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ईरान के साथ ट्रंप की डील में नेतन्याहू क्यों बने सबसे बड़े लूजर? इजरायल के पूर्व पीएम बोले- घमंडी और नासमझ

Benjamin Netanyahu: ईरान के खिलाफ जंग ने डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू को एक-दूसरे के करीब ला दिया था। हालांकि, तेहरान के साथ अमेरिका की शांति डील इस गठबंधन को कमजोर कर सकती है।

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ईरान के साथ ट्रंप की डील में नेतन्याहू क्यों बने सबसे बड़े लूजर? इजरायल के पूर्व पीएम बोले- घमंडी और नासमझ (AP)

US Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच सोमवार (15 जून) को युद्ध खत्म करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर करने की सहमति बनने के बाद, इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने रिश्तों पर कहा, 'कई बार हमारी राय एक जैसी होती है, और कुछ मामलों में हमारी राय अलग भी होती है। मैं इजरायल की सुरक्षा से जुड़े हितों के लिए जिम्मेदार हूं। मैं उनके लिए खड़ा रहता हूं।'

इजरायली प्रधानमंत्री ने लेबनान से तुरंत सेना हटाने की बात को भी खारिज कर दिया और कहा कि इजरायल की सेनाएं वहां 'जब तक जरूरी होगा' तब तक बनी रहेंगी। सोमवार को एक टेलीविजन प्रेस कॉन्फ्रेंस में इजरायली प्रधानमंत्री ने कहा, 'हमने इजरायल राज्य के चारों ओर मजबूत सुरक्षा क्षेत्र बनाए हैं। हमने ऐसा गाजा, लेबनान और सीरिया में किया है।' उन्होंने आगे कहा, 'और मैं यह साफ करना चाहता हूं: हम अपने देश की सुरक्षा के लिए इन सुरक्षा क्षेत्रों में बने रहेंगे।'

नेतन्याहू की बातें उस गुस्से को दिखाती हैं जो कई इजरायली लोगों ने अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने के समझौते के बाद जाहिर किया है। कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि इजरायल की सुरक्षा अमेरिका पर निर्भर नहीं है और इजरायल कोई कमजोर देश नहीं है।'

लेकिन इजरायल, ईरान के साथ ट्रंप के शांति समझौते से सहमत क्यों नहीं है? आइए, इस पूरी बात को विस्तार से समझते हैं।

ईरान के साथ ट्रंप का 'शानदार समझौता'

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे एक शानदार समझौता बताया है जिससे पूरे इलाके में शांति और सुरक्षा आएगी। असल में, अमेरिका-ईरान समझौता युद्धरत देशों के बीच अगले 60 दिनों तक सभी सैन्य गतिविधियों को रोककर युद्धविराम को आगे बढ़ाता है। साथ ही, शुक्रवार को जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मिलेंगे, तो होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल दिया जाएगा।

यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर बातचीत की भी इजाजत देता है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के अनुसार, इस समझौते से अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की ईरान वापसी भी आसान हो जाएगी।

वेंस ने NBC से कहा, 'हां, बिल्कुल,' जब उनसे पूछा गया कि क्या निरीक्षकों को लौटने की इजाजत दी जाएगी। वेंस ने कहा, 'असल में यह समझौते के मुख्य हिस्सों में से एक है।' उन्होंने आगे कहा कि मेमोरेंडम में साफ तौर पर कहा गया है कि इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी और अमेरिका, ईरान को अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (highly enriched uranium) के भंडार को खत्म करने में मदद करेंगे। 'MoU में यह बात बहुत स्पष्ट रूप से बताई गई है।'

इस समझौते में हिज्बुल्लाह से लड़ने की इजरायल की क्षमता पर नई पाबंदियां भी शामिल हैं, क्योंकि ईरान दक्षिणी लेबनान से इजरायली सेना की पूरी तरह वापसी की मांग कर रहा है। हालांकि, अमेरिका के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पत्रकारों को बताया कि सेना की वापसी समझौते की कोई शर्त नहीं थी।

अधिकारी ने कहा, 'अगर ईरान हिज्बुल्लाह को नियंत्रित नहीं कर पाता है, और अगर वे इजरायली ठिकानों या इजरायली कस्बों पर हमला करते हैं, तो इजरायल को अपना बचाव करने और जवाबी कार्रवाई करने का अधिकार होगा।'

लेकिन यहीं सबसे बड़ी उलझन है। ईरान अपनी इस मांग पर अडिग है कि लेबनान भी इस समझौते के दायरे में आए और इजरायल न केवल हिज्बुल्लाह के खिलाफ हमले रोके, बल्कि इजरायली रक्षा बल (IDF) दक्षिणी लेबनान के उन सभी इलाकों से भी हट जाएं जिन पर अभी उनका कब्जा है।

