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जब हुआ हमला तब क्या कर रहे थे मोसाद के जासूस? कैसे ध्वस्त हुआ इजराइल का इंटेलीजेंस; जानें सबकुछ

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Oct 8, 2023, 07:49 PM IST

Israel War: हमास ने न सिर्फ इजराइल पर रॉकेट दागे, बल्कि उसके सैकड़ों लड़ाके हवाई, जमीनी और समुद्र के रास्ते इजराइली सीमा में घुस गए। इजराइल पर हुए इतने बड़े हमले के बाद इजराइल के इंटेलीजेंस की विफलता सामने आ गई है। विशेषज्ञों ने भी इसे खुफिया एजेंसियों की जबरदस्त विफलता का नतीजा बताया है।

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इजराइल-हमास संघर्ष

Photo : AP

Israel War: हिंदी में एक कहावत है- 'जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि'। हालांकि, दुनिया की सबसे खतरनाक जासूसी एजेंसी मोसाद के बारे में कहा जाता है कि जहां रवि और कवि दोनों नहीं पहुंचते, वहां मोसाद के जासूस पहुंच जाते हैं। मोसाद के जासूसों के बारे में ऐसी कई कहानियां और किस्से प्रचलित हैं। बचपन से लेकर अब तक खुफियागिरी में मोसाद की ही मिसाल भी दी जाती रही है।

मिडिल ईस्ट का एक छोटा सा देश इजराइल, अपनी इसी जासूसी एजेंसी मोसाद के नाम पर दंभ भरता रहा है। कहा जाता था, जब तक मोसाद और उसके जासूस हैं, इजराइल का कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता। हालांकि, शनिवार को जब हमास ने इजराइल के दक्षिणी हिस्सों पर 5000 से ज्यादा रॉकेट दागे तो कई सवाल खुलकर खुद-ब-खुद सामने आ गए। चर्चा होने लगी है कि क्या इजराइल का इंटेलीजेंस अब ध्वस्त हो गया? क्या इजराइल और उसकी अभेद दीवार जर्जर हो गई है और क्या मोसाद अब कमजोर पड़ने लगा है?

सामने आई इंटेलीजेंस की विफलता

इजराइल पर हुए इतने बड़े हमले के बाद इजराइल के इंटेलीजेंस की विफलता सामने आ गई है। विशेषज्ञों ने भी इसे खुफिया एजेंसियों की जबरदस्त विफलता का नतीजा बताया है। दरअसल, हमास ने न सिर्फ इजराइल पर रॉकेट दागे, बल्कि उसके सैकड़ों लड़ाके हवाई, जमीनी और समुद्र के रास्ते इजराइली सीमा में घुस गए। इसके बाद विशेषज्ञों का कहना है कि इजराइल को हमेशा अपनी खुफिया एजेंसियों, घरेलू इकाई शिन बेट और बाहरी जासूसी एजेंसी मोसाद पर गर्व रहा है, लेकिन इस हमले से उसकी खुफिया विफलता दिखाई पड़ती है।

कहां व्यस्त थे मोसाद के जासूस

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल, ईरान का मुकाबला करने और इस्लामिक गणराज्य के परमाणु कार्यक्रम को विफल करने के प्रयासों में इतना व्यस्त हो गया कि उसने अपने ही निकट स्थित क्षेत्र की अनदेखी कर दी। इसका फायदा आतंकवादी संगठन हमास ने उठाया और इजराइल से वर्षों पुरानी दुश्मनी का बदला लिया। वाईनेटन्यूज की खबर के अनुसार शनिवार देर रात हुई सुरक्षा कैबिनेट की बैठक में इजराइली मंत्रियों ने सेना से अपनी खुफिया जानकारी की विफलता के बारे में जवाब मांगा है।

हाल ही में संघर्ष विराम पर बनी थी सहमति

इजराइली सरकार के अधिकारी युद्ध जैसी स्थिति में इजराइल की तैयारियों के बारे में चिंतित नजर आये और देशभर में आश्रय केंद्रों की जांच की। इजराइल ने हाल में हमास के साथ संघर्ष विराम पर सहमति व्यक्त की थी, लेकिन कुछ विशेषज्ञों ने कहा कि राजनीति की घरेलू बाधाओं के कारण चेतावनियों को नजरअंदाज कर दिया गया। इजराइली नौसेना के पूर्व प्रमुख एली मैरोन ने मीडिया से कहा, पूरा इजराइल खुद से पूछ रहा है: इजराइली रक्षा बल (आईडीएफ) कहां है, पुलिस कहां है, सुरक्षा कहां है? यह एक बहुत बड़ी खुफिया विफलता है। कुछ विशेषज्ञ सरकार द्वारा शुरू की गई न्यायिक सुधार योजना के मद्देनजर इजराइल के भीतर आंतरिक विभाजन को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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