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शेख हसीना: बांग्लादेश की Iron Lady से लेकर अदालत के कठघरे तक! सत्ता, संघर्ष और पतन की अनसुनी दास्तां

Sheikh Hasina Biography in Hindi: बांग्लादेश में कभी आयरन लेडी कही जाने वाली शेख हसीना आज अपने ही देश में वांटेड हो गई हैं। कभी जिस शेख हसीना के इशारे पर सत्ता के सभी तंत्र काम करते थे आज वो उन्हें पकड़कर फांसी दिलाने की तैयारी में हैं। शेख हसीना आज भारत में शरण लिए हुए है, उनके दुश्मन उनका बांग्लादेश में इंतजार कर रहे हैं, ताकि उन्हें उन कथित गुनाहों की सजा दी जाए, जो उनके खिलाफ ICT में साबित किए गए हैं।

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शेख हसीना को सुनाई गई है फांसी की सजा

Sheikh Hasina Biography in Hindi: बांग्लादेश की राजनीति में शेख हसीना सिर्फ एक नाम नहीं है, बल्कि वह एक स्थायी छाया है, एक ऐसी शक्ति जिसे न स्थिरता हिला सकी, न उथल-पुथल भरे दौर की आंधियां। शेख हसीना ने वो दौर भी देखा जब बांग्लादेश का आजाद कराने वाले उनके पिता शेख मुजीबुर्रहमान की सेना के ही कुछ अधिकारियों ने कर दी थी। इस दौर के बाद जब शेख हसीना उभरीं तो सत्ता के गलियारे में एक मजबूत स्तंभ के रूप में दिखीं, लेकिन आज उसी शेख हसीना को उन्हीं के देश बांग्लादेश में मौत की सजा सुनाई गई है।

बांग्लादेश की आयरन लेडी

समर्थकों की नजर में शेख हसीना बांग्लादेश को गरीबी और पिछड़ेपन से निकालकर नई मंजिलों तक ले जाने वाली “लौह महिला” है। लेकिन आलोचकों के लिए शेख हसीना सत्ता की लालसा में लोकतांत्रिक आवाजों को कुचलने वाली एक कठोर शासक। पर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि 77 वर्षीय अपदस्थ प्रधानमंत्री हसीना, जिनके बनाए न्यायाधिकरण ने युद्ध अपराधियों को सज़ा दी… वही अदालत एक दिन उन्हें स्वयं कठघरे में खड़ा कर देगी। सोमवार को बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुना दी। वह भी उनकी गैर-मौजूदगी में। इसके साथ ही उनके दशकों लंबे राजनैतिक सफर ने सबसे नाटकीय मोड़ ले लिया।

एक विरासत की शुरुआत

28 सितंबर 1947-पूर्वी पाकिस्तान के तुंगीपाड़ा में जन्मी शेख हसीना की किस्मत शायद उसी दिन लिख दी गई थी, जब उनके पिता शेख मुजीबुर रहमान ने एक राष्ट्र का सपना देखा। 1971 में भारत के सहयोग से पाकिस्तान के चंगुल से मुक्ति पाने वाला देश बांग्लादेश बना और मुजीब उसके पहले राष्ट्रपति। ढाका विश्वविद्यालय में बांग्ला साहित्य पढ़ने वाली हसीना जल्द ही छात्र राजनीति में उतर आईं। 1968 में उन्होंने वैज्ञानिक एम.ए. वाजेद मिया से शादी की-एक ऐसा रिश्ता जो राजनीति के तूफानों के बावजूद उनका स्थिर सहारा बना रहा, जब तक कि 2009 में उनका निधन नहीं हो गया।

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बांग्लादेश की अपदस्थ पीएम शेख हसीना (फोटो- AP)

1975: वह रात जिसने शेख हसीना की पूरी दुनिया उखाड़ दी

25 अगस्त 1975-एक सैन्य तख्तापलट में हसीना के माता-पिता, भाई और परिवार के कई सदस्य मार दिए गए। हसीना और उनकी छोटी बहन रेहाना सिर्फ इसलिए बचीं क्योंकि दोनों विदेश में थीं। तब भी भारत में उन्हें शरण मिली थी। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें शरण दी और यहीं हसीना की जिंदगी एक नई दिशा में मुड़ी।

‘बेगमों की लड़ाई’: हसीना बनाम खालिदा जिया

1981 में स्वदेश लौटने के बाद शेख हसीना अवामी लीग की कमान संभाल चुकी थीं। लेकिन उन्हें चुनौती मिली खालिदा जिया से-राष्ट्रपति जियाउर रहमान की विधवा और उनकी बराबरी की राजनीतिक दावेदार। दोनों नेताओं के बीच संघर्ष सिर्फ राजनीतिक नहीं था-यह विचारधारा, सत्ता और वजूद की लड़ाई थी। इसे बांग्लादेश की राजनीति में “बेगमों की लड़ाई” कहा गया, जिसने तीन दशक तक देश का राजनीतिक तापमान तय किया।

Khaleda Zia, Mohammad Habibur Rahman, Awami League leader Sheikh Hasina

30 मार्च, 1996 : बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया (बाएं) नए अंतरिम नेता मोहम्मद हबीबुर रहमान, विपक्षी अवामी लीग की नेता शेख हसीना (दाएं) (फोटो- AP)

