खतरा

एफएओ ने यह भी कहा है कि यह खतरा सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भी सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। जब बारिश कम होती है, तो कृषि उत्पादन गिर जाता है और इसका असर सीधे खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर पड़ता है। इससे कई देशों में खाद्य सुरक्षा पर भी दबाव बढ़ सकता है।

वैश्विक बाजार और खाद्य सुरक्षा पर असर

संस्था ने चेतावनी दी है कि अल नीनो का प्रभाव सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वैश्विक खाद्य बाजार को भी प्रभावित कर सकता है। अगर उत्पादन घटता है तो चावल और मक्का जैसी जरूरी फसलों की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर उन देशों पर भी पड़ेगा जो आयात पर निर्भर हैं। यानी जिन देशों में भोजन का बड़ा हिस्सा बाहर से आता है, वहां महंगाई और संकट बढ़ सकता है।

पिछली घटनाओं से मिले संकेत

एफएओ ने 2015-16 के अल नीनो का उदाहरण दिया है। उस समय भारत में मक्का उत्पादन करीब 4 प्रतिशत और चावल उत्पादन करीब 1 प्रतिशत घट गया था। पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में उस दौरान करीब 1.5 करोड़ टन चावल का नुकसान हुआ था। इसका सीधा असर बाजार पर पड़ा और कई देशों में कीमतें बढ़ गई थीं।

एक्सपर्ट्स की चेतावनी

एफएओ के प्राकृतिक संसाधन अधिकारी जॉर्ज अलवर-बेलट्रान ने कहा कि जब बारिश कम होती है, तो सबसे पहले खेती प्रभावित होती है। उन्होंने समझाया कि ऐसे हालात में किसान पहले अपनी फसल खोता है, फिर पशुधन और अंत में उसकी पूरी आजीविका खतरे में पड़ जाती है। उनका कहना है कि यह चक्र किसानों के लिए बहुत गंभीर हो सकता है और कई बार नुकसान लंबे समय तक असर छोड़ता है।

मौसम एजेंसियों की अलग-अलग भविष्यवाणी

हालांकि विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने हाल ही में संकेत दिया है कि इस बार मानसून सामान्य से ज्यादा मजबूत भी हो सकता है, जिससे स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। एफएओ का विश्लेषण पिछले 41 वर्षों के उपग्रह चित्रों पर आधारित है, जिससे यह अनुमान लगाया गया है कि अल नीनो का असर कई क्षेत्रों में गंभीर हो सकता है।

कुल मिलाकर, अल नीनो की शुरुआत ने एक बार फिर मौसम और खेती को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत जैसे देश, जहां बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है, वहां मानसून का कमजोर होना खाद्य उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बड़ा जोखिम बन सकता है।

Ramanuj Singh
रामानुज सिंहauthor

रामानुज सिंह पत्रकारिता में दो दशकों का व्यापक और समृद्ध अनुभव रखते हैं। उन्होंने टीवी और डिजिटल—दोनों ही प्लेटफॉर्म्स पर काम करते हुए बिजनेस, पर्सनल फाइनेंस, शेयर बाजार, इनकम टैक्स, बैंकिंग, बुलियन और कमोडिटी मार्केट जैसे विषयों पर गहरी विशेषज्ञता विकसित की है। जर्नलिज्म में एमए की डिग्री और वर्षों के अनुभव से विकसित विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ, रामानुज जटिल वित्तीय विषयों को सरल, विश्वसनीय और प्रभावी तरीके से पाठकों तक पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। अब तक वे 22,000 से अधिक स्टोरीज लिख चुके हैं।

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