असल में, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को कहा कि लेबनान में युद्ध खत्म करना सीजफायर समझौते का एक अहम हिस्सा है।

ईरान के साथ US के समझौते पर इजरायल नाराज

युद्ध खत्म करने की बातचीत में ज्यादातर किनारे रखे गए इजरायल ने ईरान के साथ ट्रंप के समझौते पर गुस्से में प्रतिक्रिया दी और इसे यहूदी देश के लिए तबाही बताया। कई लोगों ने अपना गुस्सा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भी निकाला।

यह खबर आने के कुछ ही समय बाद कि US और ईरान शुक्रवार को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में औपचारिक रूप से एक समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे, इजराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-गवीर ने घोषणा की कि वाशिंगटन द्वारा किया गया कोई भी समझौता इजरायल पर लागू नहीं होगा। बेन-गवीर ने X पर एक पोस्ट में कहा, 'इजरायल संयुक्त राज्य अमेरिका के अधीन नहीं है' और देश को 'एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र' बताया, जिसकी एकमात्र जिम्मेदारी अपने नागरिकों और सुरक्षा हितों के प्रति है।

उन्होंने आगे कहा, 'इजरायल कोई 'बनाना रिपब्लिक' (कमजोर या अस्थिर देश) नहीं है। मेरा रुख साफ है: हम इस समझौते में भागीदार नहीं हैं जो हमारी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करता है, और यह हम पर किसी भी तरह से बाध्यकारी नहीं है। हमें हिज्बुल्लाह को खत्म करने से कम किसी भी चीज पर समझौता नहीं करना चाहिए, हमें उस किसी भी इलाके से पीछे नहीं हटना चाहिए जिस पर हमारे लड़ाकों ने कब्जा किया है और जिसे आतंकी बुनियादी ढांचे से मुक्त कराया है, हमें ऐसी स्थिति में वापस नहीं लौटना चाहिए जहां हजारों आतंकवादी उत्तरी बस्तियों की सीमाओं पर बैठे हों, और निश्चित रूप से हमें इजरायल पर होने वाले हमलों के सामने एक पल के लिए भी चुप नहीं रहना चाहिए।'

वित्त मंत्री बेजालेल स्मोट्रिच ने भी इस समझौते की आलोचना की। इसे 'इजरायल और पूरी आजाद दुनिया के लिए बुरा' बताते हुए उन्होंने कहा कि इजरायल को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने की कोशिशें जारी रखनी होंगी और ईरानी सरकार को कमजोर करने और अंततः गिराने के लिए एक लंबे समय तक चलने वाले अभियान को आगे बढ़ाना होगा। उन्होंने X पर एक पोस्ट में कहा, 'लेबनान में हमारी सब चीजें होंगी। यह हमारी लड़ाई है, हमारे लड़ाके हैं और हमारे उत्तरी इलाकों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा का मामला है। मैं यह सुनिश्चित करने के लिए काम करता रहूंगा कि हम अपनी बात पर मजबूती से डटे रहें और IDF को हिज्बुल्लाह को पीछे धकेलने के लिए पूरी आजादी दें।'

कई लोगों ने नेतन्याहू की आलोचना भी की कि उन्होंने ट्रंप से युद्ध के नतीजों के बारे में बहुत ज्यादा वादे किए थे। जैसा कि इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक ने कहा, 'इजरायल, नेतन्याहू के घमंड और नासमझी की कीमत चुका रहा है और उन चालों की भी कीमत चुका रहा है जो उन्होंने ट्रंप के साथ खेलने की कोशिश की थी। ईरान मजबूत हुआ है; इजरायल कमजोर हुआ है। यह नेतन्याहू की रणनीतिक जिम्मेदारी है। वह इसमें नाकाम रहे।'

आने वाले चुनावों में नेतन्याहू के विरोधी यायर लापिड ने भी कहा कि यह डील इजरायल की विदेश और सुरक्षा नीति की सबसे चौंकाने वाली नाकामियों में से एक साबित हो रही है... और इसका पूरा श्रेय नेतन्याहू को जाता है। उन्होंने लिखा, 'इसे ठीक किया जा सकता है, इसे ठीक किया जाना चाहिए। नेतन्याहू अब इसे ठीक नहीं कर सकते; हम इसे करेंगे।'