2008 में प्रचंड वापसी

1996 में शेख हसीना पहली बार बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं। 2001 में सत्ता हाथ से निकल गई, लेकिन 2008 की प्रचंड जीत ने उनके राजनीतिक सफर को नई दिशा दी। इसी जीत के साथ शुरू हुआ उनका सबसे लंबा, सबसे निर्णायक और सबसे प्रभावशाली शासनकाल। इस दौर में बांग्लादेश ने तेज आर्थिक विकास दर्ज किया, पद्मा ब्रिज जैसे मेगा प्रोजेक्ट पूरे हुए, देश वैश्विक परिधान उद्योग की बड़ी ताकत बनकर उभरा और गरीबी उन्मूलन में उल्लेखनीय प्रगति हुई। हसीना दुनिया की सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली महिला शासनाध्यक्षों में शामिल हो गईं।

जनता की बेगम से 'तानाशाह'

शेख हसीना की सत्ता पर पकड़ जितनी मजबूत होती गई, आलोचनाओं की परछाइयां भी उतनी ही गहरी होती चली गईं। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, मीडिया पर कड़े नियंत्रण, सुरक्षा एजेंसियों को अतिरिक्त शक्तियां और विरोध प्रदर्शनों पर सख्त कार्रवाई-इन सबने उनकी छवि को धीरे-धीरे बदल दिया। जो नेता कभी “जनता की बेगम” कहलाती थीं, वो विरोधियों की नजर में एक सख्त शासक, यहां तक कि तानाशाह के रूप में देखी जाने लगीं।

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बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार के खिलाफ प्रदर्शन (फोटो- AP)

2024 में बिगड़ गए हालात

हालात 2024 में उस वक्त मोड़ पर पहुंचे जब स्वतंत्रता संग्राम के वीरों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण के फैसले से छात्र आंदोलन भड़क गया। शुरू में छोटा सा विरोध था, लेकिन देखते ही देखते यह देशव्यापी आंदोलन में बदल गया। सरकारी कार्रवाई के बाद व्यापक हिंसा भड़की और स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन (विरोध प्रदर्शनों का समन्वय करने वाला एक प्रमुख संगठन) की स्वास्थ्य समिति ने 20 सितंबर को आँकड़े जारी किए, जिनमें आरोप लगाया गया कि इस अशांति में 1,423 लोग मारे गए और 22,000 घायल हुए। सबसे ज़्यादा 77 प्रतिशत पीड़ित गोली लगने से मारे गए। मृतकों में 70 प्रतिशत 30 वर्ष से कम आयु के थे, और उनमें से 52 प्रतिशत छात्र थे। पीड़ितों में 107 बच्चे, छह पत्रकार और 51 कानून प्रवर्तन अधिकारी शामिल थे।

हसीना की विरासत अब दो हिस्सों में बंटी खड़ी

उनके अपदस्थ होने के बाद अंतरिम सरकार बनी, जिसका नेतृत्व मुहम्मद यूनुस ने किया। इसी सरकार ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण का पुनर्गठन कर हसीना के खिलाफ मुकदमा चलाया। महीनों चली सुनवाई के बाद सोमवार को उन्हें मानवता के खिलाफ अपराध का दोषी पाते हुए मौत की सजा सुना दी गई। आज भारत में निर्वासन में बैठी शेख हसीना उस देश को सीमा पार से देख रही हैं, जिसकी राजनीति, विकास और पहचान को उन्होंने दशकों तक आकार दिया। वही देश जिसकी अदालत ने अब उन्हें अपराधी ठहरा दिया है। बांग्लादेश की सड़कों, संसद और जनता की यादों में हसीना की विरासत अब दो हिस्सों में बंटी खड़ी है-एक ऐसा दौर जिसमें विकास हुआ और एक ऐसा दौर जिसमें डर बढ़ा। इस दोराहे पर खड़ी हसीना की कहानी उस नेता की दास्तान है, जिसने जिस तरह ऊंचाइयां देखीं, उसी तरह उतना ही नाटकीय उसका पतन भी हुआ।

Shishupal Kumar
शिशुपाल कुमारauthor

शिशुपाल कुमार टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के न्यूज डेस्क में कार्यरत एक अनुभवी पत्रकार हैं, जिन्हें 13 वर्षों का अनुभव हासिल है। राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय और क्राइम रिपोर्टिंग में गहरी रुचि और मजबूत पकड़ के साथ वे समाचारों की बारीकियों को समझने और उन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जाने जाते हैं। शिशुपाल ने अपने करियर की शुरुआत एक इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट के रूप में की, जहां उन्होंने प्रोडक्शन से लेकर ग्राउंड रिपोर्टिंग तक पत्रकारिता के कई महत्वपूर्ण पहलुओं में काम किया। फील्ड रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों स्तरों पर उनकी दक्षता है। अब तक शिशुपाल कुमार 15,000 से अधिक खबरें प्रकाशित कर चुके हैं। वह ब्रेकिंग न्यूज, रियल-टाइम कवरेज, डेटा-आधारित विश्लेषण और एक्सप्लेनर लिखने में खास महारत रखते हैं। उनकी स्टोरीज तथ्यों की सटीकता और सहज भाषा की वजह से पाठकों पर मजबूत प्रभाव छोड़ती हैं।

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