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यूक्रेन के पास खत्म हो रहा ब्रह्मास्त्र का बारूद, आखिर कब तक रूस के सामने टिक सकेंगे जेलेंस्की?

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 30, 2023, 03:58 PM IST

Russia Ukraine War: रूस के खिलाफ यूक्रेन जंग में बीते एक साल से खड़ा हुआ है, लेकिन इसे और आगे बढ़ा पाना मुश्किल है। दरअसल, एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन के पास हथियारों और गोला-बारूद का स्टॉक तेजी से खत्म हो रहा है। ऐसे में यूक्रेन इस जंग को और नहीं खींच सकता।

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रूस-यूक्रेन युद्ध

Photo : AP

Russia Ukraine War: रूस और यूक्रेन के बीच जंग छिड़े एक साल से ज्यादा समय बीत चुका है। इन एक सालों में दोनों देशों ने भयंकर तबाही देखी है। जान-माल का भयानक नुकसान हुआ है। इसके बावजूद दोनों देशों के एक-दूसरे पर हमले कम नहीं हुए हैं। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि यह जंग कहां जाकर रुकेगी।

इन सबके बीच रूस की ओर से यूक्रेन पर एक बार फिर से हवाई हमले तेज कर दिए गए हैं। रूसी मिसाइलें इस बार यूक्रेन के रिहायसी इलाकों को निशाना बना रही हैं। ओमान और निप्रो शहर से मौत की खबरें सामने आई हैं, तो कीव में भी बमबाजी तेज कर दी गई है। यह सब तब हो रहा है, जब यूक्रेन काउंटर अटैक की तैयारी में जुटा हुआ है। हालांकि, एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेन इस जंग में रूस के खिलाफ ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाएगा। इसका कारण यूक्रेन के पास खत्म होते हथियारों और गोला-बारूद को बताया गया है।

यूक्रेनी अधिकारी खुद मान रहे हथियारों की कमी

एक रिपोर्ट में कहा गया है कि यूक्रेनी अधिकारी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि उनके पास हथियारों की कमी है। यूक्रेनी सेना के एक कमांडर का कहना है कि यह जंग पहले से ही एक साल से ज्यादा खिंच चुकी है। अगर यह चार से पांच साल और चलती है, तो हमारे पास इतने हथियार नहीं हैं कि हम रूस का मुकाबला कर सकें। ऐसे में यूक्रेन इस समय अपने हथियारों का सोच समझ कर प्रयोग कर रहा है।

एक बार में नहीं दागे जा रहे रॉकेट लॉन्चर

रूस के खिलाफ यूक्रेन की जंग की जब शुरुआत हुई थी, तो यूक्रेनी सेना ग्रेड रॉकेट लॉचर के 40 बैरल एक बार में ही दाग देती थी। हालांकि, बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब यूक्रेनी सेना एक बार में सभी बैरल नहीं दाग रही है। उसका स्टॉक खत्म हो चुका है और वह अब पश्चिमी हथियारों पर पूरी तरह से निर्भर हो रहा है।

खत्म हो रहा ब्रह्मास्त्र का बारूद

यूक्रेनी सेना अस समय पूर्वी छोर पर मोर्चा संभाले हुए है। कहा जा रहा है कि सेना पूर्वी छोर पर रूस द्वारा हथियाए गए इलाकों को वापस लेने की तैयारी कर रही है। हालांकि, इसमें उसका सहारा सिर्फ सोवियत संघ के समय के हथियार हैं। यूक्रेन के पास सोवियत संघ समय का 'बक एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम' है। कहा जाता है कि यही वह हथियार है, जिसकी बदौलत अब तक यूक्रेनी सेना रूस को अपने हवाई क्षेत्र पर कब्जा करने से रोक पाई है। हालांकि, अब इसका भी गोला बारूद खत्म हो रहा है।

अमेरिकी रिपोर्ट में पहले ही जताई गई थी संभावनाबता दें, हाल ही में लीक हुए अमेरिकी खुफिया दस्तावेज में भी इस बात का जिक्र किया गया था कि यूकेन के पास हथियार खत्म होने वाले हैं। उसके गोला-बारूद का स्टॉक भी लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में यह देश पूरी तरह पश्चिमी हथियारों पर निर्भर हो गया है। हालांकि, अभी भी यूक्रेन के पास कुछ पश्चिमी हथियार हैं, लेकिन उन्हें बड़े आक्रमण से निपटने के लिए रिजर्व में रखा गया है।

प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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