El Nino Alert : केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन 2026 के दौरान अल नीनो के प्रभाव (Indian monsoon) को लेकर चिंता जताई है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि देश के 12 राज्यों के 326 जिलों में अल नीनो का गंभीर असर पड़ सकता है। इसे देखते हुए राज्यों और जिला प्रशासन को पहले से तैयारी करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि किसानों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खरीफ सीजन की तैयारियों की समीक्षा बैठक की। बैठक में मौसम की स्थिति, फसलों की बुवाई, उर्वरकों की उपलब्धता और किसानों के लिए वैकल्पिक योजनाओं पर चर्चा की गई।
इन 12 राज्यों में सबसे ज्यादा असर की आशंका
कृषि मंत्रालय के अनुसार उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, ओडिशा, गुजरात, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और महाराष्ट्र ऐसे राज्य हैं, जहां अल नीनो का प्रभाव सबसे अधिक पड़ सकता है। सरकार ने इन राज्यों के संवेदनशील जिलों की पहचान कर ली है। अधिकारियों के मुताबिक कुल 326 जिलों को जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल किया गया है। इन जिलों के लिए अलग-अलग वैकल्पिक कृषि योजनाएं तैयार की जा रही हैं।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के सतही पानी का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इसका असर दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ता है। भारत में अल नीनो के कारण मानसून कमजोर हो सकता है और सामान्य से कम बारिश होने की संभावना बढ़ जाती है। इससे खेती और फसल उत्पादन पर असर पड़ सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के अनुसार भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में फिलहाल अल नीनो की स्थिति बनी हुई है और दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान इसके और मजबूत होने की आशंका है।
सामान्य से कम बारिश का अनुमान
मौसम विभाग ने इस साल लगभग 90 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान जताया है। यह सामान्य वर्षा से कम माना जाता है। कम बारिश की स्थिति में कई क्षेत्रों में सूखे जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं, जिससे किसानों की चिंता बढ़ सकती है। इसी वजह से सरकार पहले से तैयारी कर रही है, ताकि बारिश कम होने पर भी खेती प्रभावित न हो।
जिलों के लिए अलग रणनीति बनाने के निर्देश
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि जिन जिलों में अल नीनो का ज्यादा असर पड़ सकता है, वहां जिलाधिकारी, कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) और अन्य संबंधित एजेंसियां मिलकर काम करें। उन्होंने कहा कि हर जिले के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग और व्यावहारिक योजना बनाई जानी चाहिए। इसमें जल संरक्षण, मिट्टी में नमी बनाए रखने, मिश्रित खेती और वैकल्पिक फसलों को बढ़ावा देने पर विशेष ध्यान दिया जाए। सरकार चाहती है कि किसी भी मौसम संबंधी संकट की स्थिति में किसानों को तुरंत सलाह, विकल्प और सहायता उपलब्ध कराई जा सके।
कपास और दलहन की खेती बढ़ाने पर जोर
बैठक में कपास और दलहन फसलों के रकबे को बढ़ाने पर भी विशेष चर्चा हुई। कृषि मंत्री ने कहा कि कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए राज्यों को अतिरिक्त प्रयास करने होंगे। इसके अलावा दलहन आत्मनिर्भरता मिशन के तहत अरहर, उड़द और मूंग जैसी फसलों की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकार बेहतर बीज, तकनीकी मार्गदर्शन और फसल चक्र अपनाने के जरिए दलहन उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।
किसानों तक पहुंचे वैज्ञानिक सलाह
शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार का उद्देश्य किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी और भरोसेमंद सलाह पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि डर फैलाने वाली सूचनाओं के बजाय समाधान आधारित संदेश किसानों तक पहुंचने चाहिए। उन्होंने कृषि विश्वविद्यालयों, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई। उनका कहना था कि वैज्ञानिक जानकारी तभी उपयोगी है, जब वह सही समय पर किसानों तक पहुंचे।
उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता का भरोसा
समीक्षा बैठक में उर्वरकों की उपलब्धता, बाजार कीमतों, जलाशयों के जल स्तर और पानी के भंडारण की स्थिति का भी आकलन किया गया। कृषि मंत्री ने कहा कि देश में फिलहाल उर्वरकों की पर्याप्त उपलब्धता है। मानसून की प्रगति के अनुसार राज्यों और जिलों तक इसकी आपूर्ति को और बेहतर बनाया जाएगा। जिन क्षेत्रों में उर्वरकों की कमी की आशंका है, वहां पहले से भंडारण सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं।
लगातार निगरानी रखेगी सरकार
कृषि मंत्री ने कहा कि खरीफ सीजन 2026 को सफल बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें लगातार संवाद और समीक्षा करती रहेंगी। साथ ही जमीनी स्तर से सुझाव लेकर जरूरत के अनुसार योजनाओं में बदलाव भी किया जाएगा। सरकार का मानना है कि समय रहते तैयारी और बेहतर समन्वय के जरिए अल नीनो के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है और किसानों के हितों की रक्षा की जा सकती है।