डेमोक्रेट्स पार्टी के प्रमुख यायर गोलन ने भी ईरान के साथ हुई अमेरिकी डील को इजरायल के लिए बहुत बुरा बताया। उन्होंने कहा, 'हमारे पायलटों की हिम्मत और हमारे लड़ाकों के खून से हासिल की गई जबरदस्त सैन्य कामयाबियों को मिटा दिया गया, जबकि नेतन्याहू किनारे खड़े रहे- कमजोर, बीमार, अकेले और बिना किसी असर के।' उन्होंने आगे कहा, 'नेतन्याहू हमास के लिए अच्छे हैं। नेतन्याहू ईरान के लिए अच्छे हैं। नेतन्याहू हिज्बुल्लाह के लिए अच्छे हैं। नेतन्याहू इजरायल के लिए अच्छे नहीं हैं।'

नेतन्याहू का दावा- युद्ध के मुख्य लक्ष्य हासिल कर लिए गए

अंदरूनी विरोध का सामना करते हुए, नेतन्याहू ने सोमवार शाम को समझौते पर अपनी चुप्पी तोड़ी और जोर देकर कहा कि लड़ाई कामयाब रही थी। इजरायल के नेता ने ट्रंप के साथ मतभेद की बात को सही नहीं बताया और कहा कि इजरायल और उसके अमेरिकी दोस्तों ने इजरायल को परमाणु तबाही से बचाया है। उन्होंने फिर दोहराया कि उनके रहते ईरान को कभी भी परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिया जाएगा।

नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल ने एक बार फिर आने वाले कई सालों के लिए, इजरायल की आबादी के खत्म होने का जो खतरा हमारे सिर पर मंडरा रहा था, उसे दूर कर दिया है।'

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, 'हमने यही किया है, हमने इजरायल देश को तबाही से बचाया है।' जब एक रिपोर्टर ने नेतन्याहू से ईरान की सरकार से जुड़े खतरे को खत्म करने के उनके मकसद के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा, 'हमने कहा था कि हम अपने ऊपर मंडरा रहे अस्तित्व के खतरे को खत्म करना चाहते हैं: सबसे पहले, परमाणु खतरा और हमने ऐसा किया। हमने कहा था कि हम [बैलिस्टिक मिसाइल] का खतरा खत्म करना चाहते हैं और हमने ऐसा किया। और हमने कहा था कि हम ऐसे हालात बनाना चाहते हैं जिनसे ईरानी लोग, अगर चाहें, तो खुद इस आतंकी सरकार को हटा सकें।'

उन्होंने आगे कहा, 'ईरान बहुत मुश्किल आर्थिक हालात से गुजर रहा है। हमने वहां हर मुमकिन इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला किया। नुकसान बहुत ज्यादा है। इस सरकार के अंदर भी दरारें पड़ गई हैं।' उन्होंने कहा, 'क्या मैं आपको बता सकता हूं कि यह सरकार कब गिरेगी? मुझे नहीं पता। क्या मैं आपको बता सकता था कि सोवियत सरकार कब गिरेगी? नहीं। मैं आपको नहीं बता सकता।'

इज़राइल के सामने एक मुश्किल फैसला

अमेरिका-ईरान डील की वजह से इजरायल के पास बहुत कम विकल्प बचे हैं। एक विकल्प यह है कि डील की सच्चाई को मान लिया जाए या फिर समझौते को नजरअंदाज करके अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और अमेरिका का विरोध किया जाए।

अमेरिका के 'मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट' थिंक टैंक के सीनियर फेलो एलेक्स वटांका ने AFR को बताया कि नेतन्याहू के पास असल में कोई विकल्प नहीं है। 'उन्हें उन विकल्पों पर सोचना होगा जिनमें अमेरिकियों को नाराज करना शामिल है, खासकर ट्रंप को नाराज करना, जैसे कि सीजफायर को कमजोर करना, जिसके लिए ट्रंप इजरायल और नेतन्याहू को ही जिम्मेदार ठहराएंगे।' 'या फिर मूल रूप से यह तय करना कि अकेले चलने के बजाय अमेरिकियों के साथ बने रहना ही बेहतर है, और शायद यही होगा भी। इजरायलियों के अपने कारण हैं कि वे अपनी बयानबाजी के बावजूद, जरूरी नहीं कि इस लड़ाई में बने रहना चाहते हों।'

राजनीतिक टिप्पणीकार नहुम बार्निया ने भी 'फाइनेंशियल टाइम्स' से कहा, 'वह (नेतन्याहू) एक ऐसे सेवक हैं जो बगावत का नाटक कर रहे हैं। यह बगावत ज्यादा दूर तक नहीं जाएगी। तीन साल की लड़ाई के बाद अमेरिका में हमारे पास सिर्फ ट्रंप ही बचे हैं। उन्हें ईरानियों की गोद में धकेलना समझदारी नहीं होगी।'

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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